डायरी

जाने को कह देंगे?

मैं उनसे कहता हूँ- “क्या पाओगे? किसी उदासी में करीब बैठोगे. किसी गहरी थकान में अपना सर कंधे पर रख दोगे. किसी गहरे दुःख को कहने लगोगे. किसी यकीन में कहोगे, मेरा हाथ न छोड़ना. इसके बाद…”

“इसके बाद?”

“जैसे पहले बहुत से लोग करते आये हैं. कुछ रोज़ सबकुछ भूलकर दीवाने रहे और बाद में चले गए. वैसे चले जाना होगा”

“तो आप जाने को कह देंगे?”

“नहीं. आपका मुझसे जो सम्मोहन है. वह पूरा हो जायेगा.”

“फिर?”

“फिर कुछ नहीं. सबके पास नए सम्मोहन होते हैं, सबके पास हज़ार बहाने और झूठ होते हैं, किसी को भी कोसने के लिए.”

“आपको ये सब लगता है? तो ये भी लगता होगा कि आपको बदनाम किया जायेगा.”

“नहीं ये नहीं लगता. इसलिए कि बदनामी तो उस बात में होती है, जिसको छिपाना पड़े. मैं तो सबसे कह देता हूँ कि हाँ ऐसा किया था.”

शाम की नीरवता फोन में भी पसर जाती है.
* * *

आज की सुबह सवा दस बजे थे. कितनी अजीब बात है न. ऐसा तो रोज़ होता होगा. अगर कोई ज़िन्दा रहे और होशियार हो तो हर सुबह देख सकता है कि सवा दस बजे हैं. कई बार कुछ वक़्त के पैमाने ऐसी शक्लों में ढल जाते हैं कि उनको उसी तरह देखने की आदत हो जाती है. 
इस आदत में समय एक खालीपन हो जाता है. जिन लोगों से बचकर चलते हैं वे दफ्तर से लुप्त हो जाते हैं. लगता है कि वे लोग सदियों से गुम हैं. वे शायद यहाँ कभी थे ही नहीं. असल में आज घड़ी पर उस वक़्त ध्यान नहीं जाना था मगर उसी वक़्त गया. 
बंद कमरे में बैठे हुए लगने लगता है कि बाहर बादल घिर आये हैं. धूप का लिबास अब धूसर हो चला है. हवा में बादलों की छाया की गंध है. कैसा होता है न आदमी. बंद कमरे से मौसम पढ़ लेता है. 
मैं कहता हूँ- “जाओ केसी, बाहर जाकर देखो. मौसम को तुम्हारा इंतजार है.”
* * *
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