डायरी

चुप्पी की एक गिरह

जब मैंने अपनी नयी कहानी के पहले ड्राफ्ट को पूरा किया तो खूब अच्छा लगा. मैंने खिड़की के पास कबूतर की आवाज़ सुनी. मैं आँख बंद किये उसे फिर से सुनने की प्रतीक्षा करने लगा. कबूतर के दोबारा गुटर गूं करने से पहले मैंने एक चिड़िया की आवाज़ सुनी. उसके साथ कई चिडियों की आवाज़ सुनी. थोड़ी देर में मुझे गली में बोलते हुए बच्चे सुनाई दिए. फिर लोहे की छड़ों की आवाज़ सुनाई दी. इसे बाद लुहार की हथोड़ी सुनाई दी. फिर किसी बस ने होर्न दिया. और कोई स्कूटर गुज़रा. मैंने अपनी आँखें खोली और सोचा कि ये आवाजें अब तक कहाँ थी? पिछले कई महीनों से इनको किसने चुरा रखा था. मैं इनको क्यों नहीं सुन पाता था. ऐसा सोचते हुए मैंने अपनी आँखें फिर से बंद की और पाया कि चिड़ियों का स्वर सराउंड सिस्टम से भी बेहतर सुनाई दे रहा है. चारों तरफ हलकी चहचहाहट.
अहा जीवन.
क्या हम जीना भूल जाते हैं? इसी प्रश्न की अंगुली थाम कर मैं ज्यादा नहीं थोड़ा सा पीछे गया. कोई दस एक दिन पीछे. अपने लिखने में झांकने गया. खुद को लिखना सुखकारी होता है इसलिए मैं इस डायरी में अपने कच्चे पक्के अनुभव लिखता रहता हूँ. कई बार इस लिखने में विराम आता है तो जांचता हूँ कि वजहें क्या है? मैं रुक गया हूँ या किसी और काम ने मुझे बाँध रखा है. पिछले कुछ महीने इस ज़रुरी प्रतीक्षा में बीते कि बेटी का बारहवीं का परिणाम आये. जब वह अच्छे नंबर ले आई तो नयी प्रतीक्षा शुरू हुई कि वह कहाँ पढ़े. इसी वजह से मैंने जयपुर और दिल्ली में दो तीन महीने बिता दिए. वे इस जीवन के सबसे सुन्दर दिन थे. मैं एक हेल्पर की तरह था. माँ और पापा अगर अच्छे हेल्पर बन सकें तो इससे अधिक कुछ बनने की ज़रूरत नहीं होती. तो हम दोनों अपने बच्चों को मदद करते आये हैं. जो हमारे पास था वह दिया, जो समझते थे वह बात बताई और उनके लिए प्रार्थना की. इसी ज़रुरी काम में मैंने तीन महीने डायरी में कम कम लिखा. मैंने कई बार चाहा कि अपनी बेटी के साथ बिताए खूबसूरत दिनों के बारे में लिखूं मगर फिर मैंने इसे स्थगित रखा. इसलिए कि कई बार मैं लालच से भर जाता हूँ. परिवार के साथ जी हुई खुशियाँ किसी के साथ शेयर करने का मन नहीं होता.
इस महीने मैंने सोचा था कि रोज कुछ डायरी में लिखा जाये. इसी बहाने से मैं लैपटॉप और लिखने के काम से फिर से जुड़ सकूंगा. मैंने पहले दो सप्ताह लिखा और फिर सिलसिला थम गया.
क्यों?
अचानक से कोई रास्ता कहीं जाकर बंद हो जाता है. हम ठहर जाते हैं. हम दुखी और उदास होते हैं. हम सोचते हैं कि ऐसा क्यों हुआ. उस वक्त हम ये भूल जाते हैं कि रास्ते बंद होने और मिटने के लिए ही होते हैं. हर रास्ते का एक आखिरी पड़ाव होता है. जैसे ज़िंदगी भी एक रास्ता है. अक्सर ज़रूरत के वक्त सब ज्ञान हमारा साथ छोड़ जाता है. लेकिन अनुभव कभी हमसे जुदा नहीं होता. तो इस बार जब लिखना बंद हुआ तब मेरे अनुभव ने कहा कि अगर कोई रास्ता बंद न होता तो क्या बहुत सारे रास्तों की ज़रूरत होती. सारी दुनिया एक ही सुन्दर रास्ता बनाती और उस पर चलती रहती. मैं ये सोचकर चुप हो गया. इसलिए चुप हो गया कि मुझे नचिकेता की याद आई.
नचिकेता के पिता जब गौ दान कर रहे थे तब उसने अपने पिता से पूछा- आप मुझे किसको दान दोगे. क्रोध से भरे ऋषि पिता ने कहा- मैं तुम्हें मृत्यु को दान दूंगा.
क्रोध किसी ऋषि को भी अपने पुत्र के लिए ऐसे कठोर, अप्रिय और अनिष्टकारी वचन के लिए प्रेरित कर सकता है. हम साधारण मनुष्य हैं. हमें क्रोध उत्पन्न करने वाली स्थिति में नहीं पड़ना चाहिए. हमें आते हुए क्रोध को शीघ्रता से पहचान लेना चाहिए. क्रोध को बरतने का साहस न हो तो हमें एक चुप लगानी चाहिए. शांत रहिये, प्रतिक्रिया न कीजिये.
नचिकेता स्वयं चलकर मृत्यु का अतिथि हो गया. मृत्यु किसी कार्य से घर पर न थी. जब वह लौट कर आई तो उसने देखा कि तीन दिन भूखा रहने के कारण नचिकेता का हाल बहुत बुरा हो गया है. मृत्यु ने कहा नचिकेता तुम्हें भोजन करना चाहिए था. उसने उत्तर दिया- जिस घर में स्वयं मेजबान न हो उस घर में भोजन के लिए उसकी प्रतीक्षा करना ही धर्म है. मृत्यु ये सुनकर प्रसन्न हुई. उसने नचिकेता को तीन वरदान दिए.
उन तीन वरदानों में एक में नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता क्रोध मुक्त हो जाये. तीसरे में उसने स्वयं के लिए माँगा कि उसे आत्म ज्ञान प्राप्त हो. मृत्यु ने तीसरे वर को पूर्ण करने से पूर्व अनेक प्रलोभन दिए कि इसकी जगह तुम कुछ और मांग लो. लेकिन नचिकेता ने उन प्रलोभनों को नहीं स्वीकारा. उसने आत्म ज्ञान ही चाहा और वह इसे पाकर वह मल-मुक्त हो गया.
मैंने भी सोचा कि इस जगत में जब तक हम मल-मुक्त नहीं हैं तब तक इस दुनिया कि किसी भी अनुभूति और व्याधि से बचना असम्भव सा है. हम कठिन परिश्रम करके खुद को थोड़ा संयमित कर सकते हैं किन्तु लोभ, मोह, काम, असत्य, घृणा और ईर्ष्या जैसे अनेक स्वाभाविक गुण-दुर्गुण से मुक्त नहीं हो सकते हैं. इसलिए सब प्राणी लगभग एक से हैं. वे अगर श्रेष्ठ जान पड़ते हैं तो उनका अनावृत होना भर शेष है. इसलिए कि उनका मल-मुक्त होना अभी बाकी है. 
मैं अपनी खामियों के साथ जीते हुए खूब खुश रहता हूँ.
बड़ा अनगढ़ जीवन है. इसे संवारने के उपकरण हमारे पास कम हैं. जब तक हम उनको उपयोग में लेना सीखते हैं तब तक जीवन के घड़े से उम्र का आसव रीत चुका होता है. इसलिए ज्यादा अफ़सोस भी किसी को नहीं करना चाहिए. अगर बहुत सुन्दर बना सकते तो भी इस जीवन का रास्ता कहीं न कहीं बंद होना ही है.
केसी तुम ऐसे क्यों हो? तुम क्यों मुझे अपमानित करते हो.
मैंने कहा कि सर्वोच्च दंड है मृत्यु को दान देना. अभी हिंदी दिवस पर दीपक अरोड़ा के दूसरे कविता संग्रह के विमोचन के अवसर पर उनके पिताजी दो मिनट बोलने के लिए आये थे. उन्होंने कहा- मुझे मालूम होता कि दीपक को कविता ही प्रिय है तो मैं उसे सब कामों से मुक्त करके कहता जाओ कुछ न करो कविता करो. इसके बाद उनकी आँखें और गला भर आया. मेरे तो पिताजी भी नहीं है. संसार का यही सबसे बड़ा दुःख है पिता के दिल में पुत्र का शोक. इससे बड़ा भार कुछ नहीं कहा गया. तो मेरे लिए कितनी खुशी की बात है कि ये दुःख उनको कभी न उठाना पड़ेगा. 

इस तरह हम जब थोड़ा आगे का सोच लेते हैं तब आगामी दुखों का कुछ हिस्सा अभी उठा लेते हैं. ये सोचना अच्छा है. सोचने के लिए चुप होना अच्छा है. इसलिए मैंने जो सोचा था कि इस महीने खूब लिखा करूँगा उसमें व्यवधान आया. मैंने चुप्पी को अपना साथी चुना. इन दिनों कुछ हलकी कवितायेँ अपने आप आने लगी. इसका अर्थ ये भी हुआ कि मैं अपने पास लौटने लगा. अपने पास आते ही ज्ञानेन्द्रियाँ जीवन के संकेत देने लगी. चिड़ियों की चहचाहट सुनाई पड़ने लगीं. आइसक्रीम वाले का भोंपू सुनाई देने लगा. छत पर सोते समय चाँद की फांक देखी, तारे देखे, आती हुई सर्दी की पदचाप सुनी. जैसे किसी जादू के अभिशाप से रुका हुआ शहर अचानक चलने लगा हो. जैसे दीवारें सुनने लगीं हों हमारी हथेलियों की दस्तक. जैसे तुम मेरे इस बेढब जीवन को पढकर मुस्कुरा रहे हो.

कि कोई काम की बात न थी मगर पढते ही गए….

* * *
[Painting : Silence (1799-1801) by Johann Henry Fuseli]

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