डायरी

तुम कुछ नहीं हो.

हिंदी अब असफल और धोखेबाज़ प्रेमियों की भाषा बन गयी है. बिलकुल मीठी. कहना कुछ करना कुछ. इसलिए हिंदी नेताओं की प्रिय भाषा है.
काला पगोडा, कहानी पढ़ते हुए मैं रुक गया. मैंने स्वदेश दीपक की ओर देखा. वे कुछ लिख रहे थे. मुझे लगा कि वे लिख नहीं रहे हैं कुछ बना रहे हैं. क्या? पन्नी और तम्बाकू से एक सिगरेट. मैं एकटक उनको देखने लगता हूँ. इसलिए कि वे क्षणांश को मेरी ओर देखें. ताकि मैं उनको इशारा कर सकूं कि आप इस सिगरेट का कोई कश मेरे लिए भी रखना.
अचानक मेरा ध्यान भटका. जैसे स्वदेश दीपक ने कोई जादू किया. वे सिगरेट लेकर खिड़की के रास्ते बाहर चले गए. सिगरेट के धुएं की गंध खिड़की के आस पास होनी चाहिए थी मगर वह मेरे करीब ही कहीं थी. मैंने अपनी अँगुलियों को सूंघा. उनमें तम्बाकू की गंध थी. मैंने बहुत दिन से सिगरेट को छुआ तक नहीं था. क्या स्वदेश दीपक धुआँ बनकर शब्दों में छुप गये हैं? इसी उधेड़बुन में किताब को पलटा तो पाया कि कवर के पीछे बैठे स्वदेश दीपक सिगरेट सुलगाने वाले ही हैं.
लेकिन इस तस्वीर के सिवा वे जा चुके थे.
मैंने आवाज़ दी- “स्वदेश दीपक सर रुकिए. सुनिए तो… क्या सचमुच भाषा किसी समाज का बिम्ब होती है? क्या भाषा की बदलती हुई सूरत, समाज के साथ-साथ बदलती है.”
एक चेहरा खिड़की से झाँका. “ये बात मैंने तेरह-चौदह साल पहले एक पात्र से कहलवाई थी. अब पता नहीं बात सच की ओर जा रही है कि नहीं?” फिर से धुआँ बेतरतीब होकर खिड़की के रास्ते कमरे में आ गया.
वे खिड़की के पास खड़े थे फिर भी मैं जाने क्यों डर रहा था. मुझे लग रहा था कि स्वदेश दीपक सर कहीं जाने वाले हैं. मैंने जल्दबाजी में पूछा- ” भाषा से समाज की प्रवृति की ओर इसी प्रकार से संकेत किया जाता है?” मेरे प्रश्न पूछे जाने तक स्वदेश दीपक दूर जा चुके थे. उनकी परछाई का छोटा सा हिस्सा खिड़की की तीलियों पर पड़ रहा था.
* * *
मैं एक नोट लिखना शुरू करता हूँ. सोचा है कि लिखकर इसे खिड़की पर टांग दूंगा. मेरी अनुपस्थिति में स्वदेश सर इस खिड़की के पास से गुज़रे तो इसे पढ़ लेंगे.
“प्यारे स्वदेश सर, मद भरे पात्र कैसे रचे जाते हैं? ये कहीं से भी सीखा जा सकता है किन्तु मैं चुन सकता तो आपकी कक्षा में बैठना चुनता. कृपया जल्दी समय दें”
मैं नोट को खिड़की पर टांग देता हूँ.
स्वदेश दीपक की कहानी से जंगली घोड़ों का टोला भागता हुआ बाहर आता है. खिड़की की तीलियों के बीच से भागते हुए वे घोड़े एक रास्ता बना देते हैं. वर्जनाओं की तीलियाँ टेढ़ी हो जाती हैं. 
* * *
अचानक तीलियों के पास एक आदमी खड़ा दिखाई देता है. वह कमरे में झांकता है. जैसे कुछ खोज रहा हो. मुझे देखकर अभिवादन करते हुए पूछता है- “एक मुर्गाबी इस खिड़की में आकर तो नहीं गिरी?” मैं उसकी बात को सच समझ बैठता हूँ और कमरे में झाँकने लगता हूँ. कमरे में कुछ नहीं था. मुर्गाबी तो क्या एक पंख भी नहीं. वह आदमी भी हैरत से देखता हुआ अपनी दुनाली को कंधे पर ठीक से टांग कर मुड़ जाता है.
वह आदमी मुड़ता है और लौटकर पूछता है- “तुम झूठ तो नहीं बोल रहे? अगर तुम सच कह रहे हो तो ये खिड़की की तीलियाँ मुड़ क्यों गयी है?” मैं कहता हूँ- “यहाँ से जंगली घोड़े भागे थे” वह आदमी कहता है- “वे ज़रूर स्वदेश दीपक के होंगे” मैं हैरत से भर जाता हूँ. उसे पूछना चाहता हूँ कि आप कैसे जान पाए हैं कि वे घोड़े भले ही जंगली थे मगर स्वदेश के ही थे. मेरे कुछ पूछने से पहले ही उस आदमी ने कहा- “एक बात बताओ. जब स्वदेश दीपक के जंगली घोड़े यहां से भाग सकते हैं तो मोपासां का शिकार मुर्गाबी यहाँ से अन्दर क्यों नहीं गिर सकती?” 
* * *
एक जेन दिखाई पड़ता है. मैं पूछता हूँ कि कम शब्दों में कोई ऐसी बात कही जा सकती है जिससे कायाकल्प हो जाये? वह कहता है- “तुम कुछ नहीं हो”
मैं कुछ नहीं हूँ. सचमुच! अहा. अचानक सारे दुःख सूखे पत्तों की तरह झड़ने लगते हैं. जब मैं कुछ नहीं हूँ तो चिंता किस बात की है? 
* * *
अब किसी को नहीं कहना चाहता हूँ कि तुमसे प्रेम है. ऐसा सुनने वाला पास बैठ जाना चाहता है. उसके पास बैठते ही कुछ चिंताएं फिर से उगने लगती हैं.
मैं कुछ नहीं हूँ होना ही अच्छा लग रहा है. शुक्रिया. 
* * *
[Painting image courtesy ; Chris Barnard]
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डायरी

फेसबुक बनाम बिबलियोफोबिया

फेसबुक आपकी कई बीमारियों को सार्वजनिक कर रही है।
आपके सामने एक किताब रखी है। आप उसके पांच सौ पन्ने देखकर सोचते हैं इतनी बड़ी किताब कौन पढ़ेगा। आपके सामने एक बीस पन्नों की कहानी है और आप उसे पढ़ने की अनिच्छा पाते हैं। आपके सामने अख़बार में छपा एक लेख है और आप सोचते हैं कि लोग लंबे लेख क्यों लिखते हैं। अब कोई बीस पंक्तियों की बात भी आप नज़र अंदाज़ करते हैं। आप अक्सर चाहते हैं कि ब्लॉगर पर फेसबुक पर एक दो पंक्ति की बात ही लिखी जानी चाहिए।
अगर ये बात सच है तो आप बीमार हैं। आपकी बीमारी को मनोविज्ञान की भाषा में बिबलियोफोबिया कहा जाता है।
फेसबुक हमारी पढ़ने की आदत को ख़त्म कर रही है। मुझे भी इस बात से सहमति होती रही है। मैं भी अनेक बार अपने कहानी संग्रह का काम पूरा न होने के लिए फेसबुक को कोस चुका हूँ। मैंने फेसबुक को बंद किया और कहानियों पर काम करना चाहा। मैं लैपटॉप खोलता, वर्ड पैड में झांकता रहता। कभी नींद आती, कभी उठकर बाहर चला जाता। लेकिन काम न हुआ। मेरी फेसबुक एक दो दिन नहीं नशे की लत छूटने की प्राथमिक सीमा यानी तीन महीने बंद रही। काम उसके बाद भी न बना।
ऐसा क्या हो गया है? मैंने स्वयं से प्रश्न किया कि क्या ये राइटर्स ब्लॉक जैसा कहा जाने वाला कुछ है? मैंने पाया कि नहीं। मैं नया तो रोज़ ही लिख रहा हूँ बस पुराने ड्राफ्ट्स पर काम नहीं करना चाहता। ये समस्या कुछ और है। कुछ सोच विचार के बाद मैं इस निर्णय पर आया कि पुराने ड्राफ्ट्स को पूरा करने के बाद आने वाली किताब का फीड बैक आने में बहुत श्रम और समय लगेगा। दूजी बात नया लिखते ही लिखने की चाहना का आंशिक पोषण हो जाता है और तुरंत फीडबैक मिल जाता है। इसलिए मुझे फेसबुक पर लम्बी पोस्ट लिखने का मन है मगर कहानी संग्रह पर काम करने का नहीं है।
हमारे लिए निर्धारित पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने का डर और उनका सस्वर पाठ करने का डर बिबलियोफोबिया है। यही बीमारी तब भी है जब हम स्कूल कॉलेज से बाहर हों और अपने काम से सम्बन्धित, अभिरुचि से जुड़ी, साहित्य या इतिहास सम्बन्धी किताबें पढ़ना चाहते भी नहीं पढ़ पाते हैं। हम मन से किताब का ऑर्डर करते हैं या दुकान से खरीदकर लाते हैं। किताबें बढ़ती जाती हैं और पढ़ने का मन गायब रहता है।

अक्सर कविता लिखने की चाह रखने वाला कविता की अच्छी पुस्तकें, कहानी वाला कहानी और उपन्यास वाला उपन्यास पढ़ने से कतराता रहता है। अगर वह शुरू करता है तो भी वह बीस चालीस पन्ने के बाद सदा के लिए छोड़ देता है। असल में उसे अच्छे लेखक के बड़े कद से भी डर लगता है। वह रचना से बाहर लेखक के कद की छाया में घिर जाता है। यही तब भी होता है जब हम किसी इतिहास नायक को पढ़ते हैं और अनिच्छा से भरकर अधूरा छोड़ देते हैं।
फेसबुक को दोष दिया जा सकता है कि उसकी वजह से पढ़ना और बहुत कुछ प्रभावित हो रहा है किंतु मैंने पाया कि फेसबुक यूजर्स से संवाद के दौरान मैंने अच्छी किताबों की जानकारी पाई। उनको पढा और प्रसन्न हुआ। मेरे बहुत सारे मित्रों ने किसी सम्मोहन, आकर्षण या दिखावे में किताबें ऑर्डर करनी शुरू की। उनके साथ अपनी तस्वीरें लगाई। कुछ एक ने उनके बारे में लिखा भी। तो ये पूर्ण सत्य नहीं है कि फेसबुक पढ़ने की राह में खड़ी दीवार है।
जिस तरह लर्निंग डिसएबिलिटी होती है उसी तरह रीडिंग की भी होती है। आपने बारहवीं पास की, स्नातक हुए और अच्छी नौकरी या अच्छा काम करने तक पहुंच गए तो इसका अर्थ ये नहीं है कि आप अच्छे पाठक हैं। आप एक औसत व्यक्ति हैं। आप में समाज और साहित्य के बारे में कुछ औसत सुनी-सुनाई, अपडेट न की हुई जानकारी है। आपके पास तीन सौ शब्द हैं। आप बोलने के सामान्य कौशल तक आ गए हैं और अपने व्यक्तित्व का दिखावा करते हुए जीने का रास्ता खोज लिया है। आप अगर सचमुच इससे अधिक अच्छा बनना चाहते हैं और बन नहीं पा रहे तो आप एक मनोरोग से पीड़ित हैं, जिसका ज़िक्र इस बात में हो रहा है।
इस रोग के लक्षण। जैसे ही पढ़ना शुरू करेंगे कोई काम याद आ जायेगा। मौसम अच्छा न लगेगा। पसीना आएगा या ठंड लगेगी। मानी आप सर्द दिनों में रजाई खोजने लगेंगे और गर्म दिनों में पसीना पौंछने लगेंगे। आप किसी भी कारण से किताब को एक तरफ रख देंगे। अब आप फोन हाथ में लेकर फेसबुक ऑन कर लेंगे तो मौसम सुहाना हो जाएगा। समय कब बीता पता भी न चलेगा। क्योंकि फेसबुक पर जहाँ कोई पढ़ने की बात होगी, उससे आगे बढ़ जाएंगे। आप तस्वीरें लाइक करेंगे। किसकी पोस्ट पर आपकी महबूबा लगातार जा रही है ये खोज करने लगेंगे। आपका महबूब इन दिनों कितनी बार और क्या लिख रहा है का अन्वेषण करने लगेंगे। या आप किसी विषय पर कोसने के अपने प्रिय कार्य में लग जाएंगे। असल में इस सबकी वहज है पढ़ने का भय। तो फेसबुक पर आकर भी नहीं पढ़ते हैं। न पढ़ना चाहते हैं।
बिबलियोफोबिया एक गंभीर रोग है। इसका तुरंत उपचार लेना चाहिए। ये आपकी स्कूल-कॉलेज शिक्षा को प्रभावित करता है। ये कार्य सम्बन्धी योग्यताओं में भी बाधा बनता है। ये आपके निजी जीवन को भी प्रभावित करता है।
सब मनोरोगों का उपचार एक सा ही होता है। जैसे किसी को पानी से डर लगता है तो उसे कम पानी से मित्रता करनी होती है। उसमें थोड़े से पांव डुबो कर बैठना होता है। फिर धीरे-धीरे आप एक छोटे पूल में उतरते हैं। एक रोज़ तैरने लगते हैं। आपको नींद नहीं आती तो अत्यधिक श्रम करने को प्रेरित किया जाता है, थकान से नींद आये। नहीं तो नींद की दवा ही दी जाती है। आपको ऊंचाई से डर है तो आपको ऊंचाई तक जाकर ही इसे मिटाना होता है। किताबें पढ़ने का डर आप में आ गया है तो थोड़ी योजना बनाइये, थोड़ी हिम्मत जुटाइये। किताब के साथ निश्चित दोस्ती गाँठिये। रोज़ पढ़ने का तय समय निकालिये।
फेसबुक को मत कोसिए कि उसने आपका सबकुछ चुरा लिया है। आप स्वयं को याद दिलाइये कि आप जो नहीं कर रहे हैं, उसके प्रति अनिच्छा से भर गए हैं। उसे ठीक कीजिये।
* * *
डायरी

डेटा चोरी से रची गयी दुनिया

कुछ मित्रों ने पूछा है कि फेसबुक से लिए डेटा का कोई कैसे और क्या उपयोग कर सकता है. मेरी प्रवचन करने की बुरी आदत है. प्रवचन की दुर्घटना के बाद सोचता हूँ कि कम शब्दों में बात कहना सीखना चाहिए. इसलिए आज कोशिश करता हूँ.
डेटा से पसंद, व्यवहार और मत का अनुमान निश्चित कर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाता है. इसके पश्चात् जिसका डेटा है उसे केंद्र में रखकर योजना बनाना. इसके लिए तकनीकी शब्द है मैक्रोटार्गेटिंग. सरल शब्दों में इसका अभिप्राय है कि इस विश्लेषण के आधार पर एक ऐसा संदेश तैयार करना जो कि निश्चित व्यक्ति अथवा समूह को प्रभावित कर सके. व्यक्ति की पसंद का काल्पनिक भविष्य रच सके. एक निश्चित व्यक्ति जब अपनी पसंद और व्यक्तित्व के अनुरूप बातें किसी उत्पाद, विचार या राजनितिक लक्ष्य से सुनता है तो वह अजाने ही उसका एक सक्रिय सम्प्रेषक अथवा कार्यकर्त्ता बन जाता है.
उदाहरण के लिए एक नगर निगम के चुनाव हैं. एक विशेष स्थान से लोग दूजे विशेष स्थान तक कैब से यात्रा अधिक करते हैं. उस स्थान पर मेट्रो जैसी अत्याधुनिक सुविधाएँ चलाने की बात फैला दी जाये. आप अपनी लोकेशन अपडेट करते हैं. इससे पता चलता है कि आप कब कहाँ जा रहे हैं. इसलिए हर एप द्वारा आपकी लोकेशन लगातार मांगी जा रही है. जैसे इससे ये मालूम किया जाता है कि किसी विशेष माल में लोग सबसे अधिक संख्या में जा रहे हैं तो वहां सर्वाधिक विज्ञापन किया जाये. आप किसी पोल में बताते है कि भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं तो एक स्वप्न पेश किया जाये जो भ्रष्टाचार मुक्त होने का विश्वास दिलाये. देश में बेरोज़गारी बढ़ गयी है, इसका आंकलन करके देश से बाहरी लोगों को भगाने का नारा उछाला जाये.
आप कहेंगे कि ये तो अच्छा है न? अपने आप किसी ने हमारी समस्याओं का आंकलन किया और किसी ने उनको दूर करने का वादा कर लिया. लेकिन यही सबसे बड़ी चुनौती है कि इस तरह के विश्लेषणों का उद्धेश्य समस्या दूर करने की जगह फौरी तौर पर लोगों के मन को प्रभावित करना भर होता है. आपकी निजी जानकारी का किसी को हासिल होना आपके लिए इसलिए समस्या है कि अगर आपको घुटनों में दर्द है तो आपकी ये जानकारी दवा कम्पनी को बेच दी जाएगी. आपको फेसबुक जैसी सोशल साइट्स और इंटरनेट ब्राउजर्स पर केवल घुटनों की दर्द निवारक दवाओं के विज्ञापन दिखाई देंगे. आपकी न्यूज फीड में तुरंत ऐसी पोस्ट्स आपको फोलो करने लगेगी. आप घुटनों के दर्द की दुनिया बन कर रह जायेंगे. डरेंगे और पैसा खर्च करेंगे.
डेटा चोरी से रची गयी काल्पनिक समस्याएं और उनके समाधान कोई भौतिक चीज़ नहीं है जिसे आप देख सकें. ये मन को पढने की कोशिश हैं. खुलापन, कर्त्तव्य निष्ठां, बहिर्मुखता, सहमतता, मनोविक्षुब्धता से जुड़ी इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए लड़ा जा रहा युद्ध है. इस क्षेत्र के एक महारथी ने इसे “स्टीव बेनोंस सायकोलोजिकल वारफेयर माइंडफक टूल” कहा है.
तो समझिये कि आपके दिमाग के साथ क्या किया गया है कि आपको समझ नहीं आ रहा डेटा चोरी से कैसे और क्या किया जा सकता है?

[Image by Chuck Kerr]

डायरी

चाकू को ही ज़िन्दगी न बना लें

यूजर्स की डेटा चोरी जैसी ख़बरों से हमको क्या फर्क पड़ता है? हम तो फेसबुक और व्हाट्स एप के विडिओ चैट में नंगे भी हो जाते हैं. डेटा हमारा आधार वालों के पास पड़ा ही है और लोग उसे चुरा ही रहे हैं. इसलिए ऐसी बेकार की ख़बरों से क्या सर लगाना.
लेकिन फिर भी अपने लिए टाइम निकालो.
छोटा भाई पुलिस में अधिकारी है. उसने सायबर क्राइम और लॉ की पढाई भी की हुई है. मुझे भाई ने कहा कि आपके इस नए फोन में एक एप डाउनलोड कर लो. व्हाट्स एप. एप के खुलते ही भाई ने मुझे इसके फ़ीचर समझाए. मुझे बड़ा अच्छा एप लगा लेकिन मैं जिनसे बात करना चाहता था उनमें से बहुत कम के पास एंड्राइड फोन थे. यहाँ तक कि आभा भी बेसिक मोबाइल ही उपयोग में ले रही थी. इसलिए उत्साह फीका पड़ गया. फिर मैंने सोचा कि चलो कोई बात नहीं भाई-भाई फोन पर कभी खेला करेंगे. लेकिन दो साल के भीतर ही ऐसे बहुत कम दोस्त और परिचित बचे जिनके पास व्हाट्स एप चलाने लायक न फोन था.
कल व्हाट्स एप के संस्थापक सदस्य ब्रायन एक्शन ने अपने ट्विटर फोलोवर्स से कहा है कि फेसबुक को डिलीट करने का समय आ गया है. इसे डिलीट कर दिया जाये.
ब्रायन एक्शन ने जॉन काम के साथ व्हाट्स एप को बनाया था. साल दो हज़ार नौ में व्हाट्स एप शुरू किया गया था. उसी समय ब्रायन ने फेसबुक में नौकरी के लिए आवेदन किया मगर उनको रिजेक्ट कर दिया गया था. इस रिजेक्शन के बाद उन्होंने फ़रवरी में स्थापित की गयी कम्पनी व्हाट्स एप पर काम करना जारी रखा और मेहनत रंग लाई. व्हाट्स एप ने पूरी दुनिया में पाँव पसार लिए.
फेसबुक का मूल विचार था कि लोग अपनी तस्वीरें एक जगह रखें. उनको अपने मित्रों को दिखा सकें. दूसरे मित्रों के पास रखी तस्वीरों में खुद को खोज सकें. स्कूल और कॉलेज में बिछड़ गए दोस्तों से तस्वीरों के माध्यम से पुनः जुड़ सकें. लेकिन कम्युनिकेशन आदमी का सबसे बड़ा लालच होता है. इसी ने फेसबुक को हर सामाजिक गतिविधि की सूचना और आन्दोलन बना दिया. इसे अंधे के हाथ बटेर लगना कहा जाता है.
व्हाट्स एप जब बना तो उसमें बहुत सारी समस्याएं थी. जैसे कि वह हैंग हो जाता और पूरी तरह बंद हो जाता था. कुछ एक महीने इस पर काम किया लेकिन बात नहीं बनी. ये कम्पनी और प्रोजेक्ट बंद होने को ही था. इससे दोनों मित्रों को कोई आशा नहीं था. एप्पल ने जब पुश नोटिफिकेशन को एप्स के लिए काम लेना शुरू किया तो याहू छोड़कर आये दोनों दोस्तों ने पुश नोटिफिकेशन का इस्तेमाल व्हाट्स एप में किया.
पुश नोटिफिकेशन का अर्थ है हरकारे की आवाज़. आप इसे ऐसे समझिये कि किसी ने ऊँची जगह पर पर चढ़कर ज़ोर से एक आवाज़ लगाई. आपको वह आवाज़ सुनने में रूचि नहीं है लेकिन आवाज़ दीवारों के भीतर तक आ जाती है. एक सूचना निश्चित दायरे तक पहुँच जाती है. आपने अगर दो हज़ार आठ नौ के आस पास वाले नोकिया के स्मार्ट फोन यूज किये हैं तो आपको सहज ही याद आएगा कि वहां पुश नोटिफिकेशन को ऑन और ऑफ़ करने का एक ऑप्शन था. हमें इसकी ज़रूरत न थी इसलिए हमने इसे समझा नहीं.
मैं तकनीक का विद्यार्थी नहीं हूँ. मैं सहज जितना समझ सकता हूँ उतना समझता हूँ और अपने सबक को लिख देता हूँ. तो उस समय मैंने जानना चाहा कि पुश नोटिफिकेशन को ऑन या ऑफ़ करने से कोई मेरे फोन में कोई बदलाव आता है? नहीं आता था. इसलिए कि टेलिकॉम कम्पनियों पर विज्ञापन करने की पाबंदी रही होगी. तब तक ऐसे एप नहीं आये थे जिनको पीछे से कोई सूचना दे और वे फोन के स्क्रीन पर उसे फ़्लैश कर सकें.
व्हाट्स एप कम्पनी एक डूबा हुआ श्रम और धन था. लगभग कुछ दिन में बंद हो जाने वाला कारखाना. अचानक पुश नोटिफिकेशन पर आधारित एक फीचर इंट्रोड्यूस किया गया. व्हाट्स एप का यूजर अपने स्टेट्स में कुछ भी लिखे या बदलाव करे तो उस यूजर से जुड़े हुए सभी यूजर को वह सूचना तुरंत मिल जाये. बस इसी एक बात से बात बन गयी. महीने दो महीने में इसके ढाल लाख यूजर बन गए. इसलिए कि हर किसी को ये जानना था कि उसके प्रिय, पड़ोसी , मित्र, सहकर्मी का स्टेट्स कैसा है. उसके आस-पास नया क्या चल रहा है. ये एक तरह से ख़ुद को ब्रॉडकास्ट करना और दूजों की कही गयी बात को बिना किसी को बताये पढ़ना हो गया.
बस बात बन गयी. व्हाट्स एप बिलियन यूजर कम्पनी हो गयी.
लेकिन फेसबुक को पसीना आ गया. इसलिए कि दोनों संचार का ही काम कर रहे थे. कम्युनिकेशन की एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती थी. या शेर जिस तरह चीतों को मार देते हैं उसी तरह व्हाट्स एप का शिकार फेसबुक ने कर लिया. साल दो हज़ार चौदह में फेसबुक ने इसका अधिग्रहण कर लिया. अब व्हाट्स एप के दो संस्थापकों में से एक जॉन फेसबुक के बोर्ड में हैं और दूजे ब्रायन फेसबुक डिलीट करने का कह रहे हैं.
मेरे बहुत सारे दोस्त इस बात से परेशान रहते कि व्हाट्स एप का सादा होना कितना अच्छा था. अब स्टोरीज का स्नेपचैट जैसा फीचर, ग्रुप को छोड़े बिना डिलीट न कर पाने का ऑप्शन, पेमेंट के फीचर और भी जाने क्या-क्या बोझ से भर दिया गया है. मैं उनसे कहता कि ये तो दिखने भर वाली चीज़ें हैं. असल में आपके जीवन का सारा हिसाब किताब ही इक्कठा किया जा रहा है. इसे कोड में बदलकर सहेजा जा रहा है. इसका एक रोज़ उपयोग भी किया जायेगा. इसको लाइव ट्रांसमिशन की तरह किसी भी तीसरे व्यक्ति को उपलब्ध कराया जायेगा. आप समझेंगे हम बात कर रहे हैं. लेकिन हो सकता है उसी बातचीत को अनेक लोग किसी उद्धेश्य से सजीव पढ़, सुन और देख रहे होंगे.
ब्रायन का कहना है कि फेसबुक मालिकों ने अपने ही घर में चोर बिठा लिए हैं. उन चोरों से सांठ गांठ कर ली है. केम्ब्रिज एनालिटिक नामक एक कम्पनी ने फेसबुक यूजर्स का डेटा चुराया और उसे राजनितिक काम करने वालों को बेच दिया. ऐसा करके अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव को प्रभावित किया गया. ब्रायन की चिंता ये है कि डेटा चोरी से समाज और राजनीति को गलत ढंग से प्रभावित किया जा रहा है.
जैसे बीमारी से डरने वाले लोगों की सूची बना ली जाये. उन्हीं डरे हुए लोगों को एक मिस्लीड करने वाली अधूरी इन्फोर्मेशन दी जाये. तो वे उसका भयानक प्रचार करेंगे. उसकी रोकथाम के लिए दवाएं खरीदेंगे. उनके लिए एक ख़बर ही ज़िन्दगी होकर रह जाएगी. समाज में एक वर्ग हताश और परेशान होकर अपनी आर्थिक उत्पादकता और मानसिक स्थिरता को गलत जगह इन्वेस्ट करेगा.
आज का सबसे बड़ा नशा हेरोइन एक समय बाज़ार में मेडिकल कम्पनी ने दर्दनिवारक दवा के रूप में लांच किया था. उसके प्रचार ने कुछ दिनों में ही समाज को एक भयानक नशे में धकेल दिया था. इस दवा को बाज़ार से हटा लिया गया. इसका निर्माण कम्पनी ने बंद कर दिया लेकिन दुनिया भर में होने लगा. अफ़ीम की खेती से देश चलने लगे. आतंकवादियों को धन मिलने लगा. आख़िरकार एक ख़ूबसूरत और प्रगतिशील देश अफगानिस्तान को तबाह होकर कीमत चुकानी पड़ी. इसी तरह अफ़्रीकी देशों में नशे की गोलियों ने समाज को गर्त में पहुँच दिया. ये दोनों उदाहरण समाज की भेड़चाल और अज्ञानता के तीव्र प्रसार का परिमाण हैं.
तो फेसबुक की हरकतें अच्छी नहीं है. वह आपको, आपके परिवार को, समाज को और देश को एक दिन छोटे से लालच के कारण किसी ऐसी ही आफत में धकेल देगा. डेटा चोरी से ऐसे समूह बनाये जा सकेंगे जो तेज़ी से जातीय, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय और हर तरह के वर्ग के बीच ज़हर बो सकेंगे. ये स्व प्रेरित समूह राजनितिक इशारों पर काम करेंगे और कुर्सी के लिए, प्रभुत्व के लिए और समाज को बाँट देने के लिए कुछ भी कर सकेंगे. ये समूह हमारे बच्चों की पीढ़ी को किसी मनोरोग में धेकेल देंगे.
फेसबुक अब भी अपनी ख़ुद की वैश्विक इंटरनेट सेवा पर काम कर रहा है. इसे बंद किये जाने का समाचार नहीं है. फेसबुक ऐसी तकनीक पर भी काम कर रहा है, जिससे फोन में फेसबुक चलाने के लिए इंटरनेट प्रोवाइड करने वाली कम्पनी पर आश्रित न रहना पड़े. इससे फेसबुक विज्ञापन बाज़ार की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना चाहता है. वह अपने यूजर्स को केवल अपने विज्ञापन दिखायेगा. पैसे लेकर गढ़ी हुई भ्रामक और असत्य सूचनाओं का कारोबार भी होगा. आपसे कहेगा कि फेसबुक यूज करना है तो देखना ही पड़ेगा.
आप कहाँ जायेंगे? आज फेसबुक हेरोइन से भी बड़ा नशा है.
एक दोस्त ने मुझसे पूछा कि अगर फेसबुक और व्हाट्स एप ऐसे गंदे वाले विडियो चैट को पब्लिक कर दे तो? मैंने हसंते हुए कहा- “वे ऐसा नहीं करेंगे.” उसने पूछा- “क्यों?” मैंने कहा- “देहिक क्रियाओं से जुड़ी वर्जनाएं रुढ़िवादी समाजों में ही ज़्यादा है. उन लोगों को अभी इस बात का शायद आईडिया नहीं है कि भारत जैसे देशों के नागरिकों को ऐसे विडियो के माध्यम से ब्लैक मेल किया जा सके. इससे भी बड़ी बात है कि अभी उनके पास और बहुत सारे काम हैं. जिस दिन फेसबुक दिवालिया होने लगेगी तब कोई भारतीय ही उनको ये सलाह देगा कि पुरानी बही से वसूली शुरू करो.”
आपका व्हाट्स एप कहीं और से भी लॉग इन है और ये कोई चोरी नहीं है, ये कहकर कम्पनी अपना पल्ला झाड़ सकती है. इसलिए कि वेब ब्राउजर से लॉग इन करते समय आपको कंपनी द्वारा मैसेज किया गया था. आपने उसे पढ़ा और डाला तभी ये सम्भव हुआ है. एक एसएमएस तो हम कहीं से भी हैक कर सकते हैं. ये बहुत कठिन नहीं है.
एक तरीका है कुछ रुपयों का भुगतान करके आप किसी भी नम्बर पर किसी भी नम्बर से काल कर सकते हैं. आप जो नम्बर चाहेंगे वही रिसीव करने वाले को दिखेगा.
बच्चू तुम कहाँ-कहाँ फंसे हुए हो अभी जानते नहीं हो.

पोस्ट स्क्रिप्ट :
आपके पास चाकू है तो हाथ कट जाने के डर से या आवेश में किसी की हत्या हो जाने के डर से उसे फेंकिए मत। उसे संभाल कर उपयोग में लेना और सुरक्षित रखना सीखें।
क्या न करें- 
फेसबुक की प्रश्नोत्तरी में भाग न लें। पोल से बचें। छवियों पर भरोसा कर अग्रेषित या प्रकाशित न करें। किसी भी न्यूज़ पोर्टल की ख़बर तो तुरंत सच न मानें। स्वयं को याद दिलाते रहें कि इंटरनेट पर झूठ बहुतायत में उपलब्ध है।
क्या करें- 
सोच समझकर, शांत मन से, बिना किसी आग्रह के अपने आपको अभिव्यक्त करें। अपने जातीय, धार्मिक और वैचारिक मूल्यों को निजी जीवन में महत्व दें दूसरों पर न थोपें। सामाजिक व्याधियों पर सक्रिय विरोध करें। अपने पक्ष को पोस्ट में साफ़-साफ़ लिखने का कष्ट उठायें और असहमति होने पर बहस करने को स्थगित रखें। इसलिए कि बहस करने वाले आपके दोस्त कम और प्रचारक ज़्यादा होते हैं। सामाजिक, राजनितिक चेतना और आर्थिक सुरक्षा के विषयों पर बात करें लेकिन शेयर करने का मन हो तो उसे कई-कई बार जाँच लें कि सत्यता क्या है? समस्याओं के सही समाधान भी सुझाएँ। देश के लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव का अधिकार है, इसलिए राजनेताओं को अपमानित करने वाली पोस्ट लिखने की जगह चुनाव में अपने मत का प्रयोग करें।
सबसे अंत में ख़ुद को कहें कि थोड़ी शर्म रखें, थोड़ा सा तो तमीज़ से बोलें और चाकू से काम लें मगर चाकू को ही ज़िन्दगी न बना लें.
डायरी

तुममें ऐसा था ही क्या

कि तुमको अपने पास बचाने की खातिर
एक पूरी उम्र गंवा डाली.

दोपहर के ढलते ही काम हाथ से छूटने लगते. मन छत की ओर भागने लगता. वहां क्या होता? छत खाली पड़ी रहती. आसमान में कुछ देर पंछी उड़ते हुए कहीं लौटते दीखते. डूबते सूरज की रोशनी से क्षितिज पर नया सा रंग आता और किसी लकीर की तरह फैल जाता. शाम का साया घना हो रहा होता. दीवार से बनती परछाई शाम की रंगत से अधिक घनी होती जाती. रोशनी बुझ ने लगती. चीज़ें अंधेरे में गुम होने को बढ़ जाती.
छत पर खड़े हुए कभी-कभी अतीत की याद आती थी. ख़ुशी से किलकते बच्चे की तरह भाग-भाग कर वहीँ जाने को बेताब मन. सारे काम एक मुलाक़ात को बनाने के आस-पास चलते. दस दिन बीत जायेंगे न तब हम मिलेंगे. इस तरह दस दिन किसी अंधी पोटली में जा गिरते. उन दस दिनों में जीना नहीं होता था. प्रतीक्षा होती थी. प्रतीक्षा का ही रोमांच होता था. आस-पास के लोग क्या करते थे दीखता न था. मन उनके बारे में सब भूल जाता.
कुछ रोज़ की मुलाकात के लिए महीनों खो दिए. साथ रह लेंगे ये सोचकर सोचा कि ज़िन्दगी आसान हो जाएगी. साथ रहेंगे. प्रेम से देखेंगे. पास बैठेंगे. सब कुछ एक साथ करेंगे. कितना अच्छा न? अक्सर देर रात तक यही सोचते हुए बत्ती गुल करने का मन न होता. कभी दोपहर में खिड़की दरवाज़े बंद किये अँधेरा बना कर बैठे रहने को जी चाहता.
और एक रोज़ ज़िन्दगी साथ निबाहने का वादा कर लिया. तीजे महीने वह किसी और के साथ रहने लगा.
ऐसे को कौन याद करता है? ज़रूर कोई और बात थी कि शाम होते-होते छत पर आकर चुप बैठ जाने का मन हो आता था. मन में जैसे कोई झील थी. हर शाम अलोप होने वाली झील. शाम होने के साथ डूबने लगती. उसका पानी किसी सुराख़ से बहता हुआ अँधेरे की ओर जा रहा होता. उसके ठीक बीच मन एक अबोध नन्हे हिरन की तरह फंस जाता. कम होता हुआ पानी दलदल में बदल जाता. केवल गरदन को कीच से बाहर उठाये हुए साँस-साँस गिनता मन सूनी आँखों से स्थिर एक दिशा में देखता रहता.
और कोई बात नहीं दुःख इस बात का होता है कि मुक्ति की ठीक चाहना नहीं हो पाती. अब तक जो था वह खर्च कर दिया. वह सब वापस नहीं चाहिए लेकिन…
पंखों की आवाज़ आई. एक फाख्ता आकर छत पर गिरी. मोबाइल से रोशनी करके देखा तो दीवार के पास चिपके हुए बैठे पाया. परिंदों को छूने में भी अँगुलियाँ डरती हैं. हाथ आगे बढाया तो चुप बैठा परिंदा हिला नहीं. उसे हथेली में उठा लिया. अँगुलियों के बीच कुछ गरम रिसने का अहसास आया. सोचा परिंदा पानी से भीगा होगा लेकिन वो गाढ़ा होता हुआ खून था.
कभी नहीं सोचा था कि इस तरह खून से भरी हथेली को देखा जा सकेगा. लेकिन अचानक लगा कि हथेली में घायल फाख्ता नहीं है. जो मन तुमको दिया था उसे तुमने जीवन के आसमान में उड़ते हुए ही चीर डाला है. वह एक लहुलुहान फाख्ता की शक्ल में फिर से मेरी हथेली में आ गया है.
वाशबेसिन में नल के पानी के साथ एक रंग घुलता हुआ हल्का होता गया. फाख्ता एक कोने में दुबकी बैठ गयी. जैसे कोई लड़की अपने पिता के घर चली आई हो. और सोचती हो कि जीवन में कोई और भी ठिकाना होना चाहिए कि आसमान में उड़ते हुए ज़ख्मी हो जाने पर किसी के घर न लौटना पड़े. कोई अपना घर हो केवल अपना.
आँखों के आगे अंधेरा श्यामपट्ट बना रहा था. सोचा कि इस श्यामपट्ट पर कुछ लिख दूँ मगर क्या? 
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एक और किताब पूरी कर लो. मुझे कई बार लगता है कि नए कवर में नए शब्द हैं. प्रिंटिंग की स्याही की ख़ुशबू आ रही है. किताब को अपने चेहरे पर फैलाकर रख लिया है.
इनबॉक्स में पड़े अनरीड मैसेज और छूटी हुई कॉल्स को देखा. मालूम था कि निम्बू नहीं है फिर भी फ्रीज़ खोला. कुछ तो मिल ही जाएगा. अदरक का छोटा सा टुकड़ा मिल गया. कांच के ग्लास में अदरक की स्लाइस डालते हुए रुक गया कि सवेरे चाय में डालने लायक बहुत थोड़ा सा बचा देता हूँ.
अदरक वाली जिन का स्वाद भी बहुत अच्छा होता है. 
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जब कोई तुमको छोड़कर चला जाये तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी लम्बी है. अगर कोई तुमको छोड़कर भी तुम्हारे साथ बना रहे तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी भारी है. भौतिकी का ये ज्ञान भौतिक विज्ञान पढने से नहीं जीने से समझ आता है. 
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