डायरी

बातें करने का स्वप्न

बीते कल की शाम से कोई सपना देख रहा हूँ। सपने में बातें किये जा रहा हूँ। एक बार बात रुकती है तो फिर चल पड़ती है। बेरी के सूखे पत्ते बेचने वाली टाल वाले बा कहते थे कि तीसरा फल पककर गिरता है। मेरे ख़यालों में पेड़ पर मिमझर उतरती है। उनसे फूल बनते हैं। फूलों से फल। वे बेहिसाब हैं। उनमें तीसरा फल कौनसा है? सही जवाब न मिलने पर रेलवे फ़ाटक की ढलान से दूर आ जाता हूँ। 
फिर से आहट होती है और सपना आरम्भ हो जाता है। इस बात के लिए कि हमने बात यहीं छोड़ी थी, अब फिर शुरू होती है। सपना लगातार चलता है। जाने पहचाने लोगों के रेखाचित्र खींचते हुए। भूली हुई पहचान को फिर से गढ़ते हुए सपना अचानक रुक जाता है। 
सुबह पौने छः बजे लिफ्ट के ग्राउंड फ्लोर पर आते ही बिल्ली इंतज़ार करती मिलती है। मैं और बेटी मुस्कुराते हैं। मैं पूछता हूँ दिल्ली जाओगी? बिल्ली भाग जाती है। बिल्ली को किसी और से वास्ता रहा होगा। हम गाड़ी स्टार्ट करके गांधीनगर रेलवे स्टेशन की ओर चल देते हैं। स्टेशन के बाहर पार्किंग की लंबी कतार थी। मानु स्टेशन को गयी और मैं गाड़ी पार्क करने पीछे लौटा। दीवार पर बैठी एक और बिल्ली ने जम्हाई ली। उसने जाने क्या कहा। 
शैलेश इंतज़ार कर रहे थे। कहते हैं- “आप दिल्ली में तो दो घण्टे पहले स्टेशन दौड़ जाते हैं। आज आप जयपुर में केवल पांच मिनट पहले आये?” मैं देखता हूँ शैलेश के हाथ मे ट्रॉली बैग है। मेरे पास पर्स नहीं है इसलिए प्लेटफॉर्म टिकट के अभाव में उनके साथ अंदर नहीं जाता। बस इतना कहता हूँ कि आप सी टू में है और मानु सी थ्री में मिल लीजियेगा। 
कार में बैठते ही सपने की याद आती है। मैं बातें कर रहा था। हाथ जाने किस तरह हिलता है कि किसी एफएम पर सुबह के भजन चलने लगते हैं। मैं उनके अर्थ लगाना चाहता हूँ। प्रवचनकर्ता कहता है कि तुम इसे अपना शरीर समझते हो इसलिए दुख पाते हो। मैं सोचता हूँ कि किसी दूसरे के शरीर में कैसे घुस जाऊं? 
दोपहर की धूप की ओर मोढ़ा की पीठ किये पानी पीता जाता हूँ। अचानक फिर प्रवचनकर्ता की याद आती है। मैं कहता हूँ बाबा दारू पियोगे? ये शरीर अपना तो है नहीं इसमें जो चाहो सो ठूंस दो। लेकिन बाबा सुबह छह बजे में पीछे छूट गए थे इसलिए जवाब नहीँ आता। नींद की एक थपकी राग देस की तरह बजती है। राग देस फूल की तरह बजता है। फूल पराग की तरह बजता है। पराग मधुमक्खी की राग में बजता है। शायद कोई मधुमक्खी ही हो। 
आंख खुलती है तो फिर पाता हूँ कि सपना चल रहा है। मैं बातें कर रहा हूँ। 
उचक कर देखता हूँ कि जिस तरह बाँधकर सामान लाया था, वह उसी तरह ड्रेसिंग टेबल के पास रखा है। दिन कितने झड़ गए अंगुलियों पर गिनता हूँ। कब वापस जाऊंगा ये गिनने लगता हूँ। घर खाली है। मगर खाली कहाँ है? एक सपना चल रहा है कि बातें कर रहा हूँ। किसलिए, क्यों? 
अक्षयपात्र के गुम्बद के पीछे सूरज डूब रहा है। चाय का प्याला रखा है। सपना भी कहीं आस-पास होगा। शायद।
* * *
[Image courtesy John Dillon, Dublin, Ireland]
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