डायरी

उन हथेलियों में कई सारे रास्ते हैं

सुरिन ने जतिन को कहा कि मैं कुछ लेकर आती हूँ. वह तेज़ी से उठी और बिल काउंटर तक चली गयी. बिल काउंटर पर बैठे लड़के से सुरिन ने पूछा- “यहाँ फ्लेट वाइट के अलावा कोई दूसरा फ्लेवर है ?” काउन्टर के अंदर की तरफ खड़े लड़के ने अपनी पीठ की ओर संकेत किया. वहां एक लम्बी सूची थी.
“कैफ़े लात्ते…”
“तुम्हें कैसे मालूम?”
“जाने दो. मैं तुम्हें एक बात याद दिलाता हूँ शायद तुम भूल गयी हो.”
सुरिन अचरज से देखने लगी. उसने अपने होठों पर लम्बी मुस्कान रखी. वे दोनों जीवन की अबूझ बातें करते हुए थक गए थे. उनके पास यही रास्ता था कि वे कोई ख़ुशी की बात करें. अक्सर ख़ुशी को लालच देना होता है. जैसे आप बड़ी मछली को फांसने के लिए छोटी मछली को चारे की तरह कांटे में फंसाते हैं न वैसे ही बड़ी हंसी तक पहुँचने के लिए एक छोटी मुस्कान खुद बनानी पड़ती है. फिर ये छोटी मुस्कान बड़ी मुस्कान को खींच लाती है. इसलिए सुरिन ने अपने चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान रखी. “हाँ बताओ वो बात जो शायद मैं भूल गयी हूँ”
“वो बी ब्लॉक वाला शोपिंग काम्प्लेक्स याद है?”
“जहाँ हम पहली बार मिले थे”
“अच्छा तुम्हें तो खूब याद है सब. मैंने समझा तुम भूल गयी हो. तो सुरिन तुम्हें ये भी याद होगा कि वहां एक नन्हा गुलमोहर था.”
सुरिन का फोन बजने लगा. उसने फोन उठाया और स्क्रीन देखने लगी. उसने फोन पर बात नहीं की. फोन को थैले में रखा और जतिन से कहा.- “अब चलना होगा.”
“पांच मिनट और रुको”
“फिर क्या हुआ ये बताती जाओ”
“एक दिन वो चक्कर खाकर गिर पडा. हम उसे अस्पताल लेकर गए. वहां पहुँचते ही वह काफी नार्मल हो गया. लेकिन ये सिलसिला बढ़ता ही गया. वह लगातार कमजोर होता गया. आखिरकार बोन मेरो ट्रांसप्लांट हुआ. और एक रोज़ डॉक्टर्स ने कहा कि आप इनको घर ले जाइए. अब हम एक बंद कमरे में रहते हैं. वह काफी अच्छा है. अपना काम खुद कर लेता है.”
ये सुनकर जतिन बहुत उदास हो गया.
सुरिन ने कहा- “मालूम है वह पिछले एक साल से मुझे कह रहा था कि तुम बाहर जाया करो. हमेशा मेरे पास बैठी हुई बोर नहीं हो जाती हो. मैं उसे कहती- तुम पागल हो क्या. मुझे यहीं अच्छा लगता है. फिर कुछ रोज़ पहले उसने कहा कि मुझे गिल्ट होने लगा है. तुम बाहर नहीं जाती हो तो मुझे लगता है कि मैंने तुम्हें क़ैद कर लिया है. मुझे सचमुच अच्छा नहीं लगता. मैंने कहा जाती तो हूँ. इतना सारा सामन ले आती हूँ. वह बोला कि ऐसे नहीं तुम सिर्फ अपने खुद के लिए बाहर जाओ. तुमको लगे कि तुम्ह सिर्फ इस घर में क़ैद रहने के लिए नहीं हो.”
एक और मुस्कान होठों पर रखकर सुरिन ने कहा- “मुझे कभी समझ नहीं आता कि क्या करूँ. मुझे उदासी नहीं है. मेरे पास तन्हाई नहीं है. मेरे पास एक दुबले से आदमी के दो हाथ हैं जिनको मैं अक्सर चूमती रहती हूँ. उन हथेलियों में कई सारे रास्ते बन गए हैं. मैं उन रास्तों पर चलती हूँ. कुछ छोटे पहाड़ हैं. कुछ कम गहरी खाइयाँ हैं. दो एक सरल रास्ते हैं…” अचानक सुरिन की ऑंखें चमकी और उसने कहा- “तुम्हें मालूम है अगर ये सब न होता तो मैं उसकी हथेलियों को कभी इस तरह न देख पाती”
कांच के पार धूप कम हो गयी थी. लम्बी छायाओं ने सड़क को ढक लिया था. तीन चार बच्चे गेंद और बल्ला लिए आ गए थे. वे पक्का कुछ और दोस्तों का इंतज़ार कर रहे थे. सुरिन ने अपना थैला उठाया. जतिन ने अपना चश्मा लिया. दोनों बाहर निकल पड़े. रेस्तरां से बाहर आते ही जतिन ने कहा- “बी ब्लाक की तरफ से होते हुए चलें.?”
वे चलते हुए काफी दूर आ गए थे. सड़क खाली थी. शोपिंग कोम्प्लेक्स के आगे मोड़ था मगर गुलमोहर नहीं था. जतिन रुक कर उस जगह को देखने लगा जहाँ वे पहली बार मिले थे. कुछ एक पल वहीँ खड़े रहने के बाद उसे सुरिन का खयाल आया. जतिन ने देखा कि सुरिन बिना रुके बहुत दूर जा चुकी थी. बहुत दूर सड़क पर एक सुर्ख रंग का छोटा स्कार्फ था. जो कभी जतिन को दिखता और कभी उसकी निगाह से खो जाता.
[याद, एक अमरबेल है. ]
कहानी खत्म नहीं होती. उसमें कुछ अल्पविराम होते हैं. मैं इस अल्पविराम से आगे किसी और को सोच रहा हूँ.
Picture courtesy : Jyoti Singh 
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