डायरी

इस दुनिया का अकेला नागरिक

क़स्बा अरावली से बिछुड़े हुए छोटे से टुकड़े की गोद में बसा हुआ था. सर्द हवाओं से ओट लेता हुआ और गरम हवाओं की आमद के इंतज़ार में. ढाणी बाज़ार से लेकर फकीरों के कुएं तक. इस सीधी रेखा के नीचे निम्नतर जाति के लोगों के लिए एक छोटी सी बसावट थी. कस्बे से बाहर और उपेक्षित. कालांतर में वह बसावट कस्बे के ह्रदय में आ गई. ऊपर गढ़ मंदिर था. उसके नीचे इस सूखे रेगिस्तान के इकलौते रावल का पहाड़ी के अधबीच बना मकान था. हम मंदिर जाते तब उस मकान के भीतर देखना चाहते थे कि वहाँ कौन रहता है. लेकिन सीमेंट के फर्श वाले, सामान्य दीवारों वाले उस घर का सम्मोहन बस इतना भर था कि वह शहर से ऊपर और पहाड़ी के ठीक अधबीच में बना हुआ था. इसी पहाड़ी पर इस घर के नीचे कुछ फासले पर कुछ और घर थे. वे छोटे सरदारों के लिए होते होंगे. पहाड़ी की उपत्यका में जोशियों और जैनियों के बास थे. इन्हीं के पास प्रसिद्द नरगासर के चारों और बसे हुए खत्री थे. ये अपने आपको ब्रह्म क्षत्रीय मानते हैं. स्कूलों में होने वाली लड़ाइयों में कई बार कुछ बदमाश खत्री लड़के ये साबित करने कि कोशिश करते थे कि वे ब्रह्म ही सही मगर क्षत्रीय हैं. लेकिन क्षत्रीय होना ही कष्टप्रद ही था. स्कूल में साथियों से पिटते, घर जाकर सख्त पिताओं से मार खाते और माएं गालियाँ देती हुई इस तरह सेक करती कि कोई भी सेक नहीं करवाना चाहता. हादसे सब गुज़र ही जाते हैं. मार खाने के निशान और मन पर आई चोटें भी भुला दी जाती हैं. कुछ दिनों बाद स्कूल और कॉलेज में ऐसे क्षत्रियों का पुनरागमन शुरू हो जाता.
जोशियों के बास के पास ही मोचियों का बास था. मोचियों की गलियां पेरिस की कल्चर की लघु प्रतिनिधि थी. वेशभूषा और रंग रूप में नयेपन की हिमायती. वे कई मायनों में ईसाईयों जैसा आचरण भी करते थे. अर्थात कल की चिंता न करना. आज कमाना और आज ही पी जाना. पीने की चिंता ही सबसे कड़ी चिंता हुआ करती थी. रोटी के बारे में वे बहुत धार्मिक थे. उनका मानना था कि जिसने चोंच दी है वह चुग्गा भी देगा. चुग्गा मिल जाता था मगर जिसने प्यास दी वह दारू की जगह सिर्फ नमकीन पानी देता था. फकीरों और जोशियों के कुएं का फीका नमकीन और भारी पानी. इसलिए बुद्धिमान लोग शराब की तलाश करते थे बुद्धिहीन इन्हीं कुँओं का पानी पीकर जीवन नष्ट कर रहे थे. जोशियों के कुंए के दायीं तरफ उपरला और निचला जोशी वास थे. इन दोनों ही जगहों पर बारी बारी से हमारे प्रिय कवि, अनुवादक, प्राध्यापक, प्रोफ़ेसर, सख्त किन्तु उपयोगी भाषण करने वाले आई जी रहते थे. आई जी मतलब डॉ आईदान सिंह भाटी. आप जैसलमेर के नोख गाँव के रहने वाले थे मगर हर कोई उनको बाड़मेर का ही जानता था. लिटरेचर की खुजली से ग्रस्त विवेकशील समूह कस्बे में गोष्ठियां किया करता था. उन गोष्ठियों में आईजी और प्रेम प्रकाश व्यास के सिवा बाकी सब लगभग ढाई ढूश ही थे. गोष्ठियों में हमारे गुरुजन, तहसीलदार, उपखंड अधिकारी, बाबू, चपरासी और यहाँ तक कि कुशल कारोबारी और दलाल क्रेता विक्रेता अपनी रचनाओं का पाठ करते थे. उन बैठकों में अमित भी कभी कभी जाया करता था. होम्योपैथी अस्पताल की छत से लेकर गायत्री मंदिर के ओसारे तक में और फिर पेंशनर सभा भवन में आयोजित होने वाली इन ऐतिहासिक साहित्यिक बैठकों में अमित की इक्का दुक्का रचनाएँ पल्लवित हुई थी. मैं साहित्य का विद्यार्थी था मगर मेरी प्रतिभा ऐसी न थी जो मुझे उन गोष्ठियों में खींच ले जाती.
अमित, आई जी से मिलने जाता था. संजय भी जाता था. मैं भी जाता था. कस्बे में आया हुआ मुसाफ़िर हो या कस्बे का वासी सब अपना वक्त चुरा कर आई जी के पास होकर आते थे. अमित जब मिड लाइफ क्राइसिस में घिरा तो खूब टूटने लगा था. वह किसी आशा में आईजी के पास हो आता था. उसकी असल जो दिक्कत थी वह अभिमन्यु के लिए रचा गया चक्रव्यूह था जिसके भीतर से लौटने के बारे में उसे कुछ मालूम न था. जैसा कि होता है बड़े होने पर सब भाई अलग घर बसा लेते हैं वैसा ही उसके साथ भी हुआ. उसको शिकायत थी कि पिताजी और भाइयों ने उसे बोम्बे के रंगीन जीवन से खींच कर यहाँ रेगिस्तान में ला पटका था. इसके बाद उन्होंने दबाव बनाया कि सब भाई अलग रहेंगे. कोई किसी पर आश्रित नहीं. यही इस दुनिया की रीत भी है. वह जब ऐसी शिकायतें मुझसे करता तो धोखा शब्द का प्रयोग करता था. मैंने कहा अमित तुम दिन भर शराब पीये हुए, अफीम खाए हुए और सिगरेट लिए फिरते हो तो कोई भी परिवार यही करेगा कि वह ऐसे सदस्य पर जिम्मेदारियां डाले ताकि वह अपनी इन आदतों से बाज़ आए. वह इस बात पर उखड़ जाता था. उसको लगता कि ज़मीन जायदाद के सारे फैसले पिताजी छोटे भाई के कहने से लेते हैं. मैं कहता कि किसी शराबी संतान से किसी सुल्तान ने कोई मशविरा नहीं लिया. या तो तुम शराबी ही रहो या इसे छोड़ कर राज्य की चिंता करो. वह कहता मैं भिखारी, मेरे पिताजी ने भीख में देवताओं से मुझे माँगा और मेरा नाम रखा भीखराम, मेरा कहाँ का राज्य और कैसी प्रजा. तुम मेरे दोस्त हो मेरे पास यही सल्तनत है.
इस हाल में वह कवितायेँ लिखता था. उसने अपने भाई के लिए कविता लिखी.
मुझमें बहुत कुछ तेरे जैसा है
तुझमें बहुत कुछ मेरे जैसा है
हम दोनों में बहुत कुछ एक जैसा है
एक कोख से हमने जन्म लिया है
एक ही आदमी का लहूँ तेरी रगों में भी है
मेरी रगों में भी है
मेरे भाई फिर भी तूँ मुझे पराया सा लगता है
और मैं तुझे अपना सा नहीं लगता
तेरा दुश्मन मुझे आज भी
अपना दुश्मन लगता है
तुझे मेरा दुश्मन
अपना दोस्त सा क्यों लगता है?
मेरे भाई मैं जानता हूँ
कि भाई भाई के दरम्यान जो दीवार है
उसकी पहली ईंट
न तूने रखी है
न मैंने रखी है
जिसने रखी है
वह तेरा भी कोई नहीं
वह मेरा भी कोई नहीं
क्योंकि ऐसा आदमी किसी का कुछ नहीं होता है.
इन दिनों ये तय हो गया था कि उसकी जिजीविषा जा रही है. उसने कुछ पत्र लिखे. उनमें लिखा कि मैं मानसिक उपचार चाहता हूँ. मैं ठीक होने की कोशिश में हूँ मगर मेरे गुर्दे खराब हो चुके हैं. मैं खूब तनहा हो गया हूँ. मेरा बारह लोगों का भरा पूरा घर था, वह बिखर गया है. अब मेरे बच्चे और मेरी पत्नी रह गई है. संभव है मैं जल्द ही मर जाऊँगा और मेरे मर जाने के बाद मेरी बीवी को चपरासी की नौकरी करनी पड़ेगी. उसके इन पत्रों में अवसाद चरम पर था. वह हर सातवें दिन फोन नंबर बदलता था. हर बार मेरे पास नये नंबर से फोन आता और वह बोलता- “किशोर दा, संजय के नंबर दो” वह नंबर लेकर कभी कभी संजय को फोन करता था. कहता कि मैं जोधपुर आ रहा हूँ. मुझे चिकित्सक का परामर्श चाहिए. वह दो बार गया. संजय ने उसे किसी चिकित्सक को दिखाया. वह दवा लेकर लौटा. मैंने कहा कि ये कैसी दवाएं हैं. वह कहता- लीवर गुर्दे सब फ़ैल सिर्फ तुम्हारा दोस्त पास. मैं कहता कि दिमाग का इलाज करने गए थे या पेट का. वह हँसता- गोली बड़ा कमीना शब्द है. एक ये गोली है जो मुझे डॉक्टर ने दी, एक वो गोली होती है जो बन्दूक से निकलती है, एक वो जिसकी ज़िंदगी किसी की गुलामी में बीत जाती है. मैं इस गुलामी को ठोकर मारता हूँ. इसके पन्द्रह दिन बाद फोन आया. दवा काम कर रही है. तुम्हारी दुआ चाहिए. मैंने कहा आ जाओ अभी झाड़ा डाल देता हूँ. उसने पूछा- हवन सामग्री लेकर आऊँ? मैंने कहा तुम आला बीमार हो खुद चले आओगे ये काफी होगा. 
हम एक बबूल के नीचे बैठे थे. शाम ढल चुकी थी. स्याही रेत पर उतर रही थी. पत्थर की एक पट्टी पर आमने सामने बैठे हुए एक दूजे को देख रहे थे. हमारे प्लास्टिक के प्यालों को शराब ने अपने भार से थाम रखा था. सिगरेट के धुएं की तलबगार हवा भी थी जो उसे अपने साथ उड़ा ले जा रही थी. उसने कहा- तुम अपनी प्रेम कहानी सुनाओ. मैंने कहा मुझसे कौन प्रेम करेगा पागल. उसने कहा मैं करता हूँ. मैंने कहा- तो फिर मेरा एक काम करो. ये शराब दिन में पीना बंद कर दो. उसने नई सिगरेट जलाई. उसने कहा- तुम मेरे हीरो हो. काश मैं तुम पर कोई फ़िल्म बना सकता. उसकी बातों के टूटे फूटे सिरों के बीच रेत उड़ रही थी. हम दोनों सारे जहाँ से दूर एक विदेशी बबूल की छाँव में बैठे विस्की पीते रहे. अचानक मैं संजीदा होकर आँखें भर बैठा. मैंने कहा तुम मर जाओगे. उसने कहा सबको मरना है. मैंने कहा- बच्चे? उसने कहा चलो चलते हैं शराब खत्म हो गई. इस तरह उसने बात को खत्म किया. इसके बाद हम दोनों मेरे मोहल्ले में अवैध शराब बेचने वालों तक आए. उसने एक आधी बोतल ली. कुछ ग्राम भुने हुए सींग दाने लिए. इस तरह हवन जारी रखने की सामग्री लेकर महावीर पार्क के पीछे बंद पड़ी खोखे वाली दुकानों के आगे बनाये हुए छपरे के नीचे बैठ गए. हमने और पी. रात के पौने बारह बजे पुलिस की पेट्रोलिंग जिप्सी आई. सड़क के किनारों पर पड़ती हुई रौशनी हम पर भी पड़ी. जिप्सी पर दायीं तरफ लगी लाईट में हमारे चहरे और प्लास्टिक के शराब भरे प्याले चमक रहे थे. 

जिप्सी की लाईट गश्त करने आगे चली गई. मैं और अमित उठ गए. अमित ने कहा ये पुलिस अच्छी है. सबसे खराब पुलिस होती है मोरल पुलिस.

सार्वजानिक स्थल पर हवन करते हुए हमने एक पूरी शाम को पवित्र मद से भर दिया था. मैंने कहा भाई सुनो जिस तरह बेल्ली होलीडे दो सिपाहियों की क़ैद में अफीम का इंतज़ार करते हुए मर गई वैसे मत मरना. उसने कहा- मैं इस दुनिया का अकेला नागरिक हूँ, मैं मर गया तो ये दुनिया भी मर जायेगी. वह लड़खड़ाया. मैंने उसका बरसों के बाद हाथ पकड़ा. हम दोनों एक दूजे को घर तक पहुँचाना चाहते थे. मेरा घर पास था. हम घर तक आए. मैंने अपनी बाइक ली और उसे कहा बैठो. दानजी की होदी के थोड़ा आगे. उसने कहा रुको. उसका घर आ गया था. उसके पिताजी उन सबको शराब पीकर गालियाँ देते थे जो उनके बेटे को शराब पिलाकर घर छोड़ने आता था. दोस्त के दिल को ठेस न लगे इसलिए उसने तय किया कि गली में वह अकेला ही जायेगा. मैंने कहा अच्छा मैं चलता हूँ. उसने कहा रुको. उसने जेब से वही अद्धा निकाला और उसमें पानी भर कर बोला. आधा पियो और आधा मेरे लिए बचाओ. मैंने कहा होलीवुड जिस शहर में बसा है वह शहर शराबियों अपराधियों और नालायकों की सबसे बड़ी जगह है. अगली बार इस रेत की जगह उसी शहर की अँधेरी गलियों में पैदा होना. दुआ कर कि कोई अमेरिकी अपने ईश्वर से तुझे भीख में मांग ले.

इतनी सुन्दर शाम के बाद भी मैं उदास लौटा. मुझे जाने क्यों लग रहा था कि वह चला जायेगा और ये हमारी आखिरी दावत है. जाने दीजिए कुछ कवितायेँ इस तस्वीर में पढ़िए जो उसने अपने दोस्त संजय के लिए लिखी थी. मैं उसका दोस्त नहीं था उसका नायक था.

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