डायरी

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.

सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.

इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
बाड़मेर के महाबार गाँव में तीन औरतों के साथ एक साथ ऐसा हुआ. ये समाचार शहर और जिले भर में तुरंत फैल गया. इसे कुछ समाचार चैनल के संवाददाताओं ने आगे राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. समाचार ने एक भय मिश्रित कौतुक जगाया लोग अस्पताल की ओर भागे. उपचार के लिए भर्ती की गयी इन पीड़ित महिलाओं को देखने पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और जन प्रतिनिधि पहुंचे.
चुड़ैल की शिकार सभी महिलायें गहरे सदमें में थी. सदमें की वजह चोटी काटने के बाद आने वाला संकट था. ज़ुबानी, सोशल और अन्य माध्यमों में ये प्रचारित है कि जिस महिला के साथ इस तरह का हादसा पेश आता है, उसकी तीसरे रोज़ मौत हो जाती है.
परसों रात कोई एक बजा होगा कि लोहे के चद्दर से बने दरवाज़ा पीटने के शोर और लाठियों के ज़मीन पर पटकने के शोरगुल से आँख खुली. मैं किसी बुरे स्वप्न में था. शोर सुनकर मैं तेज़ी से चारपाई से उठा. नींद में ही तेज़ कदम रेलिंग के उस छोर पर पहुँच गया, जिस तरफ से आवाज़ें आ रही थी. मोहल्ले भर के लोग जाग गए थे. ज्यादातर छतों पर ही सो रहे थे बाकी छत पर चले आये. शोरगुल पांच सात मिनट चला और उसके बाद लोगों के ऊँचे स्वर में बतियाने की आवाजें आने लगी. कहीं-कहीं आवाज़ में हलकी हंसी के साथ थोड़ा उपहास भी था.
मैं चौंका की इस तरह नींद में रेलिंग तक चले आना खतरनाक था. मुझे हड़बड़ी में जागते ही ऐसा न करना चाहिए था. तीसरी मंजिल से अगर गिरता तो चुड़ैल मेरी चोटी काटने की जगह हाथ-पाँव तो तोड़ ही देती. या चुड़ैल को कहानियां सुनना प्रिय होता और वह एक लेखक को ख़रगोश या चूहा बनाकर अपने साथ ही ले जाती.
पड़ोस की तीसरी गली में शोरगुल थम गया था. छतों पर खड़े लोग सामान्य हो रहे थे. मैं वापस चारपाई पर लेट गया. चुड़ैल की वापसी हो चुकी थी. मोहल्ले में घंटे भर बाद सन्नाटा छा गया था.
मुझे हलकी नींद आई और मैं भी चौंक पड़ा. अपना सर ऊपर किया और देखने लगा कि छत पर कोई है तो नहीं. सीढियों के पीछे कोई छुपा तो नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं कि चुड़ैल चारपाई के नीचे ही रेंग रही हो. मुझे ख़याल आया कि चुड़ैलों को शराब पीनी चाहिए या सिगरेट. इससे उनकी उपस्थिति का पता चल सकता है. एल्कोहल की महक या जलती हुई चिंगारी देख कर पहचाना जा सकता है. लेकिन जिस तरह मनुष्य समाज भले लोगों से भरा है. जो शराब और सिगरेट से दूर रहते हैं. उसी तरह संभव है कि चुड़ैल समाज भी सभ्य चुड़ैलों से भरा हों. ऐसे ख़यालों के बीच मुझे नींद आ गयी थी.
सुबह मालूम हुआ कि भूराराम के घर पर सो रही उसकी बच्ची चिल्लाते हुए जगी. उसने कहा कि चुड़ैल आ गयी है. वह मेरे बाल काटने ही वाली थी कि मेरी आँख खुल गयी. मेरे जागते ही वह कहीं छुप गयी है. परिजनों ने दरवाज़ा पीटना और शोर मचाना शुरू किया. लड़की की नींद उड़ चुकी थी. कुछ जागरूक नौजवान गली भर में डंडा बजाते हुए घूमे कि देखो चुड़ैल डरकर भाग चुकी है.
जिला अस्पताल में उपचार को आई एक महिला को डॉक्टर ने दो-चार थप्पड़ लगा दिए. डॉ साहेब जाने किस भोपे, तांत्रिक या झाड़ागर से एमबीबीएस करके आये थे. उन्होंने विधिवत अगरबत्ती जलाई और हाथ उठाया. आस पास उपस्थित लोगों ने इसका विडिओ बनाया. आज के अख़बार में ख़बर है कि उन डॉ साहेब को सेवा से निलम्बित कर दिया गया. जयपुर के बड़े भोपों ने उनको हाजरी देने अपने पास बुला लिया है.
महाबार मेरा प्रिय गाँव है. लेकिन बाड़मेर शहर की सीमा से लगा महाबार गाँव महज एक गाँव नहीं है. ये एक अघोषित राष्ट्र है और इसका संविधान अलिखित है. यहाँ की अनूठी और विरल जीवन शैली से रोचक तथ्य सामने आते रहते हैं. कभी महाबार से कच्ची शराब की आपूर्ति हुआ करती थी. कभी चोरी गए माल को महाबार और आगे के गांवों के धोरों से बरामद किया जाता था. कभी सिलसिले से लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होते थे. कभी संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को महाबार के धोरों पर जमूरे इक्कठे हुआ करते थे. सरकारी लवाजमा आता. बेरिकेडिंग होती. शहर भर के लोग आते. नाच गाना होता. कभी मुम्बैया सिने संसार के गवैये आते.
मुझे कोई आश्चर्य न हुआ कि बाड़मेर में चुड़ैल का प्रकोप इस गाँव से शुरू हुआ. गाँव में चर्चा थी कि सत्तर-अस्सी साधुओं का एक दल आया हुआ है. वे तीन चार लोगों के समूह में बंटकर घूमते हैं. वे इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है. वे भिक्षा के लिए घर घर जाते हैं. जो कोई अन्न देता है. उसका कुछ नहीं होता. जिस परिवार ने दस बीस रुपये दिए थे. उनके घरों में ही चोटी कटने की घटनाएँ हुई.
मैं जब दस बारह साल का था तब पिताजी ने लुहारों के बास में एक कच्चा घर बनाया था. वह घर लुहारों के घरों से ज्यादा विलासी दीखता था. कि उसकी छत भी थी. लुहारों के पास घास फूस की छत वाले पड़वे थे. उनके पास आग की छोटी भट्टियाँ थीं. वे खेती बाड़ी में काम आने वाले औजार बनाते थे. साथ ही घर के लिए ज़रूरी चीज़ों का निर्माण भी करते थे. ये गाडोलिया लुहार नेहरू जी के आदेश से बसाए गए थे. इसलिए मोहल्ले का नाम नेहरू नगर रखा गया था.
एक दोपहर हल्ला हुआ कि आग लग गयी है. मैं भी भागा. मैंने देखा कि पड़ोस के एक झोंपड़े में आग लगी है. आग घास फूस की छत वाली चोटी में लगी थी. उसे तुरंत बुझा दिया गया. इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा कि हर दिन किसी न किसी झोंपड़े में आग लगती. इस आग से लपटें उठती. इसे तुरंत काबू कर लिया जाता. किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती. इस जादुई आग के पीछे कहा जाने लगा कि एक लुहारण किसान बोर्डिंग के आगे सामान बेच रही थी. वहां कोई साधू चिमटा खरीदने आया. ग्राहक और दुकानदार के बीच अप्रिय संवाद हुआ. दुकानदार को साधू ने श्राप दिया कि जिस तरह तुमको तपना पड़ता है उसी तरह अब जलते भी रहना. आखिरकार इस श्राप से बाहर आने को बाबा रामदेव से विनती की गयी. उनकी कृपा से आग लगनी बंद हो गयी. बाबा रामदेव ने साधू के श्राप को डीएक्टिवेट कर दिया. उनके इस उपकार के बदले एक मन्दिर का निर्माण किया गया. बाबा रामदेव के ये मंदिर अब भी मोहल्ले में उपस्थित है लेकिन एक निजी संपत्ति हो गया है.
कुछ साल बाद मैंने सुना कि कोई प्रेतात्मा आ गयी है. वह क़स्बों में लोगों के घरों के बाहर दरवाज़े पर लाल स्याही की चौकड़ी बनाकर चली जाती है. जिस घर के दरवाज़े पर चौकड़ी बनती है. उसके किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है. लोग भय से भर गए थे. वे चौकड़ियाँ किसने बनायीं और बाद में उनका क्या हुआ याद नहीं. मगर अब सोचता हूँ. जिस तरह ये चोटी काटने वाली घटनाएँ याद के किसी कोने में दब जाएँगी वैसा ही कुछ उनके साथ भी हुआ होगा.
आपने मॉस साय्कोजेनिक इलनेस के बारे में सुना है? इसे समाज की सामूहिक बीमारी भी कहा जाता है. ये बहुत जटिल है. इसके अनेक रूप हो सकते हैं. इसके फैलने की गति अविश्वसनीय हो सकती है. किसी समूह या स्थान के लोग एक साथ इस बीमारी की चपेट में आते हैं. हम हर तरह की छानबीन करते हैं. तथ्य जुटाते हैं. जो कुछ भी जाना जा सकता है हम जानते हैं. लेकिन फिर भी हम कोई ठीक-ठीक कारण नहीं जान पाते हैं. हमको पहली नज़र में लगता है कि मरीजों द्वारा की जाने वाली हरकतें लगभग एक सी हैं. उनके ख़ुद के द्वारा किया जाना संभव है. किन्तु तर्क और सबूतों से आगे इन बीमारों की बढती तादाद हमको भ्रमित करने लगती है. हम तुरंत अपने ज्ञान को एक तरफ रखकर अलौकिक शक्तियों के संसार की बातों की तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं.
इंग्लेंड के मनोविज्ञानी साइमन वेस्सेली कहते हैं कि सामूहिक उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है. हम अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगते हैं. ये सामूहिक उद्विग्नता किसी भी क्षेत्र, उम्र के लोगों में आ सकती है. नाचते हुए कपड़े उतार देना. नाचते हुए हंसना. भीड़ में कोई डरावना दृश्य बनाना, करतब करना.
सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में नाचना एक मेनिया हो गया था.
युवा से अधेड़ होने की उम्र की ओर बढती औरतें इस सामाजिक हिस्टीरिया का सर्वाधिक शिकार होती हैं. अपने बाल खोल लेना. कपड़े फेंक देना. हुमक हुमक कर बेतहाशा नाचना. लगातार चिल्लाना. राग निकाल कर रुदन करना. लगातार गोल गोल झूमते जाना. ऐसी क्रियाएं अनवरत दुनिया के हर कोने में होती हैं. ज्यादातर ऐसा करने वाली औरतें होती हैं. कहीं कहीं पुरुष भी ऐसा करते हैं. वे गालियाँ देते हैं. अलग मोटी, भारी या बारीक आवाजें निकालते हैं. धमकियाँ देते हैं. हमला करने पर उतारू हो जाते हैं. ये व्यक्तिगत हिस्टीरिया है. यही बातें सिलसिले से अनेक घरों में होने लगे तो इसे मॉस हिस्टीरिया कहा जाता है.
असल में हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है.
रेगिस्तान में ही नहीं वरन हर जगह औरतों के पास अपना कुछ नहीं है. वे किसी एक पुरुष के अधीन हैं. ऐसा पुरुष जो उसे अपनी प्रोपर्टी के रूप में देखता, समझता और परोटता है. दूसरे पुरुष इसी समझ के पहरेदार बने रहते हैं. अपना घर छोड़कर दूसरे घर में बसने वाली औरत से धीरे से सब सुख छूट जाते हैं. वह एक ऐसे परिवार के सुखों का कन्धा बनती है, जिनमें उसका योगदान शून्य गिना जाता है. घर की चारदीवारी में क़ैद जीवन. चौबीस घंटे की नौकरी. झिड़की, पहरे और उलाहनों से भरे दिन रात. ऐसे में जीवन कितना कठिन हो जाता है ये समझना उस आदमी के बस की बात नहीं है. जो आदमी औरत का मालिक कहा जाता है.
मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी नहीं हूँ. मुझे जादू भी नहीं आता है. लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि ऐसे में सोशल हिस्टीरिया ही इकलौता सहारा है. कि हमारी तरफ भी देखो.
ओ वीर बहादुर आदमियों 
औरतों की ये कटी हुई चोटियाँ 
तुम किसी मैडल की तरह 
अपने साफे-टोपी में क्यों नहीं टांग लेते?
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