डायरी

तुम जो बिछड़े भी तो खुशी है

इस लेख को कहीं भी 
प्रकाशित किये जाने की 
अनुमति नहीं है. 
ये मेरे जीवन का निज हिस्सा 
और अपनी सोच का अक्स है.
हम अगर कर पाते संभावित दुखों की मामूली सी कल्पना तो जान जाते कि ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करने की वजहें बहुत सारी हैं. इस साल के बीतने में एक दिन बाकी है. साइबेरिया से उड़े पंछी रेगिस्तान की ओर आने के रास्ते में हैं. इधर मगर ठण्ड बढती जा रही है. मैं और ज्यादा बर्फ हुआ जाता हूँ कि दिल्ली जो मेरे देश की राजधानी है, वह एक डरावनी बहस में घिरी है. दो प्रमुख दल एक बात बड़े विश्वास से कह रहे हैं कि सस्ती बिजली और ज़रूरत का पानी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है. मैं घबराया हुआ हूँ कि ‘ख़म ठोक ठेलता है जब नर, पत्थर के जाते पाँव उखड़’ वाली जिजीविषा वाले मनुष्य ने अपने हौसले को खो दिया है. या फिर ये आदमी के खिलाफ आदमी की ही साजिश है. दोनों में से जो भी सत्य है वह नाउम्मीदी से भरा है.
रामधारी सिंह दिनकर और रश्मिरथी, डूबते साल में हतप्रभ हों शायद. लेकिन ऐसा नहीं है. हम अक्सर अच्छी बातों को भूल जाते हैं और दुखों के सांप गले में लपेटे हुए, ज़हर पिए शिव बने रहने को याद रखते हैं. मैं रात के अँधेरे में घर की छत पर बने कमरे में बैठा हुआ चिन्हित करता हूँ उन रश्मियों को जो हमारे जीवन में दुखों के अंधकार के बीच आशा का उजास भर रही है. किसने सोचा था कि मध्यप्रदेश की विधानसभा पालथी मार कर जिस नकली संत को भाव विभोर होकर सुन रही हो, जो मंच पर राम लला की ईंट से देश को झकझोर देने वाले चमत्कारी राजनेता के पास बैठा हो, उसके विरुद्ध कुछ किया जा सकेगा. उनकी यौन कुंठाओं और कृत्यों पर भारतीय अदालत में मुक़दमा चल सकेगा और धर्म के रथ पर विकास नाम का वर्क चढ़ाये हुए प्रधानमंत्री पद की ओर दौड रहा उम्मीदवार बिना नफा नुकसान सोचे, ऐसे व्यक्ति के अनुयायियों की संख्या से घबराए बिना साफ़ पल्ला झाड लेगा. ये इस नए दौर का संकेत है कि वह कई महीनों से जेल के सींखचों में कैद पड़ा है. जबकि हमारे यहाँ गांव के सरपंच तक के खिलाफ़ किसी अबला की पुकार न सुना जाना एक आम बात रही है. इसी तरह तहलका और न्याय के लिए आँखों पर पट्टी बंधी हुई माननीय मूरतों के आचरण पर प्रसंज्ञान लिए जा रहे हों, कार्रवाही हो रही हों. साल उदास तो नहीं है.
पिछली बार हम सुनामी में तबाह हो गए थे, इसबार उड़ीसा के महलों से लेकर कच्चे झोंपड़ों तक, तूफ़ान की हर संभव खौफनाक तबाही बरसी मगर जान को बचा लिया गया. उत्तराखंड में आसमान से जो आफत उतरी उससे उबरने में वक्त ज़रूर लगा, जान खूब गवाईं मगर जिस सेना के दम पर हम देश की सुरक्षा सोचते हैं उसने खुद को साबित किया. ये जान लेने की जगह जान बचने का कठिन युद्ध था. रोटी के लाले थे मगर हिम्मत की कमी न थी. इसी साल मैं अपनी एक शाम ऐसे पायलट के साथ बिता सका जो नए लड़ाकू विमानों की सफल उड़ान का परीक्षण करता हो. आप जानते हैं कि हम सब अपने बच्चों और पत्नी या पति के साथ सुख से रहना चाहते हैं. हमें जब कहीं लाखों के पैकेज मिल सकते हों उसके बीच भी जान जोखिम में डाल कर सेवानिवृति के बाद भी देश के लिए खतरों से भरी उड़ानें भर कर खुद को ज़िंदा होने का अहसास दिलाते हैं. ऐसे इंसान के साथ दो बीयर और पीने का जी, मुझे ज़िंदगी में आगे की ओर धकेलता है. तो उदासी का साल नहीं है.
इस साल की शुरुआत ही खूबसूरत थी. मैं और आभा गुलाबी शहर की सड़को, गलियों और छतों पर मंडराते हुए परिंदों के पंखों की छाँव तले बिता रहे थे. दुनिया इस तरह तेज़ रफ़्तार है जैसे किसी ब्लेक होल की तरफ खींची चली जा रही हो, ऐसे वक्त में हम दोनों सेन्ट्रल पार्क में सुस्ता रहे थे. एक गोरा आदमी फल खाते हुए तोतों की तस्वीरें उतार रहा था और हम देख रहे थे एक भव्य तिरंगा शान से पार्क के बीच फहरा रहा था. राजपथ जैसी सड़क के किनारे छोले कुलचे, राजापार्क में पानी पताशे, विद्याधर नगर की चौपाटी में चाट वाले और हवामहल की अनूठी छवि के आगे ज़िंदगी के विस्तार पर ठहरा हुआ एक लम्हा. दिल्ली के प्रगति मैदान में किताबों से रचे अद्वितीय संसार में दोस्तों के साथ कॉफी से भरे प्याले लिए हुए धूप की आमद का इंतज़ार करते जाने के दिन. जयपुर के पास महल गाँव में अपने घर की बालकनी में बैठकर काली ऊदी घटाओं के स्याह रंग से भीगे हुए, अपने बच्चों के लिए सुखद भविष्य की कामना में देश की मिटटी को निहारते जाने की स्मृतियों से बना हुआ साल. कैसे कह दूं कि उदास है.
इसी साल आस्था के चरणों में घी की बहती हुई नदी सडकों पर उतर आई. देश भर ने उसे जी भर कर कोसा. असीम सुख हुआ. गड़े खजानों की खोज में रत इस दुनिया में कुछ नहीं बदला. विज्ञान के घोड़े पर चढ़े हुए हमारे देश के ज्ञानी लोगों की अक्ल भी एक साधू ने निकाल ली. हमने उनको भी खूब कोसा. उनकी सार्वजनिक खिल्ली उड़ाई. मेरा जी खुश हुआ. क्रिकेट के भगवान की विदाई में स्टेडियम की दर्शक दीर्घाएं आंसुओं से भर गयी. इस विदाई के समय, अब्दुल क़ादिर की घूमती हुई बाल पर एक घुंघराले बालों वाले लड़के के बल्ले से उड़ते हुए चौके चोके छक्के, जो हाई स्कूल वाली गली में एक दुकान के बाहर खड़े होकर देखे थे, उस लम्हे की याद भी इस साल साथ रही. लड़कियों को स्मैश करते हुए देखा, दुनिया को अपने खेल का लोहा मनवाते देखा. परिवार कल्याण के बेटी बचाओ वाले बेअसर पोस्टरों के बीच ऐसी बेटियों पर फख्र करता और उनके अपने घर में होने की कामना करता हुआ देश देखा. निर्भया की शहादत के बाद सबको स्त्री सम्मान के लिए एकजुट देखा. बीत गया है ऐसा साल. कहो कैसे कह दूं कि उदास है.
इस साल मैं एक मकड़ा था, स्वस्थ और मनोरोगी होने के बारीक तार पर झूलता हुआ. कुछ महीने दीवानेपन में गुज़रे, कुछ दवा खाते हुए. एक घर-संसार वाला मकड़ा, जिसे न आता हो कोई जाल बुनना. जिसकी कामना में सिर्फ मुक्ति हो. जिसके रेगिस्तान वाले घर के ऊपर उड़ते हों लड़ाकू विमान. जिसने दोस्तों के हिस्से में रखा हो आवाज़ देने का फ़ैसला. जिसने चुना हो बच्चों के लिए उनकी पसंद का रंग. जिसने पत्नी से कहा कि तुम घर के कामों और स्कूल के बीच याद रखो कि यही एक ज़िन्दगी है. हमें इसी को जीना है, इसलिए वक्त चुरा कर अपनी पसंद के काम करते जाओ. इतना कह कर मकड़ा शाम होते ही खो जाता अँधेरे की रहस्यमयी दुनिया में. अँधेरा जादू का घर है. आपने कभी सोचा है कि एक बीज में एक पेड़ कैसे छुपा होता है. मैंने सोचा. इसलिए शब्दों में से उगा ली कई किताबें. कभी अचानक खयाल आया कि एक तवील बोसे में छुपी हो सकती है कोई दूसरी दुनिया की झलक. ऐसे करने पर सुना कि ये सब कहाँ से सीखा तुमने?
मैं कल की शाम कैसे बिताऊंगा, ये नहीं मालूम. मौसम सर्द है. हवा में बर्फ की तल्खी है. दुनिया गोल नहीं, आयताकार है. फोन, टेबलेट और कंप्यूटर के स्क्रीन जैसी. आम आदमी से डरे हुए हैं सब केसरिया आदमी. लाल झंडे बौद्धिक बहसों से परे जंगलों में अलाव ताप रहे हैं. चरखे के निशान से पंजे तक पहुंचे लोग अपने घर जाने की बारी के इंतज़ार में हैं. कुल मिलाकर मौसम मस्त है. बीते कल की रात महबूब के लिए कवितायेँ लिख रहा था. आने वाले कल की रात समय की सुराही से टपकनी बाकी है मगर कौन कहता है साल उदास है. ये इस प्रतिबद्धता का भी साल है कि छींके में अंडे की तरह सुख से लटके रहना भी कोई ज़िंदगी है? कभी हमें उठाना चाहिए कौम के लिए भी अपना हाथ, कभी हम डालें हाकिम के गिरेबान पर भी बुरी नज़र.
प्रेम हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत और ताकत है. रूमानी ख़यालों में जीना और हादसों से भरा वक्त का फटा हुआ चादर ओढ़े आगे बढते जाना मनुष्यता का सबसे सुन्दर प्रतीक है. जो बिछड गए उनका इंतज़ार और जो साथ हैं उनकी अँगुलियों के पोरों पर बैठी हुई गर्मी को साझा कर लेने की उम्मीद सबसे सुन्दर उम्मीद है. दुखों के अंधे कुंए में या रास्तों के बीहड़ में खो गए लम्हों की स्मृतियाँ, एक दिन हमारी देह के साथ बुझ जायेगी. मगर उससे पहले एक दिन हम देखेंगे कि सोने की चिड़िया कोई कहावत नहीं है. एक दिन हमारी जींसों की खाली पड़ी हुई गोल्ड कोइन जेबें भर जाएँगी. एक दिन हम हांक देंगे, सब दुखों की परछाइयों को पहाड़ की तलहटी, रेगिस्तान के धोरों की पीठ या समंदर के गर्भ की ओर. उस दिन तक के लिए, इस साल का बहुत शुक्रिया, नया साल आप सबके लिए मुबारक हो. आने वाले मौसमों में खूब अच्छी विस्की और खूब सारा सुकून बरसे.
* * *

इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर टाइम मेगजीन से ली गयी है. बच्चों के अस्पताल की खिड़की को एक कर्मचारी साफ़ कर रहा है.
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