डायरी

अनुत्तरित प्रश्न

अतीत को सूंघते हाथी
ठहर जाते हैं वर्तमान में.

बुझी-बुझी रेखाओं में
संताप, शोक और शांति.

सूंड उठाकर
बारम्बार
हाथी पूछते हैं
अनुत्तरित प्रश्न.

मैं क्या हूँ ?
क्या मैं हूँ?

चींटियाँ बनाती जाती हैं, नई लकीरें
समय उनको ढकता रहता है धूल से.
* * *

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