डायरी

धुएं के नीम नशे में स्वप्न

ये एक सामान्य दोपहर थी. उमस कम थी. एक सिगार के पैकेट में पड़े हुए कुछ सिगार बहुत पुराने हो चुके थे. क्या उनका स्वाद अब भी वैसा ही है. जबकि तम्बाकू पर बंधे हुए पत्ते में दरारें आ गयीं थी. बीस एक सिगारों में निचले वाली परत से उल्फत ने एक साबुत दीखता हुआ सिगार निकाला.- “लीजिये इसे ट्राय कीजिये.” वह सिगार घुमाकर देखने से साबुत दिख रहा था. उसकी ख़ुशबू अभी तक काफ़ी बाकी थी. 
शहर के स्टेशन रोड पर हलके बादलों की छाँव कभी कभी शामियाना तान रही थी. बाज़ार में लोग कम थे. शादियों का आखिरी सावा निकल चुका था. निम्बू वाले गायब थे. बारिशो में पिलपिले हुए आमों से ठेला भरे हुए खड़ा आदमी ख़ुद बेहद गंदा था. उसे देखते सिगार के धुंएँ को खींचने के यत्न करते हुए पाया कि सिगरेट से इसका स्वाद अलग है. जीभ पर एक नीम कड़वाहट उतर आई है मगर गला अभी धुएं की खरोंच से बचा हुआ है. 
घर आया तो दोपहर अलसाने लगी. आँखों में नींद ने अपने पाँव पसार लिए. 
और स्वप्न की आहट हुई. 
विदेश में कहीं किसी काउंटी का क्लब था. जैसे हमारे बगीचे होते हैं. एक लम्बा रास्ता. उसके पास लोहे की फेंसिंग में हेजिंग के लिए खड़ी हरी झाड़ियों की कतार. आगे जाकर एक चौकोर बड़ा भवन जिसके नादर अलग अलग कमरे होंगे ऐसा आभास था. उसी हाल के बायीं तरफ बास्केटबाल का कोर्ट था. मैंने डॉक् हार सीढियाँ चढ़कर बायीं तरफ मुड़ते समय देखा कि वहां चार पांच लोग हैं. उनमें एक नौजवान था. एक अधेड़ उम्र का कपल था. बाकी दो लड़के थे. उनके बारे में ठीक से नहीं मालूम मगर वे कुल पांच लोग थे. 
औरत धीरे से बास्केटबाल कोर्ट की तरफ बढ़ी. मैंने देखा कि वह हवा में उछली. उसने कलाबाज़ी खाते हुए बास्केट रिंग की तरफ छलांग लगाई थी. ,उझे आश्चर्य हुआ कि वह इतना ऊँचा कैसे कूद सकती है. वह असल में बास्केट करने वाले खिलाडी की तरह कूदी ज़रूर थी लेकिन वह रिंग के ऊपर जाकर बैठ गयी.
एक छोटा सा गेप आया. जैसे अँधेरा फैल गया हो. 
वे चार लोग कहीं जा रहे थे. औरत बास्केट बाल बोर्ड के बराबर ऊँचाई पर लोहे के सपोर्ट पर बैठी थी. मैं उसकी तरफ बढ़ा. उस सपोर्ट तक पहुँचने से पहले मैंने देखा कि औरत में रुमान भर आया है. औरत बैठी थी. उसने पाने पाँव लम्बे किये हुए थे. वह मुझे पास न आने के संकेत की तरह ख़ुद को मुझसे दूर कर रही थी. असल में वह दूसरी तरफ झुक गयी थी. मैंने इसको नज़र अंदाज़ किया. मैं उसके करीब पहुंचा. एक छुअन को दो तीन बार दोहराया.  मैंने अपना सर उसकी दायीं जांघ पर रख दिया. आँखें बंद कर ली. 
अचानक औरत उन चार लोगों के साथ उसी रास्ते वापस जाती हुई दिखी. जिस रास्ते से मैं इस क्लब में आया था. औरत उनसे कह रही थी कि मैं इस बात की शिकायत करुँगी. मुझे लगा कि वह अपने पार्टनर के बारे में कह रही है. औरत और वे लोग बाहर चले गए तब वह नौजवान अचानक मेरे पास से गुज़रा. उसने मुझे कहा- “आपने ये क्या किया?”
नौजवान इतना कहकर खो गया. औरत का पार्टनर उस बड़ी बिल्डिंग के एक रास्ते पश्चिम की और जाता दिखाई दिया. उसकी बायीं जेब से एक लम्बी पिस्तौल झांक रही थी. उसका रंग चमकीला था. जैसे वह चाँदी से बनी है. वह आदमी अचानक पलटा. इसके पलटने के साथ मुझे ये अहसास हुआ कि वह मुझे खोज रहा है. शायद वह गोली चलाएगा. मैं दीवार के एक तरफ छिप गया. 
सहसा लगा कि वह आदमी मुझे खोजते हुए लुका छिपी की तरह दीवार के सहारे चलता हुआ मुझे देख लेना चाहता है. मैं गिव अप के हाल में पहुंच गया था. मैंने सोचा कि इस आदमी के साथ इस खेल में हार जाऊँगा. 
इसी भय में स्वप्न टूट गया.
* * *
दिन इतने तनहा है कि किसी आवाज़ में कोई रुमान नहीं आता. असल में मुझ तक मेरी या किसी की आवाज़ ही नहीं आती. 
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