डायरी

मेरी ज़िन्दगी से रश्क न करना

अब नहीं घबराता है दिल
दोपहर की नींद से जागते ही.

कोई इतनी तकलीफ देगा, कभी सोचा न था.
* * *

एक के बाद एक
उठकर चल देते हैं
विरह, प्रतीक्षा और संताप.

एक ख़ूबसूरत रंग से
भर उठती है तन्हाई.

और फिर, कुर्सी पर अधलेटे यूं तारों को देखना.

[तुम मेरी ज़िन्दगी से रश्क न करना, इसे ऐसा बनाने को ख़ुद को सताना बहुत पड़ता है.]

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