कहानी, नसरुद्दीन, हंगरी

कितनी ही बातें, तेरी खुशबू की याद दिलाती है

आरोन तामाशी की कहानी के पन्ने आँखों के सामने खुले हुए हैं. तीन सौ मीटर दूर से थार महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या से बिखरी हुई सी आवाज़ें आ रही हैं. मेरे पास में नुसरत साहब गा रहे हैं. दो सप्ताह के सूखे के बाद सामने एक आला दर्ज़े की शराब रखी हुई है. पीना अभी शुरू नहीं किया है. बस कहानी को पढ़ते हुए दो बार आँखें पोंछी और फ़िर तीन बार बरबस मुस्कुराया हूँ. इतालवियों द्वारा बंदी बनाये गए सैनिकों के केम्प से छूट कर आये सिपाही की इस अद्भुत कहानी को पढ़ते हुए जोधपुर के चिरमी बार की एक शाम सामने आ खड़ी हुई. उस रात पहली बीयर पी चुकने के बाद, मैंने उसे फोन किया और कहा कि हम कब मिलेंगे ? उसने पूछा किसलिए ? मेरे मुंह में रखा हुआ बीयर का स्वाद बेहद कसैला हो गया था. मैंने फ़िर से पूछा कि तुम मुझसे नहीं मिलना चाहती ? उसने इस सवाल का क्या उत्तर दिया था याद नहीं लेकिन वो हमारी आखिरी बातचीत थी।

फ्लेश बैक में कई साल गुजरने लगे. बस स्टेंड पर रिज़र्वेशन की लाइन में लगी हुई, सिनेमा हाल के बाहर मुझे छाया में खड़ा कर के टिकट लेने के लिए भीड़ को चीरती हुई, अपने दो हाथों में फ्रेंच फ्राइज़, टमाटो केच-अप के पाउच, दो आइसक्रीम और बहुत से पेपर नेपकिंस पकड़े हुए एक मुस्कुराती हुई लड़की घूमने लगी थी. ये भी याद आया कि सात साल में कोई एक लम्हा ऐसा न था जब मैं इसे भूल गया था या इसने हर तीसरी शाम मुझे फोन न किया हो. आरोन का नायक अपने घर लौट रहा था और इस ख़ुशी को एक ही पंक्ति में कोई विलक्षण कथाकार ही व्यक्त कर सकता है. जब मैं उसके पास जा रहा होता था तब की उस ख़ुशी को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हुआ करते थे लेकिन महान कथाकारों के पास होते हैं. अच्छा फीचर लिखने के लिए मुझसे सिखाया गया था कि पाठक एंट्रो पढ़ कर ही उसका भविष्य तय कर देता है कि आगे पढ़ा जायेगा या नहीं. इस कहानी का आरम्भ इतना ही रॉकेट इंजन जैसी उर्जा लिए हुए है. उसकी हर एक पंक्ति मेरी गति को बढाती जाती है.

जैसे पेट्रोल इंजन को, उसी तरह उल्लास उसे धकेले लिए जा रहा था. बिना टोपी की चिथड़ा वर्दी और भारी फौजी बूट पहने. अत्तिल्ला के हूणों का ठेठ वंशधर. इतालवी बंदी शिविरों में तीन साल बिता कर वह वापस घर लौट रहा था. मोड़ पर पहुँचते ही अचानक ठिठक कर खड़ा हो गया. उसके सामने गाँव फैला पड़ा था. आँखों ही आँखों में जैसे समूचा दृश्य लुढ़क कर उसके दिमाग में समां गया, सिर्फ गिरजाघर की मीनार बाहर रह गयी थी. उसकी आँखों के कोनों में आंसू तिर आये. अपनी झोंपड़ी के पिछवाड़े पहुँच कर वह रुका. किसी तरह फेंस पर चढ़ कर आँगन में कूद गया, कूदते ही बोला “मेरी झोंपड़ी” और उसकी आवाज़ में हंसी की खनक थी.

कथा के नायक ने अपनी झोंपड़ी के बाहर के आँगन में बेतरतीब उग आई खरपतवार से आशंकित होते हुए आवाज़ लगाई, शारी… दोस्तों वहां उस नायक को उत्तर देने वाला कोई नहीं था. शारी भी उसी तरह जा चुकी थी जैसे पिछले सात सालों से साथ रह रही मेरी उस दोस्त ने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया था. गोविन्द त्रिवेदी के साथ हरी लान वाले टूरिस्ट बार में बैठ कर बीयर पीते हुए मुझे दुनिया हसीं लग रही थी और एक फोन के बाद सब उजाड़ हो गया. मैंने अगली दो बीयर सिर्फ इसलिए पी कि मुझे नशा हो सके मगर नशा उस समय नहीं होता है जब आप टूट बिखर रहे होते हैं. जब आपको सुनने और थामने वाला कोई नहीं होता.

रात बारह बजे जोधपुर से रेगिस्तान की ओर जाने वाली ट्रेन शांत खड़ी थी. मैंने अपने सारे काम निरस्त कर दिए थे. पीठ पर बांधे जाने वाले काले रंग वाले छोटे बैग के साथ बेंच पर बैठा हुआ सिगरेट पी रहा था. रेलवे स्टेशन सुस्ताया हुआ जान पड़ता था. सारा कोहराम मेरे भीतर घुस आया था. शोर करते और एक दूसरे को ठेलते हुए विचार मेरे दिल और दिमाग में टकरा रहे थे. आँखों में आंसू थे और दिमाग कहता था कि तुम उसके दिल का बोझ थे और अच्छा हुआ कि उतर गए. इसे हर बार ख़ारिज किया और अपने सेल की तरफ देखता रहा कि वह अभी चमकने लगेगा.

ओ मेरे नसरुद्दीन, तुम्हें पता है ? आरोन की कथा का नायक अपनी प्रेयसी के जाने के बाद एक गधा खरीद कर लाता है और उससे प्रेम करता है. मैं इसे पढ़ते समय मुस्कुराता हूँ. चिरमी बार बुझ जाती है किन्तु उस महबूब की आँखें फ़िर भी मेरे पास चमकती रहती है.
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कहानी, शाम, स्कायलार्क, हंगरी

कोस्तोलान्यी का लुटेरा

छोटे गरीब बच्चे की शिकायतें, इस कविता संग्रह या स्कायलार्क उपन्यास के कारण देजो कोस्तोलान्यी को जाना जाता है. मुझे ये दोनों शीर्षक पसंद है. बुझे हुए तमाम सालों की राख में बस इतना ही याद आया कि इसे कहीं किसी पन्ने पर पढ़ा होगा. घनीभूत होते हुए ख़यालों और बवंडर से उड़ते आते सवालों के बारीक टुकड़ों के बीच पिछला पखवाडा बीता है. हर काम को ठीक कर देने के तय समय पर कई और काम सिर पर आ पड़ते रहे हैं. विगत साल की गरमी बड़ी दिल फ़रेब थी कि मैं कई चिंताओं से आज़ाद रहा और शामें बेफिक्र आइस क्यूब को पिघलते हुए देखने में बीत गई थी. इधर पाता हूँ कि शाम हुए छत पर गए एक अरसा हो गया है. चारपाई पर बैठे हुए मैंने अपने पांवों को दीवार पर रखा और हंगेरियन कहानियां पढने लगा.

जो कहानी सबसे पहले पढ़ी उसका शीर्षक था, लुटेरा. मैंने इसे एक साँस में पढ़ा. शीर्षक पढ़ते समय मैं कहानी के भीतरी तत्वों के बारे में नहीं सोचता हूँ क्योंकि मैं खुद अपनी कहानियों के लिए एबस्ट्रेक्ट से उन्वान चुनता रहा हूँ. देजो की इस कहानी को ह्रदय परिवर्तन की कथा कह कर उसके मनोवैज्ञानिक तत्वों की हत्या नहीं करना चाहता हूँ. ये वास्तव में ह्रदय के अन्वेलिंग की कथा है. मैंने असंख्य कहानियों के बारे में लिखा हुआ पढ़ा है कि कथा के पात्र का ह्रदय परिवर्तित हो गया. ये एक नासमझी की बात है क्योंकि मेरे विचार से ह्रदय के कोमल और इंसानी कोनों पर पड़ा हुआ पर्दा हटा करता है.
कथा का नायक किसी आवेग से दूर रहते हुए घटते जा रहे के प्रति निरपेक्ष बना रहता है. यह सहज प्रवाह परिस्थितियों को सुगमता से गढ़ता है. मैं बहुत बार खुद को किसी काम या रिश्ते के बीच में जैसा हूँ वैसे छोड़ दिया करता हूँ. चीज़ों में हस्तक्षेप के लिए समय को चुनता हूँ कि वही तय करे मेरे लिए उचित क्या होगा और आगे रास्ता किधर जाता है ? ज़िन्दगी और कहानियों में कोई सामीप्य हो जरुरी नही है लेकिन दोनों ही अनुमानों से परे होने के कारण ही प्रिय हुआ करती है. देजो की इस कथा में एक गहरी सुरंग है. जिसमे वारदात को किया जाना है. ये स्थान एक संकेत है कि हर एक की ज़िन्दगी में हताशा भरा, अँधेरा समय आता है और उसी समय जीवन के बड़े हादसे घटित होते हैं.

लुटेरा पाठक के भीतर ही छिपा बैठा है. उसके पास पर्याप्त उपस्करण हैं और उचित कार्य योजना है. शिकार के लिए सावधानी से बुना हुआ जाल भी है. मुख्य पात्र एक रेल यात्रा के दौरान किसी कमजोर स्त्री को लूटना और उसकी हत्या कर देना चाहता है. जैसा कि हम प्रति दिन किया करते हैं. हमारा दिन एक लालच भरी आशा के साथ उगता है. उसमें हम उन सभी कामों को रेखांकित होते देखना चाहते हैं जो औरों के लिए किये जा रहे हैं. हम अपने दिन को प्लान भी करते हैं. एक परफेक्ट प्लान जिसमें सर्वाधिक फायदा हमारा अपना हो. इस तरह दुनिया भर के मासूम लुटेरे अपने ही हाथों शिकार होकर शाम ढले खुद के बिस्तर पर मृत पाए जाते हैं एक लालच भरी अगली सुबह के लिए… इस कहानी में ये सब नहीं लिखा है बल्कि ऐसा कहानी को पढ़ते हुए बुझती हुई शाम के सायों में महसूस किया है.

कथाएं मेरी संवेदनाओं को जीवन स्पर्श देती हैं. देजो कोस्तोलान्यी के बारे में सोचते हुए मुझे इस कठिन दौर के पत्रकार याद आने लगते हैं, जो अपनी रचनाशीलता को कार्पोरेट प्रबंधन के नीचे दम तोड़ देने के स्थान पर कहानी और कविता की तरफ मोड़ देते हैं. खैर इस कहानी पर लिखे इन शब्दों को मैं उन लुटेरों के नाम करता हूँ. जो बिना कारण कुछ नहीं करते या जिनके बेहतर ज़िन्दगी के फूलप्रूफ प्लान अभी पाइप लाइन में हैं. सच तो ये है कि हम लोग समर्पण किये हुए बंदी सिपाही की तरह जी रहे हैं. अपना खुद के हिस्से का समय लुटेरों को सौंप चुके हैं. लूट के विचार से प्रेरित इस दुनिया से मैं इत्तेफाक नहीं रखना चाहता हूँ. मेरी ख्वाहिश अपने लिए किसी शराबखाने की आवारा शाम बुनना है.

कहानी, नसरुद्दीन

तेरी याद का एक लम्हा होता हैं ना, बस वह…

रात नसरुद्दीन अपने गधे को पुकारता रहा लेकिन गधा भड़भूंजे की भट्टी से बाहर फैंकी गई राख में लोटता रहा. नसरुद्दीन उससे नाराज़ हो गया. सुबह गधे ने उदास सी रेंक लगा कर कहना शुरू किया.

रात, मैंने एक कहानी पढ़ी है. उसका शीर्षक है धूप के आईने में और इसका अर्थ लगाया है कि खिले हुए दिन में जो साफ़ दिखाई देता है. इस कहानी में कहा है कि महबूब का घर दिल में होता है तो फिर इंसान क्या खोजता फिरता है ? कहानी में एक मोची है, वह दुनिया के आम आदमी का प्रतिनिधि. मुझे लगता है कि वह मैं हूँ. ऑफिस जाता हुआ, माँ को अस्पताल ले जाता, बच्चों को हौसला देता. पत्नी के सुखी और संपन्न परिवार के सपने को पूरा करता हुआ. उस सपने को अपने विश्वास से सींचता हुआ. हाँ मैं वही मोची हूँ जो सफ़र के लिए सुरक्षित पांवों की चाह वाले लोगों की मदद करता है.

जो अपने जूते और मजबूत करवा लेना चाहती है वह मेरी आत्मा है. उसके बारे में मुझे कुछ खास मालूम नहीं है कि ये हमेशा बेचैन रहती है. इसकी फितरत ऐसी है कि हमेशा धोखे खाता रहता हूँ. मेरी आत्मा मुहब्बतों के छलावे में दर्द और फ़िराक की सौदागर है. मैं अपने दुनियावी परिवार की हिफाज़त में लगा होता हूँ तब ये नए हादसे लेकर आती है. ऐसे सौदे पटाती है कि मुझे खुद हैरानी होती है. मन के मुसाफिर खाने के प्रियजन मुझे इसरार और इक़रार के बारे में याद दिलाने में जुट जाते हैं. ये वही है जिन्होंने कभी वादा किया होता है कि मेरी चाहत सिर्फ़ तुम हो इसके सिवा कोई चाहना नहीं है.

कहानी में एक लड़का था, जिसको पीले फूलों के खिले होने का गुमान होता है. वे पीले फूल वसंत के मादक नशे के कारण उसे दिखाई देते हैं. वह थक कर इसलिए बैठ जाता है कि आपको सिर्फ़ वे लोग ही नहीं समझते जो आपके सबसे अधिक करीब होते हैं. वह आसेबज़दा है यानि प्रेतों से घिरा हुआ. वे प्रेत वस्तुतः उसके घर में रहने वाली असंख्य इच्छाओं के है. एक प्रेत ऐसा है जो कहता है कि आज़ादी की हत्या करके ही एक विश्वसनीय घर की पहचान होती है. इन प्रेतों का ये भी कहना है कि घरों में उदास या खुश रहना हालाँकि मना नहीं है परन्तु एक आवश्यक शर्त है कि ख़ुशी या उदासी के सबब परिवार से बाहर नहीं होने चाहिए.

कहानी में रंगीन लिबास की एक लड़की है, ये सृष्टि है. उसे चूमती और संवारती है. उसे नया रचने के लिए प्रेरित करती है. उसे कहती है, वसंत का आना सकारण है. तुम्हारे भीतर सूखते जा रहे पत्तों को झड़ जाने दो. अपनी खुद की तलाश में निकलो. ऐसा करने से तुम बचे रहोगे. सृष्टि उसे कहती है कि मेरी ये अभिलाषा इसलिए है कि तुम मेरे लिए उतने ही जरुरी हो जितना कि मेरा होना. लड़का उसके रंगीन लिबास में छुप जाता है यानि वह सृष्टि को अपने पास महसूस करता है. मन के पराग कणों के संचरण से उपजी इस दिव्य अनुभूति से सुकून उमगता है.

गधे ने मजबूर आँखों से नसरुद्दीन को देखा और एक लम्बी सांस लेते हुए कहा. मैं बहुत मामूली हूँ. मुझे भी उतनी ही तकलीफें, व्यस्तताएं और जिम्मेदारियां मिली हुई हैं जैसी तुम्हारे पास हैं. मेरे पास अविश्वसनीय शक्तियां नहीं हैं. मैं अदृश्य होने का हुनर नहीं जानता हूँ. मेरे पास मायावी जिस्म भी नहीं है कि अपनी धुंए जैसी पूंछ की एक फटकार से ऐसे लोक की रचना कर दूं जहां सब सुख बरसते हों. किसी काल्पनिक जीवन में भरोसा भी नहीं है, जो जी रहा हूँ वही सच है कि मुझे कई जोड़ी आँखें सवाल करती हैं. वे आँखें मेरी चुप्पी पर उदास हो जाती हैं. मेरे हंसने पर मुस्कुराती है. उन आँखों में भी मेरा इंतज़ार है इसलिए मैं सदा अपने को परदे या एकांत में नहीं रख सकता हूँ.

नसरुद्दीन ने गधे को कहा मुझे कहानियों से कोई मतलब नहीं है. मुझे जब तुम्हारी जरुरत होती है तब तुमको होना चाहिए. ऐसा कहते हुए वह गधे के लम्बे राख भरे कानों को सहलाने लगा. उसकी धूल सनी गरदन को बाँहों में भर लिया और बहते हुए नाक से थोड़ा आगे जबड़े के पास चूमने लगा.

कहानी, बातें बेवजह

फिर शाम आएगी, वो फिर याद आएगा

हमें अपने पास बहुत सा स्पेस रखना चाहिए. ज़िन्दगी में, दिमाग में और दिल में भी क्योंकि भरी हुई जगहें अक्सर बोझ बन जाया करती है. मैंने जब काज़िमीर मलेविच का नाम सुना तो खास अचरज नहीं हुआ था. रूसी लोगों के नाम ऐसे ही होते हैं. मुझे ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ था कि वे एक काले रंग की स्क्वायर और सफ़ेद पर सफ़ेद रंग की पेंटिंग बनाने के लिए जाने जाते हैं. इसी तरह डेविड स्मिथ की अमूर्त शिल्प कला और हैरत में डाल देती है. काले रंग का स्क्वायर बनाना भला कोई अविस्मरणीय काम हो सकता है ? या फिर एक ऐसा शिल्प जिसमें डेविड एक स्क्वायर पर एक क्रोस खड़ा करते हैं फिर उस पर एक स्क्वायर रखते हैं फिर उससे एक आयत चिपक जाता है… मेरे लिए ये सब अबूझ है, अविवेचनीय हैं.

ऐसी ही अमूर्त और अनगढ़ ज़िन्दगी हम सब जीते हैं. मैं पिछले कई सप्ताह से कुछ कहानियों के ड्राफ्ट लिख लेना चाहता हूँ लेकिन दिन बहुत छोटे हो गए हैं और नयी खुशबुओं ने अपनी पांखें फैला रखी है. सांझ के धूसर नग्में, रात के तन्हा बिछोडे़ मुझे अपने पहलू में छिपा लेते हैं. इन दिनों शराब की उम्दा क्वालिटी है, मौसम में ठण्ड भी है और दिन में चमकती हुई धूप भी है. सोचता हूँ कि बीज (स्त्री-पुरुष) ने ज़मीन (कोख) से बाहर सबसे पहले अपना सर उठाया होगा फिर उसने साँस ली होगी और अपने पांवों में हौसला भर कर पानी की खोज में निकल गया होगा. इसी तरह निश्चिन्तता से जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते देख कर बीज के रचयिता की ऊब बढ़ गयी होगी. फिर उसने प्रेम जैसी शय का आविष्कार करके बीज को उपहार में दिया होगा ताकि वह सिर्फ पानी (शराब) जैसी मामूली चीजों को आसानी से पा लेने की जगह प्रेम जैसी कठिन चीज के पीछे भागता फिरे.

दरख्तों के पार ज़मी को चूमता
आंख से छिटकता है शाम का आखिरी लम्हा
स्याह दर्द का रंग घुल जाता है क्षितिज के पार.

सोचता हूं उन गुलाबी हथेलियों पर भी
रेशमी अवसाद की सुनहरी तितलियां
दम तोड़ती होंगी.

इतना तय पाता हूँ कि
सफ़र की झोली कुछ और हल्की हो जाती है,
गहरी सांस लेता हुआ, कोई दुआ देता हुआ
एक और दिन चौखट से उठ ही जाता है.

रात की चुप्पी में अंगुलियां
स्मृति की सलवटों को करीने से रखने लगती है
तो रूह यकायक चौंक उठती है, जैसे तूने छू लिया है
और इस तरह कुछ भी जाया नहीं होता.

बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं

* * *

दोस्त तुम जब आओ तो सात समंदर पार से अपने हिस्से की रातों के कुछ लम्हे चुरा लाना. हम उन्हें पनियल ख़ुशी से भिगो कर गर्म सांसों से सुखायेंगे फिर उन पर अभ्रक का नूर उभर आएगा. वे तुम्हारे लौट जाने के बाद भी मेरी याद में चमका करेंगे. मैंने तुम्हारे लिए भी एक तोहफा सोच रखा है कि तुम्हारी पलकों पर अज़रक प्रिंट बहुत फबेगी.

आत्मकथा, कहानी, नष्टोमोह, साईमन मार्क मोंजेक

ब्रिटनी मर्फी और ये याद का टीला

पानी के बह जाने के बाद रेत पर जानवरों के खुरों के निशान बन आये हैं. उन्हीं के साथ चलता हुआ एक छोर पर पहुँच कर बैठ जाता हूँ. सामने एक मैदान है. थोड़ा भूरा थोड़ा हरा. शाम ढलने में वक़्त है. ये विक्रमादित्य का टीला नहीं है, ये किसी प्रेयसी की याद का टीला है. यहाँ से एक काफिला किसी सुंदरी को जबरन लेकर गुजरा होगा. वह कितनी उदास रही होगी कि पूरे रस्ते में वही अहसास पीछे छोड़ गई है. मैं भी अक्सर चला आया करता हूँ. मैं अपने साथ कुछ नहीं लाता. पानी, किताब, सेल फोन जैसी चीजें घर पे छोड़ कर आता हूँ. मेरे साथ कई दिनों के उलझे हुए विचार होते हैं. मैं उनको रेत की सलवटों पर करीने से रखता हूँ.
रेत की एक लहर से आकर कई सारी लहरें मिल रही हैं. इन्हीं में एक ख्याल है साईमन मार्क मोंजेक का, वह उसी साल दुनिया में आया था जिस साल मैंने अपनी आँखें खोली थी. मैं इस समय रेत के आग़ोश में किसी को सोच रहा हूँ और वह होलीवुड की फोरेस्ट लान में बनी अपनी कब्र में दफ़्न है. वह बहुत ख्यात आदमी नहीं था. उसने दो तीन प्रेम और इतनी ही शादियाँ की थी. इसमें भी कुछ ख़ास नहीं था कि उसने कुछ फिल्मे बनाई, निर्देशन किया और स्क्रिप्ट्स लिखी. वह लन्दन में पैदा हुआ बन्किंघम्शायर के लम्बे चौड़े खेतों के बीच में स्कूल के रस्ते को याद रखते हुए पंद्रह साल की उम्र में अपने पिता को खो बैठा. उसे टेलीविजन से प्रेम हो गया था. वह अपने ख़यालों में इसे एक अद्भुत दुनिया मानता था. उसी में जाकर बस गया. वहां से उजड़ा तो अमेरिका चला गया.
मैं ऐसे पात्रों को बहुत पढ़ता और जीता आया हूँ जिन्होंने प्रेम किया, देह का उत्सव मनाया, तूफ़ान में पतंग की तरह आसमां की ऊँचाई को छुआ और सात आठ साल काम करके पैंतीस साल की उम्र से पहले मर गए. कैसी उदासी है मेरे भीतर कि जापान के टोक्यो शहर की एक गली में बाईस साल के नौजवान चार्ट बस्टर सिंगर की मृत्यु को नहीं भूल पाता. जाने क्यों ऐसे ही आम और खास लोगों की जीवनियाँ और आत्मकथाएं ढूढता फिरता हूँ. उन्हें सहेज कर रखता हूँ. रात को जब पीता हूँ तो उन्हें वाइन भी ऑफ़र करता हूँ.
साईमन की मृत्यु अभी दो महीने पहले ही हुई है. उस दिन मुझे ख़बर नहीं हुई. अगले दिन प्रधानमंत्री जी की प्रेस कांफ्रेंस थी तो उस पर लिखने लग गया था फिर कई दिनों तक मुझे ब्रिटनी मर्फी जैसी खूबसूरत महिला की याद नहीं आई. मैंने शराब को भी नहीं चखा. मैं एक कहानी लिखने लगा. कहानी को इम्प्रेशन से बचाने के लिए कहीं घूमने भी नहीं गया. यानि मैंने ब्रिटनी और साईमन से खुद को बचा कर रखा. कल जाने क्यों उन्हें भुला नहीं पाया. सोचता रहा कि जिस लड़की को उसका पिता दो साल की उम्र में छोड़ जाए और उसकी माँ उसके एक इशारे पर जान देने जितना प्यार करते हुए पाले. वह एक दिन फिल्मों की चका चौंध में चहेता नाम बन जाये और दूसरी शादी के बाद अवसाद में चली जाये. कितना तेज कदम सफ़र है ज़िन्दगी का…
पिछले साल दिसंबर में ब्रिटनी मात्र बत्तीस साल की उम्र में मर गई. उसकी मृत्यु के कारण बताये गए थे कि वह बहुत अधिक एनीमिक हो गई थी और हृदयाघात को सहन नहीं कर पाई. मुझे बहुत अफ़सोस होता है कि इस दो साल के विवाहित जीवन में अपनी माँ और पति के साथ रहते हुए भी ब्रिटनी को किस चीज की कमी थी कि उसने कोकीन जैसे पदार्थ का सहारा लिया. हालाँकि अमेरिकी चिकित्सा विभाग इस बात की पुष्टि नहीं करता मगर ये सच है कि उसने अत्यधिक मात्र में नशीले पदार्थों का सेवन किया और दो महीने में ही चालीस पौंड से अधिक वजन खो दिया था.
मुझे पश्चिम की जीवन शैली और उसके जीवन पर प्रभावों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं है. उनकी क्या खूबियाँ और क्या खामियां है नहीं जानता मगर इतना समझ आता है कि भारतीय जीवन शैली मेरे जैसे अवसाद प्रेमी को बचा कर रखने में कामयाब है. अपने रचे गढ़े गए अफसोसों के साथ रहते हुए मुझे कभी इस तरह से जीवन को समाप्त करने का विचार नहीं आया. मैं हर बार ऐसे दौर को जी भर के जीते हुए आगे बढ़ा हूँ. कल भी सोच रहा था कि जिस दुनियां में शादियाँ और प्रेम क्षण भंगुर हैं वहां आखिर ऐसा क्या था कि मर्फी के जाने के बाद साईमन पांच महीने से अधिक जीवित न रह सका. उसने भी ब्रिटनी की तरह अपने जीवन का अंत क्यों कर लिया ? और वह ब्रिटनी की माँ जिसने दूसरी शादी ही नहीं की… अभी भी उस घर में कैसे रहती होगी ? किस ह्रदय से उसने पांच महीने के अंतराल में दो बार इमरजेंसी को फोन कर के बताया कि कोई मरने वाला है और वे सच में चले गए.
तुम भी बिना मिले मत जाना किसी से… मेरे जैसे लोग उनके लिए भी दुआ करते हैं जिनको कभी देखा ही नहीं…