डायरी

भाग जाने के मौसम की याद

औरत ने एक लम्बा कोट पहना हुआ था. गरदन को मफलर से ढका हुआ था. हाथ कोट की आगे वाली जेबों में थे. आदमी एक फॉर्मल कोट में था. उसके सफ़ेद शर्ट पर गहरी नीली टाई बाँध रखी थी. टाई का जरा सा ऊपरी हिस्सा और गांठ दिख रही थी. उन्होंने हाथ मिलाये. दोनों के हाथ एक से गर्म थे लेकिन सख्ती की तासीर अलग थी. 
“कभी सोचा न था इस तरह?” आदमी के चेहरे पर मुस्कान थी. 
औरत की आँखों में हलकी चमक थी- “मुझे मालूम था कि हम किसी शहर में फिर से एक साथ होंगे.” 
टेबल का टॉप गहरे भूरे रंग का था. उस पर एक गुलदान रखा था. उसमें दो टहनियों के सिरे पर लगे दो फूल रखे थे. आदमी ने उसे अपने दायें हाथ से किनारे कर दिया. उसे ऐसा करते हुए औरत ने देखा. और आदमी ने जब औरत को देखते हुए देखा तो पूछा- “क्या..” 
“क्या करते हो?
“कुछ नहीं करता.”
औरत की आँखों में जो मुस्कान थी. वह अब उसके होठों पर आ गयी- “कुछ नहीं करने के लिए दिन भर क्या करना पड़ता है?”
“सीरियसली… कुछ नहीं. आज सुबह इसी ख़याल में जागा था कि हमको मिलना है. फिर पता है मैं दो घंटे तक कुर्सी पर बुद्ध हुआ बैठा रहा.” इतना कहकर आदमी फिर बुद्ध होने की तरह हो गया. औरत ने एक बार आहिस्ता से मुड़कर देखा. सब टेबल खाली थी. एक कोने में बैठे अकेले लड़के के सिवा. अपनी नज़र को लौटाकर औरत ने कहा- “पूछो मुझे क्या याद आया?”
“क्या?”
“मुझे वह शाम याद आई, जब मैं बास्केटबाल की प्रेक्टिस के लिए आई थी. तुम स्कूल की दीवार पर बैठे थे. मैंने पूछा था कि यहाँ क्या कर रहे हो. तो तुमने कहा था कुछ नहीं. और इसके बाद कुछ और पूछा तो तुमने सीरियसली कहा था. तुमने आज भी कहा- सीरियसली” 
आदमी अचानक असहज होने लगा. उसे लगा कि कोट धूल में बदल कर झरने लगा है. टाई का कसाव गुम हो रहा है. ऐसा कभी हो नहीं सकता था कि कपडे अचानक धूल होकर झरने लगें. लेकिन फिर भी उसने अपने सीने की तरफ देखा. उसने टाई को छुआ. उसके चेहरे पर एक बेहद फीकी सी मुस्कान आई. वह शर्मिंदा होने लगा कि जाने क्या समझेगी. 
उसने देखा कि औरत दीवार की तरफ देख रही है. 
गले को आवाज़ किये बिना साफ़ करते हुए उसने औरत से पूछा- “क्या हुआ…”
औरत ने दीवार की तरफ देखते हुए ही कहा- “तुम हंस पड़ोगे.”
“बताओ”
“नहीं”
“पक्का नहीं हसूंगा” 
औरत की आँखों में वही हलकी चमक आने लगी- “मुझे लगा कि खूँटी पर टंगा मेरा ओवर कोट रेत होकर बिखर रहा है” 
हँसना तो दूर, आदमी मुस्कुराया भी नहीं. उसने कहा- “हमारी उम्र मौसमों के टुकड़ों से बनी है.”
औरत उसे देख रही थी. उसे अचम्भा था कि मेरे बेतुके ख़याल को सुनकर इसे ज़रा भी हंसी न आई. और ये उम्र के मौसमों की बात करने लगा. 
आदमी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा- “तुम्हें याद है केन्टीन के आगे वाली खुली जगह. जहाँ चौकोर पत्थर लगे थे. वहां एक सायकिल स्टेंड था. जिन शामों को स्कूल में स्पोर्ट्स प्रेक्टिस नहीं होती थी न, उन सब शामों को मैं वहां जाया करता था. उस खाली पड़े रहने वाले स्टेंड पर बैठा रहता था. वहां कोई नहीं आता था.”
“कोई नहीं आता था तो ?”
“तो भी मुझे लगता था कि जैसे कोई आएगा”
औरत को इस बात पर एतबार नहीं हुआ. उसे लगा कि वह कहानी बना रहा है. औरत ने कहा- “मैंने तुम्हें कभी वहां नहीं देखा. तुम्हें पता है न उस जगह के सामने ई ब्लॉक है. हमारा क्वाटर वहीँ था.”
आदमी ने कहा- “सीरियसली” 
“क्या सीरियसली…”
“वो जो बचपन के बाद का मौसम था न, वह बस वही था. उस रुत में जो फूल खिलते थे न, वे उदास होते थे. उस मौसम में लगता था कि कहीं भाग जाएँ. उसी मौसम में ये मालूम न था कि भाग कर जायेंगे कहा?” 
औरत के चेहरे पर कोई सलवट नहीं आई थी. मगर उसे लग रहा था कि उसके चेहरे पर सलवटें उतर रही हैं. और ये आदमी जाने क्या सोचने लगा होगा. ये कैसे हो सकता है कि उस दिनों मैं भी भाग जाने का सोचा करती थी. मुझे भी घर उदास करता था और मैं बाहर खुले में बैठना चाहती थी. 
“कुछ सोच रही हो?”
“हाँ कि तुम सही कहते हो. वह एक उम्र का टुकड़ा होने से अधिक एक मौसम था.” 
आदमी ने पूछा- “तुम क्या करती हो?”
“एक स्कूल में काउंसलर हूँ. बच्चों से बातें करती हूँ. उनकी दोस्त हूँ?”
इतने में दो कप कॉफ़ी और एक छोटा सा केक का टुकड़ा चला आया. बाहर ठंडी हवा चल रही थी. दोपहर के तीन बजे थे. मौसम का एक और टुकड़ा उन दो लोगों को लिख रहा था. 
जब वे बाहर आ रहे थे तब औरत ने कहा- “स्कूल के उस आखिरी साल की बात करते हुए अचानक मुझे लगा कि मैंने कुछ ज्यादा गरम कपड़े पहन लिए हैं.” आदमी उसकी ओर देख रहा था. औरत ने कहा- “ऐसा न समझो कि तुमसे मिलने के लिए ऐसे कपड़े पहने हैं. मैं इतने सारे ही कपड़े पहनती हूँ. मुझे बहुत ठण्ड लगती है.”
आदमी ने कहा- “एक मज़ेदार बात बताता हूँ. हँसना मत”
“हाँ बताओ” 
“मैं कोट और टाई कम पहनता हूँ. इनको पहनने से मुझे स्कूल का पासिंग आउट डिनर याद आता है. फिर जी उदास होने लगता है.”
वे दोनों अभिवादन करके अलग हो गए थे. 
आदमी पता नहीं क्या सोचता हुआ गया मगर औरत ने सोचा कि उसने मनोविज्ञान में मास्टर्स करने के दिनों में क्या पढ़ा था? जब वह अपने प्रेक्टिकल के लिए प्रश्नावली लिए यूनिवर्सिटी के हर डिपार्टमेंट में घूमती थी. लड़के और लड़कियों से सवाल-जवाब वाले फॉर्म भरवाती थी. उनमें क्या सवाल होते थे? 
उसकी आँखों में चमक आई. उसने तय किया कि वह अगली बार से सीनियर विंग के बच्चों की पर्सनल काउंसलिंग में ये ज़रूर पूछेगी कि क्या वे घर से भाग जाना चाहते हैं?
* * *
मौसम कहीं जाते नहीं है. वे केवल रुख बदल लेते हैं. आपके पास तहें खोलने का समय और मन हो तो वे आस पास मिल जाते हैं. 
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