डायरी

कांच के टुकड़ों की खेती

एक सहकर्मी थे. उन्होंने रेडियो कॉलोनी में आवंटित मकान के पीछे खाली छूटी हुई ज़मीन पर फल और सब्ज़ी के लिए क्यारियां बना ली थीं. प्रेमपूर्वक देखभाल करते. रेगिस्तान में पानी की कमी के बावजूद अपनी क्यारियों के लिए जितना संभव होता उतना पानी उपयोग में ले लेते.
कभी-कभी कॉलोनी के पड़ोसी कहते कि गर्मी के दिन आ गए हैं अब पानी की सप्लाई कम आती है. आप कम पानी का प्रयोग किया करें. इसके जवाब में वे लड़ने लगते. लोगों ने कहना छोड़ दिया. बाड़ी फलती रही. सात-आठ दिन बाद शहर के साथ आकाशवाणी को पानी की सप्लाई मिलती तो सबसे पहले उनकी बाड़ी का नल खुलता. चिंतित और परेशान कॉलोनी के रहवासी कुढ़ते रहते कि अगली बार जाने कब पानी आये.
एक दिन उनका स्थानांतरण हो गया. वे अपने पैतृक घर के पास जा रहे थे. प्रसन्न थे. उन्होंने ट्यूब लाईट के डंडे और फ्यूज हो चुके बल्ब तोड़े और बारीक टुकड़े किये. खिडकियों के टूटे हुए शीशों को इकठ्ठा किया. उनके छोटे टुकड़े बनाये. अपनी बाड़ी से एक एक पौधा उखाड़ा. मिट्टी खोदी और उसमें कांच के टुकड़े मिला दिया. इसके बाद उनके चेहरे संतोष से भर गए. उन्होंने हल्के मन से विदा ली.
जब हम जा रहे हैं तो ज़रूरी नहीं कि फूल लगाकर जाने में ख़ुशी पायें. हो सकता है मिट्टी में कांच बोने से ही सुख आये कि हमारे बाद कोई यहाँ हाथ भी न डाल सके. अपने-अपने संस्कार हैं.
क्या उनको भी लग गया है कि वे सचमुच जा रहे हैं?

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डायरी

उलझन

“सर आपके हाथ मे शायद पूँछ आई है?” केसी
केएसएम – “लेकिन ये खोखली और बेजान लग रही है।”
“संभव है किसी कलावादी की पूँछ है” केसी
केएसएम – “हो सकता है कला मर्मज्ञ की हो।”
“देखिए इस पूँछ में कुछ कौवों और चिड़ियों के पंख भी हैं” केएसएम
केसी- “ये कोई जड़ों से जुड़ा कलावादी होगा”
केएसएम – “आपको क्यों नहीं लगता कि ये जड़ों से जुड़ा कला मर्मज्ञ है?”
“कलावादी जहाँ भी जाता है वहाँ की कला को छीनकर अपनी पूँछ में लगा लेता है” केसी
“सर ज़्यादा साफ फर्क समझ नहीं आ रहा” केएसएम
केसी- “देखिए कलावादी हर जगह उपस्थित रहता है लेकिन वह कला के किस क्षेत्र का प्रतिनिधि है ये समझा नहीं जा सकता”
केएसीएम- “सम्भव है कि ये मर्मज्ञ है।”
केसी- “देखिए मर्मज्ञ वो है जो अपने क्षेत्र विशेष के कलाकारों का शोषण करे और अन्य मंचों पर उन्ही के कसीदे पढ़े।”
केएसीएम- “जैसे?”
केसी- “जैसे ही परिवार के सम्मान की बात हो स्वयं का सम्मान करवा लें, बड़े शहर में कोठी बनाकर रहे मगर पुश्तैनी ज़मीन से अपने हिस्से का एक इंच और एक रुपया न छोड़े लेकिन जब परिवार की बात चले तो वही उनका प्रतिनिधि बने खड़ा हो।”

रेगिस्तान के लोगों के लिए ये एक बड़ी समस्या है कि दिल्ली और जयपुर एक ही रास्ता जाता है। इसलिए मालूम नहीं हो पाता कि वह कहाँ जा रहा है। क्या वह दिल्ली जा रहा कलावादी है या जयपुर जा रहा कला मर्मज्ञ?

केएसएम स्टूडियो से बाहर चले और वह पूँछ ट्रेंच में खो गई। मैं उलझन में आँखें उठाये स्टूडियो की छत देखता रहा।



डायरी

एक रूमानी चीज़

अतीत बुझी हुई, मिटी हुई या गुज़री हुई बात नहीं है। वह हमारे साथ चलता है ठीक हमारे पीछे।

आज सुबह स्वप्न में पिताजी को देखा। उनके साथ हमेशा दो दोस्त होते थे। स्वप्न में भी थे। उनसे बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी। मैं दूसरी कोशिश में उसे स्टार्ट कर देता हूँ।

जैसे प्रेयसियां अतीत हुई, जैसे पिताजी अतीत हुए ठीक उसी तरह आँख खुलते ही स्वप्न अतीत हो गया।

अगर मैं अतीत के दरिया में छोटी डोंगी लेकर उतर सकूँ तो मिल सकता हूँ बेहद हसीन लोगों से। देख सकता हूँ उनकी प्यार भरी आंखें। महसूस कर सकता हूँ कच्ची बाहों के घेरे। होठों पर उतार सकता हूँ गुलाबी सितारे। अपने कंधों को पा सकता हूँ मादक गन्ध से भरा हुआ।

अतीत भी एक रूमानी चीज़ है।
* * *

डायरी

चौथा धंधा – अयोध्या प्रसाद गौड़

नंगे आदमी के गले में टाई 
नंगी औरत के पैरों में जूते।
आँख फाड़कर देखते हैं बच्चे और मर जाता है उनका बचपन।
भयावह हो गए हैं समाचार पत्रों के ई-एडिशन और डिजिटल एडिशन। अख़बार का प्रिंट जिन ख़बरों को प्रस्तुत करता है, वे ख़बरें वेब पोर्टल पर ख़ास महत्व नहीं रखती। वेब पर महत्व रखने वाली ख़बरें प्रिंट में कम ही दिखती हैं। मुझे इससे ये समझ आता है कि हमारे पास टैब या फोन है तो इससे निजता बनती है। इसी निजी स्पेस को सेक्स, कुंठा, शोषण और हत्या से भरा जा सकता है। लेकिन यही सब प्रिंट में नहीं रखा जा सकता क्योंकि छपा हुआ अख़बार या रिसाला परिवार के बीच रखा रहता है।
अर्थात व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को उसकी निजता में घुस कर नष्ट किया जाए और बाहर शालीन और सुसंस्कृत होने के दिखावे को बनाया रखा जाए।
क्या हिचक होनी चाहिए ये कहने में कि लोकतंत्र का चौथा खम्भा अब चौथा धँधा हो गया है। अयोध्या प्रसाद गौड़ की किताब का शीर्षक है चौथा धँधा। ये शीर्षक उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ के उद्बोधन से लिया है।
साल नब्बे इक्यानवें में जोधपुर में कॉफ़ी हाउस से थोड़ा आगे हाई कोर्ट रोड पर पोरवाल सदन में नवभारत टाइम्स के जोधपुर ब्यूरो का दफ़्तर हुआ करता था। नारायण बारेठ ब्यूरो प्रमुख थे। वे मुझसे प्रेम करते थे तो ब्यूरो दफ़्तर में बैठने और ख़बरें लिखना सीखने के लिए बुला लिया था। एक टाइपिस्ट दो तीन घण्टे के लिए आता था बाक़ी समय मैं वहां बैठकर कुछ ख़बरें पढ़ता कुछ प्रेस नोट पर हाथ आजमाता।
बारेठ जी जब पत्रिका के कोटा संस्करण में थे तब उन्होंने कुछ फीचर लिखे थे। उनकी फाइल मुझे सौंप दी गई थी। मैंने उन फीचर को पढ़कर ये जाना कि मैं ऐसी ख़बरें ही लिखना सीखना चाहता हूँ। मुझे उन दिनों की याद से बहुत ख़ुशी होती है। नारायण बारेठ का सानिध्य सुख था।
कुछ महीने दिनेश जोशी, रमेश पारीक, एम आर मलकानी के साथ प्रेस की टेबल शेयर करने का अवसर मिला था। पत्रकार बाबू देवकीनंदन खत्री के रचे ऐयार सा होता है, ये मुझे जोधपुर के पत्रकारों को देखने से समझ आया था। वे लोग जादुई थे मगर मुझे प्रिय थे।
मैं कभी सोजती गेट के पास नवज्योति के कार्यालय चला जाता था। वहाँ रुद्राक्ष की मालाएं धारण किये एक भव्य पत्रकार मिलता था। उसकी आँखों से लुटेरा प्यार झरता रहता था। कभी जलतेदीप जाता तो मुझे अवस्थी दिख जाते। मगर मेरा मन पास की पतली गली में घुसा रहता जहाँ माणक पत्रिका के कार्यालय का बोर्ड टँगा होता। माणक सच्चे अर्थों में ऐसी पत्रिका थी जो रेगिस्तान की दूर बसी ढाणियों में सहेजी, संभाली और प्रेमपूर्वक पढ़ी जाती थी। राजस्थान के लिए राजस्थान की ऐसी कोई पत्रिका होगी ऐसा मुझे नहीं लगता।
अयोध्या प्रसाद गौड़ का नाम मेरे लिए इन्हीं पुराने आकर्षणों और सम्मोहनों के कारण सदा परिचित रहा। उनसे एक दो बार ही मिलना हुआ। अभी जोधपुर में क से कहानी शिविर आयोजित हुआ था। उसमें दूसरी बार उनको बोलते हुए सुना। विषय का गम्भीरता से अध्ययन करना और उस पर सलीके से अपनी बात को रोचक ढंग से कहना अयोध्या प्रसाद गौड़ की ख़ूबी है।
चौथा धँधा के ऑनलाइन होने का मालूम हुआ तो मैंने ऑर्डर कर दिया। मुझे इसके टाइटल के साथ लिखी पंच लाइन से लगा कि जोधपुर के अनेक पत्रकारों को मैं इस किताब में कहीं पा सकूँगा। “पत्रकारिता के क़िस्से” से ये अनुमान लगाना गलत न था। लेकिन मुझे इसमें कहानियां मिली। सच्ची कहानियां।
जैसा कि अयोध्या प्रसाद कहते हैं कि इस किताब का उद्देश्य पत्रकारिता को बदनाम करना नहीं है ठीक वैसा ही है कि ये कहानियां पत्रकारिता को बदनाम करने की जगह पहचानपत्र की लाल पट्टी को उधेड़कर अंदर के संसार को सामने रखती हैं। मैं अख़बार के पाठक के तौर पर कहूँ तो कहना होगा कि ये किताब बदनाम नहीं करती पत्रकारिता को शीर्षक कहानी के माध्यम से नंगा करती है।
पोलीपैक किताब की ये तस्वीर आकाशवाणी के स्टूडियो में ली थी। प्यारे ए पी आपकोबधाई। मज़ा आया पढ़कर।
डायरी

हो रही छिन झिंग छिनिंग झिंग

चादर की सलवटों के नीचे 
थोड़ी सी रात बची रह गयी थी. 
इसी तरह अधेड़ आदमी की उम्र की सलवटों में 
कहीं-कहीं थोड़ा सा लड़का बचा हुआ था.
अधेड़ उम्र की गरदन में बेहिसाब दर्द था. उम्र की सलवटों में बचे हुए लड़के ने इसकी परवाह नहीं की. सुबह पांच बजे का जगा, दीवार का सहारा लिए एक चौकी पर बैठा हुआ अधेड़ निरीह नहीं लग रहा था. वह एक गलत खोल में ठूँसे हुए अकड़े और बेढब बिछावन की तरह दिख रहा था. दर्द की लहर उठती तो उसकी आँखें मुंद जाती. वह अपनी गरदन पर अँगुलियों को सख्ती से घुमाता हुआ अनुमान लगता कि कोई गाँठ है क्या? फिर सोचता कि अगर गांठों वाली बीमारी हुई तो और कितने दिन ज़िन्दा रहेगा?
उतनी ही अधेड़ औरत चाय के दो प्याले चौकी के बराबर रखकर बैठ जाती है. “चाय के साथ कुछ लेंगे?”
आदमी चाय की ओर देख नहीं सकता. वह गरदन के दर्द से हार रहा होता है. जैसे कि गरदन के दर्द ने उसे चित्त कर दिया है मगर अभी तक खेल से बाहर होने का फैसला नहीं सुनाया है. वह सामने की खिड़की की ओर देखा हुआ कहता है- “नहीं कुछ नहीं चाहिए”
“हाँ कभी कभी मेरे साथ भी ऐसा होता है कि पहली चाय के साथ बिस्किट नहीं चाहिए होते और कभी लगता है उनके बिना तो चाय पी ही न जाएगी” औरत ने चाय को सिप करते हुए कहा.
आदमी ने कहा- “हमारे काम पूरे हो जाते हैं और उम्र बची रह जाती है. तब ऐसा होता है”
औरत खिड़की के नीचे बने आले में रखे हुए प्लेयर को चला देती है. पुरुषोत्तम दास जलोटा गाने लगते हैं. ठुमकी चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियां. उनेक पीछे समूह स्वर में यही आवाज़ आती है. कीर्तन चलता रहता है. आदमी सोचता है कि रामचंद्र जब अधेड़ हो गए होंगे तब क्या उनको भी गर्दन में दर्द हुआ होगा? क्या किसी ने उनकी वह पीड़ा देखी होगी?
औरत अपनी आँखें बंद कर आँगन में चल-गिर रहे नन्हे रामजी को सोचने लगती है. उसका हाथ सहसा अपने घुटने की ओर जाता है जैसे गिरे हुए रामजी के घुटनों के धूल झाड़ रही हो. आदमी औरत को देख नहीं रहा. वह ये सब सोच रहा है. आँखें बंद किये हुए औरत उसकी प्रिय छवि है. जब भी औरत की ऑंखें खुली होती हैं तब उनमें से एक लड़की झांकती है. सायकिल पर सवार मोहनपुरा ब्रिज पर चढ़ती हुई पीछे मुड़ देखने का साहस करती हुई. उस लड़की की याद आते ही गरदन का दर्द घुटनों तक आ जाता है. वह सोचता है कहाँ गुमा दिया सबकुछ. पुल पर चढ़ती सायकिल सवार लड़की और उसे देखता हुआ लड़का.
अब बाद बरसों के जब भी औरत आँखें बंद रखती है वह आश्वस्त रहता है की वह लड़की कहीं गुम रहती है.
“बंद कर दूँ या चलने दूँ?” औरत पूछती है.
अधेड़ आदमी अपनी गरदन को घुमाता है. दर्द की एक लहर फिर से दौड़ पड़ती है. उसके चेहरे पर छुपाने में भी कुछ जाहिर हो जाता है. औरत पूछती है- “तबितय ठीक नहीं?” आदमी कहता है- “क्या इस प्लेयर में कुमार गंधर्व नहीं है?”

औरत पूछती है- “चाय और पियोगे?”

कभी-कभी हम खत्म हो चुके होते हैं. जैसे जिम मोरिसन खत्म हो जाता है. जैसे बेल्ली होलीडे खत्म हो चुकी होती है. कभी-कभी हम सिल्विया प्लाथ की तरह खत्म हो चुके होने के बाद सोचते हैं कि अब इस देह में बसे जीव का कुछ करना होगा और फिर उसे सलीके से ठिकाने लगाते हैं. लेकिन अक्सर हम खत्म होने के बाद बच्चों की अँगुलियों में फंसकर बच जाते हैं. किसी सांवली कुदरती सूरत की याद की गिरहों में रह जाते हैं मगर ज़्यादातर हम होते हैं उसी अधेड़ औरत या आदमी के पसीने की गंध सूख जाने के डर से भरे हुए, हम जिसके साथ अनेक बरसों से रह रहे होते हैं.
सुनता है गुरु ज्ञानी 
गगन में आवाज़ हो रही छिन झिंग छिनिंग झिंग छिन
औरत रसोई में जा चुकी थी. वह अधेड़ आदमी भी पीछे गया. उसे कहता है- “वाशरूम जा रहा हूँ” उसे ये कहने की ज़रूरत नहीं है कि औरत जानती है मगर वह इसलिए कहता है कि बरसों तक साथ रहने के बाद बात करने के बहाने बचाए रखने होते हैं. इससे मर जाने के बाद भी जीते रहने में आसनी होती है. 
* * *
रातों में देर तक चुप जागते सोना जैसे ये न कह पाना कि अब तनहा छोड़ दो. मन हो तो इंतज़ार करना. 
* * *
कोई एक पंक्ति कहीं छूट गयी थी. समझ न आया की इसे कहाँ रखूं. “बात करने जैसा हाल बचा नहीं है.”
* * *

[Painting image : Ashley Garrett]