बातें बेवजह

गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ

दिन
स्याही के परिंदे थे सफ़ेद
और स्याही में खो गए.
* * *

सदियों सा उम्रदराज़
एक बुजुर्ग रखा हुआ है इस काम पर
हर शाम दिन को ले जाये अंगुली थाम कर
हर सुबह लौटाए सलामती के साथ.
* * *

दिन डूबता है ऐसे
जैसे डूबी जाती हो नब्ज़
लौटता है ऐसे जैसे आने लगी हो साँस.
* * *

एक बीता हुआ दिन आता है
किसी नए दिन की तलाश में.
* * *

ज़िंदगी का हर दिन
एक ख़याल है, मिथ है
किस्सा है, नज़्म भी है
गुज़रे हमें छूकर मगर रहे अनुछुआ.
* * *

जो बात आज लिखने लायक नहीं है, यकीनन उसे कल भी नहीं लिखा जाना चाहिए.

  [Painting courtesy : Laurie Justus Pace]

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