कहानी

तबेले का धुंधलका

वो पाकिस्तान से चला आया. अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ. कई दिनों तक एक पेड़ की छाँव में पड़ा रहा. उससे कंजर अच्छे थे. जिनके पास तम्बू वाले घर थे. उससे भिखारी अच्छे थे. जो किसी प्रत्याशा के बिना मंदिरों के आगे पड़े रहते थे. वह एक ठेला लगाना चाहता था. उसे यकीन था कि एक ठेले के सहारे वह तीन लोगों का पेट भर लेगा. उसके पास सर छुपाने को जगह न थी. देश आज़ाद हुआ था और सेना के ट्रक शांति बहाली के लिए गश्त कर रहे थे. 
वह असंख्य दुखों के बीच भी अपनी जिजीविषा का पोषण करता जा रहा था. जीवन के कष्टप्रद थपेड़े, उसका मनुष्यों के आचरण से परिचय करवा रहे थे. वह सिंध से आया हुआ हिन्दू था. इसलिए वह सिन्धी हिन्दू था. इसलिए वह एक सिन्धी था. अपने वतन से बिछड़ कर नए शहर में अपनी बीवी और छोटी बहन के साथ एक घरोंदे की तलाश में, एक शरणार्थी सिंधी। 
वर्ष 1948 में मनोरंजन पत्रिका में छपी रांगेय राघव की ये कहानी “तबेले का धुंधलका” विस्थापन की पीड़ा का दस्तावेज़ है. इस कहानी में रांगेय राघव ख़ुद कथा के मुख्य पात्र हैं. यानी प्रथम पुरुष ही अपनी कथा कह रहा है. इस तरह की बुनावट कि आपकी साँस निकल जाये. इतनी सरल कि आपके कलेजे के पार उतरता हुआ दो धार वाला चाकू. सोचे गये आगामी अनगिनत भयों की कहानी.

एक दिन पत्नी कहती है। आज बीस एक हिन्दू तुम्हारी बहन को उठा कर ले जाते. मैंने बड़ी मुश्किल से बचाया है. इस सलवार के कारण वे इसे मुस्लिम समझ बैठे थे। कहानी में आखिर एक सेठ का गोदाम, आशा जगाता है. उसके पिछवाड़े में रहने के लिए एक छोटा सा तबेला है. सेठ का आदमी कहता है वह उनको इस जगह पर टिका सकता है. वह किसी काम की तलाश में बाहर जाता और थोड़ी देर बाद अचानक कर्फ़्यू की घोषणा हो जाती है. 

कहीं गोली चलने की आवाज़ सुनाई देती है. वह दौड़ता हुआ अपने तबेले की ओर भागता है. दरवाज़े पर अचानक किसी से टकरा जाता है. दोनों व्यक्ति गिर जाते हैं. ज़मीन से उठते हुये सामने वाला पूछता है, चोट तो नहीं लगी. वह अपनी पत्नी से कहता है, दरवाज़ा बंद कर लो. पुलिस आ रही है. उसकी पत्नी कहती है. सेठ का आदमी आया हुआ है. उधर अँधेरे में. 
वह बैठ जाता है, नहीं वह वहीं गिर पड़ता है. 
पत्नी उदासी से कहती है. 
मैं जानती हूँ तुम इसे सह नहीं सकते. पर… पर वह मुझे पसंद जो नहीं करता था. 
***
पाकिस्तान से आये सिन्धी को तबेले में रुकने देने के एवज में सेठ के आदमी द्वारा उसकी बहन की अस्मत का हर लेना. दुखियारी पत्नी का कहना कि वह अगर उसके साथ राज़ी हो जाता तो वह कभी बहन के साथ न होने देती. फिर ये कहना कि रहने को ठिकाना मिल गया है. परदेस में कैसी इज्ज़त ? यह मनुष्यता नहीं है. मनुष्य का रोज़गार, घर और इज्ज़त के साथ जीवन यापन कर पाना ही सभ्यता में जीने की निशानी होती है. 
कहानी मेरी आत्मा को ठोकर मारती है. मेरे चेहरे पर थूक देती है. मेरे हिरदे को बींध देती है. मैं सुबह के अख़बार के पहले पन्ने पर एक तस्वीर देख रहा हूँ. बेंगलुरु से असम लौटते हुए असंख्य नौजवानों की, या शायद देख रहा हूँ कि हज़ारों सिन्धी पाकिस्तान से चले आ रहे हैं. या मैं पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता वाले इंसान के वतर्मान को देख रहा हूँ. 

***
[Image courtesy : deccanchronicle.com]

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कहानी, हंगरी

एक उड़ने वाला गाँव

मिहाई बाबित्स की कथा का एक पात्र भद्र लोगों के शहर में एक संभ्रांत शराबघर में असंभव की हद तक की घृणा और अपने शरणार्थी होने के अकल्पनीय दुःख से भरा हुआ आराम कुर्सी पर बैठा है. वह अभी अभी दोस्त हुए एक आदमी को कहानी सुना रहा है. श्रोता उसको टोकते हुए कुछ पूछता है. कथा के बारे में अचानक अविश्वास से पूछे गए प्रश्न पर कहता है. क्या तुमने कभी हवा में मेज खड़ी कर देने वाला तमाशा देखा है ? प्रश्नकर्ता अपना सर हिला कर हामी भर देता है.

“मेज हवा में कैसे खड़ी हो जाती है. ध्यान करने से, एकाग्र मन से. अगर ध्यान करने से एक साधारण सी मेज हवा में खड़ी हो सकती है तो हम एक मकान नहीं उठा सकते ? एक गाँव नहीं उड़ा सकते ? वह गाँव जहाँ हम बड़े हुए, जहाँ आज भी हमारी आत्मा भटक रही है. विश्वास करिए अगर मेरी तरह आधी रात को आप भी भागे होते, अगर आपने बर्फीली हवा के थपेड़े खाते हुए खुले मैदान में पहाड़ों की शरण में रात बितायी होती, आपके ख़यालों में होता आपका घर, गाँव के पेड़, उस गाँव की चीज़ें और आपने सोचा होता कि कल तो आप उन सबके बीच थे, कल तक तो आपने सपने में भी नहीं सोचा था कि आपको उनको छोड़ कर भागना पड़ेगा तो आप शेख चिल्ली की तरह ख़यालों में खो जाते. आप भी सोचते कि आपके ख़याल आपके घर को क्यों नहीं उड़ा लाये और सारी दुनिया ने आपके ख़यालों का हुक्म क्यों नहीं बजाया.”

प्राइमरी के अध्यापक से विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तक का सफ़र करने वाले और न्यूगात के संपादक रहे, बाबित्स इस कहानी में बेघर और अपनी ज़मीन से बेदखल होने के अहसासों गहरी बुनावट है. इसे पढ़ते हुए मैं एक बारगी अपनी इस ज़मीन से लिपट जाने के ख़याल से भर उठता हूँ. आप भी अपने बंगले, घर, फ्लेट या झोंपड़ी में बैठे हों और ये हुक्म मिले कि आपको अब यहाँ से विदा होना होगा. अपने साथ आप उतना ही ले जा सकेंगे जितना आपकी दो भुजाओं में सामर्थ्य है और वक़्त उतना ही दूर है जितनी दूर फौजी बूटों से आती आवाज़. आप सबसे पहले अपने बच्चों के हाथ थामेंगे फ़िर भयभीत पति अथवा पत्नी को दिलासा देती असहाय नज़रों से देखते हुए, अपने माता पिता को खोजने लगेंगे. यह दृश्य आपके ज़हन में आते ही उडीसा, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, गुजरात, नोएडा, थार मरुस्थल का बाड़मेर, उपजाऊ सिंगुर, नमकीन कच्छ, जंगल, भूख, तेंदू पत्ता, खेजड़ियाँ, सागवान, चन्दन, नदियाँ सब भूल जायेंगे. सिर्फ़ एक अदृश्य मुहर आपकी तकदीर पर लगी हुई दिखाई देगी. इस पर लिखा होगा, शरणार्थी.

हावर्ड फास्ट के उपन्यास पीकस्किल के नीग्रो पात्र जिन्हें अपनी ही जगह पर कुत्ते से बदतर जाना और व्यवहार किया जाता था. शरणार्थी न थे. वे अपमान सह रहे और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे काले योद्धा थे. रियोनुसुके अकूतागावा की कहानी शकरकंद की लपसी का लाल नाक वाला नायक ‘गोई’ बेरहम ज़िन्दगी जीते हुए, उपहास के थपेड़ों से टकराते हुए, किसी एक व्यक्ति का प्रिय हो जाने की ख्वाहिश के साथ, एक दिन के लिए मीठा पकवान खा लेने की हुलस लिए फिरते कुत्ते जैसा होने के बावजूद शरणार्थी नहीं है. राबर्ट लुई स्टीवेंसन का मार्खिम, विद्रूप जीवन से हारा हुआ है. अपने आप को कोसता है लेकिन शरणार्थी नहीं है. इसी तरह जीवन में दुःख सर्वत्र है. दुख का निदान असंभव है. ज्ञान के आलोक में अपनी धरती से प्रेम दुखों का मरहम है. एक बार झुक कर उस मिट्टी को चूम लेना, जिसने जन्म दिया अतुलनीय औषधि है. इस दवा का छीन लिया जाना हद दर्ज़े का ज़ुल्म है. यह सबसे बड़ा दुःख है.

देशों के विभाजन से संक्रमण करने वाले अथवा अपने ही देश में अपनी ज़मीन से बेदखल प्राणी शरणार्थी है. बाबित्स की इस कहानी को कई बार पढने के बाद मेरे मन में ऐसे विचार आये जिनको बड़ा नाकारा कहा जा सकता है. एक विचार आया कि मेरे देश में आज कहानी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर कहे जाने वाले लेखकों की प्रतिबद्धताएं किन से जुड़ी है. नौजवान होती पीढ़ी के विवाहपूर्व के सहवास के सम्बन्ध, जिन में एक ही लड़की या लडके के तीन चार बार के दोहराव से प्रेम की खिल्ली उड़ाती हुई कथाएं. गाँव से बेदखल हुए गरीब की घर से भागती हुई बेटियां. उन बेटियों के अंगों का भौतिक रूपांकन. पत्नी के पडौसियों से सम्बन्ध. धार्मिक आस्थाओं को ओढ़े फिरने वाले चरित्रों के पिछवाड़े का फूहड़ वर्णन. प्रेम के नाम पर गुलाबी रोयों पर आख्यान. राजनीति, क्रिकेट और पब का कॉकटेल. समाज की स्फूर्त रगों में दौड़ती गालियों के मुहावरे और एक छायावादी रूपकात्मक अंत. मैं इसे निम्नतम स्तर का मानता हूँ.

गाँव से शहर आये गरीब आदमी को शरणार्थी के रूप में कभी देखा है. वो वक़्त कितना कठिन रहा होगा जब जननी जन्मभूमि से मजबूर कर देने वाली हालातों में बेदखल होना पड़ा होगा. क्या नई पीढ़ी के दुःख की लकीरें राज्य के चेहरे पर दिखाई देती है ? हमारे ऊर्जावान लेखकों ने कभी सोचा है कि नितम्ब एंव उघडे हुए कूल्हों की बातें करते और पेंट की जेब में निरोध लिए फिरते बच्चों के जिस संसार को अपनी कथाओं में रचते हो उसके लिए सुनहरा भविष्य कहां रखा है. वह साहित्य कहां है, जिसमें वन नाईट स्टेंड, फक-यू और फक ऑफ़ के इतर एक बेबस और लाचार दुनिया है. वह कहानी कहां है जिसमें लिखा है कि माओवादी, नक्सलवादी या भगवा पट्टी सर पर बांधे घूमते हुए युवाओं के रोज़गार किसने छीन लिए ? उनके इकहरे पवित्र प्यार की मिठास को कौन निगल गया.

हम आत्म परीक्षण के अभाव में पीत लेखन के बहुत करीब पहुँच गए हैं. नए बहु राष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान जिस तरह का लिखवाना चाह रहे हैं. वह कमोबेश पतनशील साहित्य है. जिस पर तुम यथार्थ का वर्क चढ़ा कर खुश होने का ड्रामा कर सकते हो. कितने लेखकों के पास ऐसे उपन्यास लिखने का कांट्रेक्ट है कि वे एक गरीब अछूत के इकलौते प्रयासों से आर्थिक राजधानी में सर उठा कर जीने का मुकम्मल सपना सच होते लिखेंगे, जंगलों और ज़मीनों से बेदखल हुए लोगों का शहरी समाज की गंदगी में डूबते जाने और उससे उबरने की छटपटाहट को लिखेंगे. जिस आरक्षण से देश के एक बड़े तबके का भला होना था, उसे किसने ज़हर का प्याला बना दिया है. घर में पांडुर पिशाच के साथ अकेली छूट गयी नव सामंत परिवारों की स्त्रियों के दुःख और वेब के पोर्न में उलझे हुए मासूम बच्चों के बचपन के हरण के बारे में लिखने का कांट्रेक्ट किसके पास है. सोचता हूँ कि गाली की स्वीकार्यता, अश्लील का जबरिया श्लीलकरण, स्त्री को कामुक देह और पुरुष को व्यभिचार का पिटारा लिखने वाले आत्ममुग्ध और भीतर से कामलिप्सा से भरे हुए युवा कार्पोरेट लेखकों की बडाई करने वाले बुजुर्ग लेखकों की पीढ़ी के लिए कोई आईना है या नहीं ?

मिहाई बाबित्स के नायक का गाँव, जिससे वह खदेड़ दिया गया था. उसके बेटे के सपनों में आता है. खेत में उगी घास चलने लगती है. गिरजा अपने प्यारे बच्चों से प्यार करने के लिए झुक जाता है. घर अपनी खिडकियों से उन सब फौजियों को बाहर फैंक देते हैं, जिन्होंने उन पर कब्ज़ा कर लिया था. हमारी आत्मा अपनी ज़मीन को पुकारती रहती है. अपने गाँव के ख़्वाब देखता हुआ छोटा सा बेटा सर्द रातों से चार दिन लड़ता हुआ आखिरकार पिता की बाँहों में मर जाता है. इस तरह एक ‘उड़न छू गाँव’ हर रात उम्मीदों के ख्वाबों से सजा हुआ अपने प्रिय बाशिंदों तक पहुँच जाया करता है. और उस गाँव से निकाला गया हर मनुष्य अपनी अंतिम साँस काल्पनिक रूप से उसी गाँव में लेता है. उसकी आत्मा का अपेक्षित मोक्ष उसकी अपनी जन्मभूमि में है. जिस तरह नए दौर के लेखकों को पढ़ते हुए मैं उदास हो जाता हूँ. उसी तरह बाबित्स की कहानी का नायक कहता है. मनुष्यों के विपरीत इस शराब में आत्मा है.

* * *

कहानी, यानोश कांदोलान्यी, हंगरी

औरत की जगह

बाढ़ के पानी पर बर्फ जम आई थी अब वहां दूर तक स्केट किया जा सकता था. एक दुपहरी में दस लड़कियाँ कन्धों पर स्केट लटकाए, गौरैयों की तरह चहकती हुई झुण्ड में पहुँच गयी. लड़कों को ये बर्दाश्त ही नहीं हुआ कि वहां लड़कियाँ भी स्केट करे. उन्होंने चीखते हुए उन पर हमला बोल दिया. रीयल जिम्नेजियम स्कूल के एक मोटे लड़के ने सबसे आगे खड़ी लड़की के पास पहुँचते ही अपनी बांह एक झटके से हवा में घुमाई और अपनी नाक छू ली. वह छोटी लड़की डर के भाग गयी. उसके पीछे डर कर चीखती भागती लड़कियों को देख कर लड़के ठहाके लगने लगे.

एक लड़की गिर पड़ी. लड़कों ने कहा अगर ऐसा ही होने लगा तब तो औरतें फ़ौजी बैरकों में भी आने लगेंगी, बल्कि लड़ाई के मैदान में लड़ने भी पहुँच जाएगी. औरतों की जगह घर है या फ़िर चर्च… यानोश कांदोलान्यी की कहानी रक्त अनुबंध के इसी भाग पर मैं रुक जाता हूँ. इसलिए कि ईश्वर के रखवाले दुनिया की जिस जगह भी हैं, उन्होंने औरतों के लिए जगहें निर्धारित कर रखी है. मेरे मित्र जब तुम एक सामूहिक ईश्वर के पक्ष में खड़े होते हो तब दुनिया की आधी और जरुरी आबादी के विरोध में खड़े होते हो.

कुछ माह पहले एक पुस्तक का उल्लेख करते हुए मेरी एक मित्र ने सुन्दर लेख लिखा था. उसकी अंतर्निहित भावना थी समानता और बाहरी तौर पर उठाया गया विषय था, आवारागर्दी. इस सतही प्रश्न की गहराई में गंभीर प्रश्न छुपा है. ये किसने तय किया है कि औरतों के काम क्या है और आदमी की असीम आज़ादी का छोर किस जगह पर है ? किस वजह से सभी लड़के इस लैंगिक भेद पर एकजुट क्यों है कि लड़कियाँ बेहतर जगहों पर स्केट नहीं कर सकती, क्यों उनके लिए चूल्हा और बाईबिल को सुनना ही श्रेयस्कर है. जब तुम इसी तरह बोलते या सोचते हो तब कभी ख़याल आया कि सामूहिक ईश्वर किस साज़िश का नाम है.

खैर ये कहानी दो सहपाठियों की है. एक सूखी भिन्डी है और दूसरा मोटा आलू. वे दोनों एक दिन अपनी अँगुलियों पर पिन चुभोते हैं. वे अपनी अंगुलियाँ आपस में मिलाते हैं और उन दोनों का रक्त अनुबंध हो जाता है. यह एक अटूट बंधन का विश्वास है. इसी विश्वास के सहारे बर्फ पर गिरी हुई कस्बे की सबसे सुन्दर लड़की ज़ोन चुपोर को धमका रहे मोटे लड़के को सूखी भिन्डी एक घूँसा जड़ कर गिरा देता है और लड़कों से बगावत कर उस गुलाबी गालों, नीली आँखों और सुनहरे बालों वाली ग्यारह साल की लड़की को अपने साथ भगाता हुआ ले जाता है.

उस दुबले लड़के की धड़कने हर वक़्त ज़ोन चुपोर के लिए कविताएं लिखने लगती है. वह अपने दोस्त को बताता है कि ज़ोन कितनी सुन्दर है और उस दिन के साहस प्रदर्शन के लिए बहुत चाहती है. दोस्त, मैंने उस लड़के को सिर्फ़ इसलिए मार गिराया कि मुझे विश्वास था कि तुम मेरे साथ हो. मैचस्टिक नाम से जाना जाने वाला मास्टर एक दिन उसकी मेज़ के आले की तलाशी लेने का काम उसी दोस्त को सौंपता है जिसके साथ उसका रक्त अनुबंध है. सूखी भिन्डी नामकरण वाला कवि ह्रदय नन्हा प्रेमी जिसका वास्तविक नाम कोलर था, खुश हुआ लेकिन उसके दोस्त ने मेज़ के आले से कविता का पुर्जा खोज कर मास्टर को सौंप दिया.

उस माचिस की तीली जैसे मास्टर ने कविता का पाठ कराया फ़िर कविता के पुर्जे को उसकी हथेली में रख कर पतले फुट्टे से तब तक मारा जब तक कि वह कागज पूरी तरह से फट न गया. मोटे आलू ने ऐसा धोखा क्यों किया ? मेरे पास इसका निश्चित उत्तर नहीं है. संभव है मोटे आलू को लगा हो कि सूखी भिन्डी की प्रेमिका उस मित्रता से उपजे साहस की देन है और उसका असली हकदार मोटा आलू यानि वह खुद ही है.

कहानी के अंत में यानोश कांदोलान्यी ने सूखी भिन्डी के बारे में सिर्फ़ इतना लिखा है कि उसकी आँखों के आगे गहरा काला पर्दा पड़ गया और उसे कहीं कोई नज़र नहीं आया, कोई नहीं. कहानी का आरम्भ इस पंक्ति से होता है. “जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु है मित्रता”.

कहानी, देसो सोमोरी, हंगरी

वह एक भयंकर ईश्वर था.

पांच हज़ार साल ईश्वर की उपासना करने के बावजूद ज्ञात देवों ने मनुष्य जाति पर कोई महान उपकार नहीं किया है. सब एक ही बात पर पर अटके हुए हैं कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की है इसलिए उसका आभारी होना चाहिए. उनके पास अभी तक इस बात का जवाब नहीं है कि उस महान रचयिता ने क्रूर हत्यारे और वहशी आदमखोर क्यों रचे हैं ? इसके जवाब में भी एक कुतर्क आता है कि अच्छाई के लिए बुराई को रचना जरुरी है. तो क्या ईश्वर कोई बुकी है जिसने अपने आनंद के लिए मनमर्जी के खेल को फिक्स किया है.

कई दिन पहले एक कहानी पढ़ी थी, “पाल वायला’स लाइफ”. देसो सोमोरी की इस कथा का मुख्य पात्र पेशे से चित्रकार है. वह कलाकारों के अक्सर गायब हो जाने वाले आनुवांशिक गुण से भरा हुआ है. वह सही मायनों में मस्तमौला है. एक बार लौट कर आया तो दाहिने हाथ की दो अंगुलियाँ नहीं थी. लोगों के पूछने पर इतना सा कहा – कुछ नहीं होता, ऐसे अधिक हीरोइक लगता है. रंगों और ब्रशों के लिए अभी बहुत कुछ बचा है और मैंने अपना उत्साह अभी नहीं खोया है.

एक दिन पाल को नया काम मिला. एक धनी व्यक्ति ने क्राइस्ट का चित्र बनाने का प्रस्ताव दिया. उसने भविष्य के नायाब और व्यक्तिगत ईश्वर के लिए हर दाम देने का वादा भी किया. पाल ने एक मॉडल खोजा जिसे सलीब पर लटकना था. हाथों और पैरों में कीलें और उनसे बह कर जम चुका गाढ़ा खून, सर पर काँटों का ताज. पाल ने धनी व्यक्ति द्वारा दिए गए सारे पेंगोज उस मॉडल को सौंप दिए. इस चित्र के पूरा होने से पहले ही कुछ ठट्ठेबाज, पाल को चौंकाने की गरज से उसे खोजते हुए उसके पांचवे माले के मकान तक पहुँच गए. उन्होंने जो देखा वह भयानक था. मॉडल कई दिनों तक क्रोस पर लटका रहने से मरणासन्न था.

पुलिस के आने तक मॉडल ने दम तोड़ दिया. धनी व्यक्ति ने कहा कि उसने सिर्फ़ तस्वीर बनाने को कहा था. इस तरह का कृत्य करने के लिए ये चित्रकार ही ज़िम्मेदार है. पाल ने कहा मैं उस ईश्वर की घोर यंत्रणा कैसे व्यक्त करता अगर मैं उसे अपने सामने तड़पते हुए नहीं देखता ? मैंने सारे सौ-सौ पेंगोज के नोट उसके कदमों में रख दिए थे, वहीं तड़पने के लिए, डटे रहने के लिए ताकि मैं निश्चिन्त होकर काम कर सकूँ. सोमोरी की इस कथा के नायक का जीवन बस इतना ही था कि बाकी सारी उम्र उसे जेल में बितानी पड़ी.

इस कहानी में मनुष्य ही ईश्वर है. एक भयंकर ईश्वर. देसो ने अंपनी युवावस्था लन्दन और पेरिस के उस काल में बितायी थी जिसमें मनुष्य ने एक आधुनिक विश्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होते हुए देखा था. कबीलाई जीवन और आखेट से मुक्त होकर समाज ने नवीन मानव कलाओं को अंगीकार किया था. उनकी इस कथा में त्रासद जीवन और घोर गुंजलक विचारों वाले पात्र, विद्रोही सत्य के पक्षधर हैं. वहीं हृदयस्पर्शी भाषा में सख्त जीवन की चिंगारिया है. पुलिस कप्तान जब पाल के कमरे में दाखिल होता है तो बनी हुई तस्वीर और मॉडल के बारे में देसो लिखते हैं.

वह एक भयंकर ईश्वर था… मुरझाये व्यक्ति की तीखी नग्नता, उभरती हुई नसों की विभीत्सता, तनी हुई मांसपेशियों के साथ क्रोस पर लटका हुआ. उसके खुले हुए विकृत होठों से सफ़ेद झाग निकलते हुए. जो उसके समूचे चेहरे के चारों और रजत परिवेश बना रहे थे. जैसे आत्मबलिदान की चीत्कार. सुर्ख और भयभीत आँखें किसी स्वर्गिक आश्वासन की ओर टकटकी लगाये हुए थी.

* * *
कहानी, लायोश ज़िलाही, हंगरी

सब अक्षर धुल जायेंगे…

लायोश ज़िलाही एक अच्छे कवि और कथाकार थे. उनका लिखा नाटक फायरबर्ड उन्नीसवी सदी के आरम्भ में लन्दन के चर्चित नाटकों में से एक था. इस प्ले को कई सालों तक मंचित किया गया. पिछले महीने भर से उनकी एक कहानी के बारे में जब भी लिखने बैठता हूँ, तीन पंक्तियों के बाद मन बिखर जाता रहा है. कहानी का शीर्षक है ‘यान कोवाच का अंत”. इसे पढ़ते समय और एकांत के पलों में कई सारे ख़याल मेरे मन में संचरित होते रहते हैं.

कहानी का प्लाट कुछ इस तरह से है. एक दिन वह मर गया. पांच साल बाद उसकी एक रिश्तेदार महिला की मृत्यु हो गयी. इसके चौदह साल बाद उसकी चचेरी बहन मर गयी. चचेरी बहन की मृत्यु के इक्कीस माह बाद केरेपेशी के शराबखाने में एक टेबल पर बैठ कर शराब पीते हुए टेक्सी चालकों ने उसे याद किया, जो मर गया था. इसके भी पांच साल बाद एक अधेड़ महिला ने मरते समय एक लडके को याद किया. जिसने गेंहू के खेतों में उसका हाथ थामा था और उस रात पहली बार ज़िन्दगी का सुख जाना था.

इसके दो साल बाद वह चर्च आग से ध्वस्त हो गया, जिसमें जन्म और मृत्यु का ब्यौरा दर्ज था. दो और साल बाद अत्यधिक ठण्ड से बचने के लिए उसकी कब्र पर लगे लकड़ी के क्रोस को चुरा कर जला दिया गया. इस घटना के बीस साल बाद एक युवा वकील अपने पिता की अलमारी को बुहार रहा था. उसमें एक रसीद रखी थी, जिसमें लिखा था ‘चार फ्लोरिन और चालीस क्रूज़र प्राप्त किये, पोलिश की हुई दो कुर्सियों की कीमत – सादर यान कोवाच’

वकील ने इस कागज को रद्दी की टोकरी में फैंक दिया. नौकरानी ने टोकरी में रखा सब कुछ कचरे के ढेर पर फैंक दिया. कचरे पर आसमान से बादल बरसे. पानी में भीगने से मुड़े-टुडे कागज पर बचा रह गया, य… कोवा… इसके हफ्ते भर बाद फ़िर बारिश हुई. उसमें सब अक्षर धुल गए लेकिन एक बचा रह गया. इसके तीन दिन बाद फ़िर बारिश हुई और उसी क्षण मृत्यु के उनचास वर्ष बाद अलमारी बनाने वाले कारीगर यान कोवाच की ज़िन्दगी इस धरती से सदा सदा के लिए समाप्त और लुप्त हो गयी.

क्या मृत्यु एक छल प्रदर्शन का पूर्ण हो जाना है. क्या यह एक धोखा या भ्रम था कि कुछ है. वह वास्तव में था ही नहीं, होता तो भला नष्ट कैसे होता ? क्या हम वाकई किसी भ्रम के जीवन का हिस्सा हैं. क्या हमारे दुःख और सुख सभी एक अनिवार्य कल्पना के अंश हैं ? तुम जब पूछती हो हाउज़ लाइफ तो क्या उस वक़्त की सभी खुशियां बेमानी है.

यान कोवाच के नाम की तरह कितने सालों तक बची रहेगी, हमारी मुहब्बत… वो मुहब्बत जिसके तीन पाए टूट चुके है. जो बारिशों में भीग कर बेढब हो गयी है. जिसके बदन पर सर्द दिनों के पाले के निशान उभर आये हैं. जिसे धूप ने सुलगा कर आग बुझे जंगल का एक ठूंठ कर दिया है. वैसे, मैंने तुम्हारा नाम ऐसी जगह लिखा है, जिसे कोई बारिश न धो सकेगी, वह सिर्फ दहकेगा लाल और नीली लपटों में…