डायरी

मौसमों के बीच फासले थे – चार

छत पर रखे गमलों के पास एक झूला था. या झूले के आस-पास बहुत से गमले रखे थे. वह आदमी इस औरत से मिलने आया था या इस औरत ने मिलने की चाहना की थी. जिस तरह झूला और गमले थे. उनको अलग देखने पर दोनों के बीच कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था. साथ रखने पर ये समझ नहीं आता कि कौन किसके लिए हैं. झूला गमलों के लिए या गमले झूले के लिए. या ये महज एक संयोग है. या किसी रिक्त स्थान की आवश्यक पूर्ति भर.
जब वे सीढियां चढ़कर छत की ओर आ रहे थे तब आदमी ने देखा कि औरत ने हलके हरे रंग का कुरता पहना था. उस पर न…ीले रंग के छोटे फूल खिले थे. नीली जींस चप्पलों को चूम रही थी. औरत के पीछे सीढियाँ चढ़ते हुए उसने देखा कि पीठ जहाँ से खुली थी, वहीँ बाएं कंधे पर बैठा हुआ तिल भी उचक-उचक कर सीढियाँ चढ़े जा रहा था. औरत ने एक बार मुड़कर देखा था कि वह ठीक से आ रहा है या नहीं. आदमी ने उसके क्षणभर के देखने को अपने देखने से आश्वस्त किया कि वह आ रहा है. औरत के हाथ में चाय की ट्रे थी. आदमी के हाथ में कुछ न था.
“आओ बैठते हैं” ऐसा कहकर औरत खड़ी रही. उसने आदमी के बैठ जाने की प्रतीक्षा की. आदमी ने उसके कहे को सुनते हुए कुछ पल देखा और फिर किसी मूक संवाद में बनी सहमती से दोनों एक ही झूले के दो छोर पर बैठ गये. बीच की जगह पर चाय की ट्रे रख दी गयी.
आदमी ने चाय का प्याला हाथ में लेते हुए कहा- “मौसम अजीब है और इससे भी बड़ी बात कि ये ठहर गया है. कई रोज़ हुए न धूप भली लगती है न छाँव में बैठना.” औरत ने चाय के मग को उठाया नहीं था. वह बस स्थिर भाव से आदमी को देख रही थी. जैसे इस पल उसे देखना ही इकलौता सुख था. वह मूरत की तरह स्थिर थी. इसी मुद्रा में उसके होठ कांपने की तरह हिले. “ये कितना अच्छा है न कि तुम्हें मौसम के बारे में पता है. तुम जब अभी मौसम का कहने लगे तो मुझे ख़याल आया कि मैंने जाने कब से इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.”
आदमी ने कहा- “ऐसा होता है. एक बार मुझे कई साल बाद याद आया कि ज़िन्दगी से बहुत से साल गुम हैं. वे कुछ बरस कहाँ गए मैं अभी तक नहीं समझ पाया. कुछ याद ही नहीं आता कि उन बरसों में क्या किया कहाँ रहा?”
औरत की आवाज़ में खनक थी। “सचमुच. तुम यकीन न करोगे मगर मेरे साथ भी ऐसा हुआ है. मैं बचपने के कुछ साल भूल गयी हूँ. मुझे उन सालों से पहले का और बाद का याद आता है मगर कुछ बरस याद से गायब हैं”
औरत की आँखों में हैरत थी. एक समान से अनुभव की हैरत. आदमी उसे देख रहा था. झूले में हलकी सी मचल आ गयी थी. आदमी को ऐसा लगा जैसे इस औरत से अधिक करीब का कोई रिश्ता नहीं है. वे इसी झूले पर इसी तरह बैठने को बने हैं. आदमी ने कहा- “सुकून है” औरत ने प्रतीक्षा की कि आदमी कुछ और कहे. आदमी ने औरत की इस प्रतीक्षा को पढ़ा और कहने लगा- “ जैसे कि कोई काम नहीं बुला रहा. जैसे कहीं जाना नहीं है. जैसे सब दौड़ खत्म हो गयी हो. बस ऐसा कि जैसे अब कुछ करना नहीं है”
औरत उसे सुनते हुए अचानक चौंकी. उसने अपने घुटने से अपना हाथ उठा लिया. उसे लगा कि शायद उसने अपना हाथ उस आदमी के घुटने पर रख दिया था.
आदमी ने झूले से सटी पीठ को सीधा किया. उसे लगा कि अभी-अभी उसका हाथ था और अब नहीं है.
गमलों में हर रंग के फूल थे. आदमी की आँखें बैंगनी रंग को खोजने लगीं.
[ज़िन्दगी में जब आप महसूस करते हैं कि उसने छू लिया है तो सचमुच उसने छू लिया होता है. छूने को छूने की ज़रूरत नहीं होती.]

Painting : Lisa

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