कहानी, लायोश ज़िलाही, हंगरी

सब अक्षर धुल जायेंगे…

लायोश ज़िलाही एक अच्छे कवि और कथाकार थे. उनका लिखा नाटक फायरबर्ड उन्नीसवी सदी के आरम्भ में लन्दन के चर्चित नाटकों में से एक था. इस प्ले को कई सालों तक मंचित किया गया. पिछले महीने भर से उनकी एक कहानी के बारे में जब भी लिखने बैठता हूँ, तीन पंक्तियों के बाद मन बिखर जाता रहा है. कहानी का शीर्षक है ‘यान कोवाच का अंत”. इसे पढ़ते समय और एकांत के पलों में कई सारे ख़याल मेरे मन में संचरित होते रहते हैं.

कहानी का प्लाट कुछ इस तरह से है. एक दिन वह मर गया. पांच साल बाद उसकी एक रिश्तेदार महिला की मृत्यु हो गयी. इसके चौदह साल बाद उसकी चचेरी बहन मर गयी. चचेरी बहन की मृत्यु के इक्कीस माह बाद केरेपेशी के शराबखाने में एक टेबल पर बैठ कर शराब पीते हुए टेक्सी चालकों ने उसे याद किया, जो मर गया था. इसके भी पांच साल बाद एक अधेड़ महिला ने मरते समय एक लडके को याद किया. जिसने गेंहू के खेतों में उसका हाथ थामा था और उस रात पहली बार ज़िन्दगी का सुख जाना था.

इसके दो साल बाद वह चर्च आग से ध्वस्त हो गया, जिसमें जन्म और मृत्यु का ब्यौरा दर्ज था. दो और साल बाद अत्यधिक ठण्ड से बचने के लिए उसकी कब्र पर लगे लकड़ी के क्रोस को चुरा कर जला दिया गया. इस घटना के बीस साल बाद एक युवा वकील अपने पिता की अलमारी को बुहार रहा था. उसमें एक रसीद रखी थी, जिसमें लिखा था ‘चार फ्लोरिन और चालीस क्रूज़र प्राप्त किये, पोलिश की हुई दो कुर्सियों की कीमत – सादर यान कोवाच’

वकील ने इस कागज को रद्दी की टोकरी में फैंक दिया. नौकरानी ने टोकरी में रखा सब कुछ कचरे के ढेर पर फैंक दिया. कचरे पर आसमान से बादल बरसे. पानी में भीगने से मुड़े-टुडे कागज पर बचा रह गया, य… कोवा… इसके हफ्ते भर बाद फ़िर बारिश हुई. उसमें सब अक्षर धुल गए लेकिन एक बचा रह गया. इसके तीन दिन बाद फ़िर बारिश हुई और उसी क्षण मृत्यु के उनचास वर्ष बाद अलमारी बनाने वाले कारीगर यान कोवाच की ज़िन्दगी इस धरती से सदा सदा के लिए समाप्त और लुप्त हो गयी.

क्या मृत्यु एक छल प्रदर्शन का पूर्ण हो जाना है. क्या यह एक धोखा या भ्रम था कि कुछ है. वह वास्तव में था ही नहीं, होता तो भला नष्ट कैसे होता ? क्या हम वाकई किसी भ्रम के जीवन का हिस्सा हैं. क्या हमारे दुःख और सुख सभी एक अनिवार्य कल्पना के अंश हैं ? तुम जब पूछती हो हाउज़ लाइफ तो क्या उस वक़्त की सभी खुशियां बेमानी है.

यान कोवाच के नाम की तरह कितने सालों तक बची रहेगी, हमारी मुहब्बत… वो मुहब्बत जिसके तीन पाए टूट चुके है. जो बारिशों में भीग कर बेढब हो गयी है. जिसके बदन पर सर्द दिनों के पाले के निशान उभर आये हैं. जिसे धूप ने सुलगा कर आग बुझे जंगल का एक ठूंठ कर दिया है. वैसे, मैंने तुम्हारा नाम ऐसी जगह लिखा है, जिसे कोई बारिश न धो सकेगी, वह सिर्फ दहकेगा लाल और नीली लपटों में…

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