डायरी

श्याम सपन में प्रिये तुम

जैतून की टहनियां बढ़ आई छत तक
मेरी नज़र उलझ जाती है श्याम पत्तों में।

तुम्हारा चेहरा गायब है झरोखे से।

(सपन श्यामल1)

दफ्अतन साया सीढ़ियों से उतरा
धड़क कर बुझने से पहले
सांसों ने थाम लिया दिल को मेरे।

तुम जो आये तो जानलेवा आये।

(सपन श्यामल 2)

तुमने रेत के कोमल बिछावन पर
रख दी अंगड़ाइयां सब करीने से।
रेत ने तुम्हारी नाभि पर बनाया है एक गोल घेरा।

मैं जल गया सूखे खारे आक की तरह ये देखकर।

(सपन श्यामल 3)

तुम्हारी करवट से रेत ने चुरा ली हैं सब लहरें।
दिल दुखे महबूब की तरह
मैंने ढक दिया तुम्हारा रूप सालू से।

सालू – एक लम्बा कशीदे वाला गले में टांगने का कपड़ा, लोंग स्टाल

(सपन श्यामल 4)

पगरखी के कसीदे ने बना दी हैं लकीरें
तुम्हारी गुलाबी एड़ियों पर।
मैंने रख दी अपनी हथेलियाँ पगरखी की जगह।

कि कहीं टूट न जाये नाज़ुक नींद तुम्हारी
धागों की चुभन से।

(सपन श्यामल 5)

घोड़े हिनहिनाते जाते हैं
और जैतून बरसता रहता है उनकी पीठ पर।

हम मगन देखे जाते हैं एक दूजे को।

(सपन श्यामल 6)

आसमान में घमासान मचा है
सफ़ेद और श्याम बादल हांक रहे हैं अपने हाथी।
एक घने दरख्त की छाँव में भीगी हुई चमकती है
तुम्हारे होठ की किनार।

(सपन श्यामल 7)

तुम किसी माया की तरह लिपट गयी हो
बदन से मेरे।
तुम्हारे पैर ज़मीन से कुछ ऊपर है।

मैं पानी हूँ तुम हवा हो।

(सपन श्यामल 8)

पीले पत्ते पर उभर आया है
दिल की शक्ल का खूबसूरत लाल निशान।

(सपन श्यामल 9)

मेरी जान ये साँस क्यों उखड़ जाती है तुम्हारी याद आते ही। बदन किसी लरज़िश से भर कर क्यों गिर पड़ता है अचानक। मन मदभरे घोड़े सा क्यों चलता है रोते हुए शराबी की तरह। अचानक आंसुओं की खेती में फसलें क्यों उग आती है। ऐसा क्या होता है कि कोई किसी के बिना डर जाता है जीने से।
जाना, ओ जाना।

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