बातें बेवजह

बड़ी बात है…

दो कप कहवा और एक रवा डोसा। जोधपुर की एमजीएच रोड वाला रेस्तरां जहाँ दोपहर को भी नीम अँधेरा बसा हुआ था। जयपुर के जीटी पर चायनीज़ बनाने वाला कोर्नर पापाराज़ी। इन दो लम्हों के भीतर समाए हुए शाद होने के बीस बरस। 
टॉय ट्रेन पर नन्हे बच्चे। आसमान की छतरी से गिरती कुछ बूँदें। आँग्ल भाषा के लफ़्ज़ों की सतरें नियोन रौशनी के अलहदा रंगों में। कारों की हेड लाइट्स जैसे नाट्यशाला के मंच पर किरदार को फोलो करती हुई रौशनी की लकीरें। दुनिया शाम के जादू के सम्मोहन में मंथर, ठहरी, रुकी हुई। 
हम दोनों गोल बेंच पर बैठे, एक लम्हे में समाये हुए बीस बरसों को देखते हुए। 

* * *

सौदागरों के पास नुस्खे
असबाब दलालों के पास।
बिचोलियों के पास दवा
और दुआएं हकीमों के पास।
प्रेमियों के संग बेवफाई
और बदज़ुबानी दोस्तों के पास।

जबकि हर सही गलत
पड़ा हुआ है दूजे खानों में,
हम चलते रहे साथ। यही बड़ी बात है।
* * *

कोई नहीं पूछता
किसी से कुछ
समझदारी का दौर है।

बाज़ मचानों पर
चूहे बिलों में
कबूतर मैदान में
बिल्ली अटारी पर।

मगर ख़रगोश पड़ा है
बालकनी में शराब पिए हुए।

यही इकलौता दाग़ है
समझदारी के दौर पर।
* * *

मोनिटर लेजार्ड
उठाती है सर रेत के बियाबान में
जीभ से टटोलती है मौसम की नब्ज़
और खो जाती है धूसर काँटों के बीच।

मन में कोई बात आती है
तुम्हारे बारे में और बुझ जाती है चुपचाप।

वीराना लौट आता है, अपने ठिकाने पर।
* * *

जिसके पास वादा था
उसके पास मियाद भी थी।
* * *

जिस तरह हम भुला देते हैं
बस और मेट्रो में अजनबियों के धक्के।

काश एक दिन भुला सकें उसको।
* * *

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