बातें बेवजह

विरेचन का आसव थी चुप्पी

मैं कितना सारा बोलती हूँ
और तुम कुछ नहीं कहते।

वह कोई और थी कि रोशनी कुछ नहीं बोलती। दीवारों को परछाई देती हुई आहिस्ता सरकती है। दिल तेज़ी से धड़कते हैं। रेतघड़ी से रेत गिरती है और ये सोचकर दिल कोई धड़कन खो देता है कि मुलाकात की इस रेतघड़ी को उलट कर नहीं रखा जा सकेगा।
ये बरसों पुरानी बात न होकर ये कुछ रोज़ पहले की या शायद बीते हुए कल की ही बात हो। लेकिन दिल को लगता है कि उससे जाने कब के बिछड़ चुके हैं। एक चुप्पी ही थी मेरे पास। उसी की कुछ बातें। बेवजह की बातें।

अंत में हम याद नहीं कर सकते
कि मिलने के समय मौसम कैसा था।

हम उलझे होते हैं
बिछड़ने का मौसम कैसा होगा
क्या हम कुछ कह सकेंगे
या चुप्पी हमको बाहों में भर लेगी।
* * *

हमने जितनी भी बातें की थीं
उनको भूल गए या उनके अर्थ खोजे।

चुप्पी सच्ची दोस्त निकली
उसी में याद रहा चूमने के बाद एक दूजे को देखना।
* * *

ईश्वर चुप्पी का मित्र था
उसे खोजा नहीं जा सकता था
किसी हुड़दंग में।

इसलिए प्रेम में चुप्पी ही ईश्वर थी।
* * *

जो चुप्पी नहीं समझता
वह शब्द भी नहीं समझेगा
ये कहकर फ़कीर चुप हो गया।

मगर प्रेम को फकीर की तरह
एक भी शब्द की कभी ज़रूरत ही न थी।
* * *

चुप्पी मृत्यु की प्रतिकृति थी।

प्रेम भी अनंत के लिए ठहरा हुआ
बहुत अच्छा दिखता था।
* * *

बचपन में यही सिखाया गया था
भय की इज़्ज़त करते रहना।

जब ख़ुद की इज़्ज़त चाही
तब प्रेम करने के सिवा कुछ समझ न आया।
* * *

बातें उलझ उलझ जाती थीं।

मगर
चुप्पी से बनते जाते थे प्रेम के पिरामिड
बस इसलिए कि
तुमको देखते जाना सबसे अच्छा था।
* * *

हर बात उलट ही सीखी दिल ने।

प्रेम किया तो सोचने लगा कि टूट न जाये
साथ हुआ तो बिछड़ने के डर से भर गया।

एक चुप्पी ही थी, जिसने हौसला दिया।
• * *

मुझे चूमने दो तुम्हारे होंठ
कुछ न कहो।

कुछ भी कहना अर्थहीन है
कि शब्दों की मृत्यु हो जाने पर
उनको चुप्पी की कब्र में ही दफनाया जा सकेगा।
* * *

चुप्पी एक धुनका थी
एक सूप थी।

काश वो तुम्हारी बाहें भी होती।
* * *

एक रोज़ मैं विष से भर गया।

विरेचन का आसव थी चुप्पी
वह चुप्पी जो तुमसे प्यार करने से उपजती है।
* * *

दोपहर उनींदी थी। जैसे पानी पर लहराती शाख से कोई फूल पानी मे गिर पड़ा हो। जैसे किसी की याद आती हो और उसे याद करना मना न हो। जैसे कोई दीवार का सहारा लिए खड़ा हो और किसी दूजे सहारे के ख़याल में खोया हो। मगर क्या होता है इस सबसे कि चुप्पी सिर्फ चुप्पी होती है। काश वह तुम हो सकती तो मैं उसे अपने चारों ओर बुन लेता।
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फिर से, बातें बेवजह

इत्ती सी बात है

शाम बुझ गयी है
मैं छत पर टहलता हूँ
अपने चप्पलों से
एड़ी को थोड़ा पीछे रखे हुए।

सोचता हूँ कि
समय से थोड़ा सा पीछे छूट रहा हूँ।

हालांकि फासले इतने बढ़ गए हैं
कि नंगे पांव रुककर
इंतज़ार करूँ, तो भी कुछ न होगा।
* * *

कितना अच्छा होता
कि जूते और चप्पल समय के साथ चले जाते
हम वहीं ठहरे रह जाते, जहाँ पहली बार मिले थे।

फिर सोचता हूँ कि न हुआ ऐसा
तो अच्छा ही हुआ
तुम वैसे न थे, जैसा पहली बार सोचा था।
* * *

क्या होगा अगर हम मिले?
जिस तरह रेल के इंतज़ार में
फाटक बंद रहता है
मन उसकी प्रतीक्षा करता है।

रेल के आने पर
रात में पटरियां चमकती हैं
एक धड़क सुर साधती है।

तपी हुई पटरियां धीरे से ठंडी हो जाती है।

इसी तरह हम क्या करेंगे मिलकर।
कोई रेल की तरह आगे निकल जायेगा
कोई पटरी की तरह इंतज़ार में पड़ा रहेगा।
* * *

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है
हंसी किसे पसन्द नहीं होती।

तुम में हर वो बात है
कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं
और भाप की तरह उड़ जाऊं।

मगर हम एक शोरगर के बनाये
आसमानी फूल हैं
बारूद एक बार सुलगेगा और बुझ जाएगा।

इत्ती सी बात है।
* * *

पता नहीं वह कौनसा शहर था
शायद मुम्बई ही होगा
मगर ये याद है
कि तुमने कहा था, रम अच्छी है
ये हमारी मदद करेगी।

मुझे रम बिल्कुल नहीं पसन्द
मैंने सब जाड़े व्हिस्की के साथ बिताए।

कैसी बात है न
फिर भी मुस्कुराता हूँ
कि तुम रम पिये हो और मेरे साथ हो।
* * *

बातें बेवजह

सर्द मौसम भला था

“ऐसे दूर हो। जैसे किसी और के पास हो।” इतना कहकर हमें चुप हो जाना चाहिए. इसे अधिक कोई क्या कह सकता है. जिस हगाह नज़र धुंधला जाये, जिस जगह पहाड़ शुरू होने लगे, जिस जगह गीलापन सूखने लगे. ऐसी हर जगह पर ठहर जाना चाहिए. बहुत गहरे विचार से पूरा समय लेकर तय करना चाहिए कि हमें अब किधर जाना चाहिए. 

सर्द दिनों में पहाड़
कोहरे से ढक जाते हैं।

सर्द दिनों में भीग जाती है
रेगिस्तान की रेत।

सर्द दिनों में समन्दर
हो जाते हैं बर्फ।

मेरा जाने क्या होगा?

कि जाने किससे हो जाये
तुमको प्रेम।
* * *

पिछली सर्दियों में तुमने बुनी थी
कहवा के प्याले के लिए स्वेटर।

इस बार के सर्द दिनों में
शायद तुम सिर्फ देख ही लो कभी, मेरी तरफ।

सर्द दिनों का केवल इसलिए इंतज़ार है।
* * *

सर्द दिनों में
कोई ध्यान नहीं देता
कि दरवाज़ा बन्द क्यों है?

इसलिये अच्छा है ये मौसम।

इसलिए भी अच्छा है
कि हम छुपा सकते हैं मुंह
और कोई नहीं पूछता
वो जो बेक़रारी थी,
वो जो इंतज़ार था कहाँ गया?
* * *

सर्द मौसम भला था
कि उन दिनों मिले थे हम।

अब भी भला होगा
कि ढके जा सकेंगे, पुराने हो चुके रिश्ते
सर्दी के नाम पर।
* * *

अक्सर ज़रूरी सवालों को समय की धूल ढक देती है। अक्सर हम भी तब तक उन सवालों को एक तरफ रखा मान लेते हैं।
* * *

बातें बेवजह

कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका

लिखना सबसे चिपकू व्यसन है. एक अक्षर मांडो तो पीछे एक कतार चली आती है. एक बार शुरू होने के बाद दिन-रात उसी में रम आते हैं. इसलिए अक्सर शब्दों को छिटक कर रेगिस्तान पर तने आसमान को चुप निहारने लगता हूँ. छत से रेलवे ओवर ब्रिज दीखता है उस पर गुजरते हुए दुपहिया-चौपहिया वाहन मेरी गुमशुदगी पर दस्तक की छेड़ करते हैं. मैं पल भर को आकाश के विस्तृत वितान के सम्मोहन से बाहर आता हूँ और फिर उसी में लौट जाता हूँ.
लिखना बस इतना था कि मुझे नीला रंग प्रिय है.
***

आँख भर नीला रंग। 

तुम्हारे कन्धों पर ठहरा हुआ।
***
वो जो हम समझे थे 
असल में बात उतनी ही नहीं थी।
***
छत, खिड़कियां, दीवार, 
अलगनी और नीम अँधेरा 
जैसे सब आ बैठें हों किसी ख़ामोशी की क्लास में।
***
अल्पविरामों से भरी एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। 
मगर गुज़रती हुई।
***
याद भीगी छत से टपकता है एक ख़याल। 
ज़िन्दगी एक करवट चुप देखती है।
शायद देखती है।
***
जितने रंग थे, उन रंगों से अनेक रंग खिलते गए. जितनी आवाजें थी, उन आवाज़ों में अनेक आवाजें झरती रहीं. जितने मौसम थे, उन मौसमों में अनेक मौसम साथ चलते रहे.

हमने ज्यादातर को न देखा, न सुना और न महसूस किया.
***

सिगार बुझ गया है सिरे तक आने से पहले
इस बात पर जाने क्यों मोहब्बत का ख़याल आया।
***

एक मकड़े ने दुछत्ती से
हवा में लगाया गहरा गोता
और वापस लौट गया।

शैतान को
उसकी अंगुलियां छूने की याद आई
और आकर खो गयी।
***

जा चुकी है भीगी रात
उम्र के लिबास से झड़ रहे हैं
बरस आहिस्ता-आहिस्ता।
शैतान तुम कहाँ हो, कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका।
***
बालकनी को चूमती
पंजों के बल खड़ी है गंधहीन पुष्ष-लता।
उनींदी, रात की याद से भरी।
***
ताज़ा खिली घास की ओट से
नन्हे बैंगनी फूल मुस्कुराते हैं।

खुले मैदान के वितान पर बादलों ने लिखी है ज़िन्दगी।

***

कुछ चीज़ें जब आपका रास्ता रोक लेती हैं तब उनका इशारा होता है कि सुकून से बैठकर अपने अतीत को याद करो।
***

तलब क्या लिखी और सामां क्या लिखा है। 
अपनी इस लिखावट पर ज़रा झाँक तो डालो ज़िन्दगी।
***
[Watercolor painting; Artist unknown ]
बातें बेवजह

जून के सात दिन-रात

कई बार हमें लगता है कि किसी एक चीज़ के कारण हमारे सब काम रुके पड़े हैं. कई बार उस चीज़ के न होने से मालूम होता है कि ऐसा नहीं था. क्या इसी तरह हमें ये समझना सोचना नहीं चाहिए कि जो कारण हमें सामने दिख रहे हैं वे इकलौते कारण नहीं है. 
इसलिए सोचिये, योजना बनाइये और धैर्य पूर्वक काम करते जाइए. 
ये कुछ रोज़ की डायरी है. तारीख़ें मुझे याद दिलाएगी कि ये दिन कैसे बीते थे. 

June 8 at 11:41pm ·

आवाज़ का दरिया सूख जाता है
उड़ जाती है छुअन की ज़मीन।

मगर शैतान नहीं मरता,
और न बुझती है शैतान की प्रेमिका की शक्ल।


June 9 at 12:09am ·

शैतान के घर में होता है 
शैतान की प्रेमिका का कमरा। 
जहाँ कहीं ऐसा नहीं होता वहां असल में प्रेम ही नहीं होता।
* * * 


सुबह से आसमान में बादल हैं। 

बिना बरसे ही बादलों की छाँव भर से लगता है कि ज़मीं भीगी-भीगी है।

किसी का होना भर कितना अच्छा होता है।
* * *

June 10 at 1:03pm ·

अतीत एक साया 
इसलिए भी नहीं होना चाहिए 
कि जितना आपने खुद को खर्च किया है, 
वह कभी साये की तरह अचानक गुम हो जाये।
* * *

ओ प्रिये
एक दिन सब ठिकाने लग जाते हैं, 

हमारे दिन भी लगेंगे. 
तब तक तुम जब भी ज़िन्दगी पियो 
ज़रा सा इशारा मुझे भी कर दिया करो.
* * *

June 11 at 3:38pm · 

सुबह छितराई हुई बूँदें बरस रही थी। मौसम सुहान था। अभी उमस है।
कि कुछ भी स्थायी नहीं। 


फिर वो ख़ुशी का उल्लास किस बात के लिए था, दुःख के आंसू क्यों थे।

* * *

June 11 at 3:50pm
उसकी नींद बाकी थी या वह प्रतीक्षा की ऊब में नींद से भरने लगी थी। उसने पैरों को कुर्सी की सीट पर रखा हुआ था। उसका सर दीवार का सहारा लिए था। उसके पीछे की दीवार पर सफ़ेद और हरे रंग की अनेक पट्टियों वाला चार्ट लगा था। सर्जरी के कई मास्टरों के नामों की कतार नीचे ज़मी तक गयी हुई थी। उसकी नींद में शायद स्टील के चमकते हुए किसी औज़ार दस्तक दी या घर में खेलते हुए अपने बच्चे के गिर पड़ने के ख़याल से चौंक से भर उठी।

उसने अपना सर फिर से दीवार से टिका लिया। गुलाबी चप्पलें कुर्सी की सीट के नीचे अविचल पड़ी रहीं।

* * *

June 11 at 11:18pm 


बालकनी को थपकियाँ देती ठंडी हवा 

और दूर टिमटिमाता जयपुर शहर।

सुनो जाना, ये याद है कि कोई अमरबेल है ।

June 12 at 11:00pm 


आज एक मुंह फेरकर खड़ी दीवार को देखा 

तो अचानक तुम्हारी याद आई।

June 14 at 11.12pm

कभी-कभी लगता है 

कि ज़िन्दगी लकड़ी का घर हो गयी है। 

तुम्हारी याद की हर चाप पर सबकुछ थरथराता है।
* * *