डायरी

वो दुनिया मोरे बाबुल का घर

ज़माना बदल गया है. जिंदा होने का यही सबसे बड़ा सबूत है. किताबें भी बदल गयी हैं. आजकल बहुत कम लोग अपने थैले में किताबें लेकर चले हुए मिलते हैं. कई बार मुझे ये लगता है कि किताबों से हट कर कुछ लोग अपने मोबाईल में खो गए हैं. जैसे मोहल्ले भर की हथाई को सास-बहू के सीरियल चट कर गए हैं. अब हथाई पर आने वाली गृहणी सिर्फ सास बहू सीरियल का संवाद लेकर ही हाजिर हो सकती है. जैसे पहले के ज़माने में किसी का अनपढ़ रह जाना कमतरी या बड़ा दोष गिना जाता था. उसी तरह आजकल हर जगह की हथाई में हाजिर गृहणी के लिए सास बहू सीरियल का ज्ञान और ताज़ा अपडेट न होना कमतरी है. उसकी जाहिली है. इसी तरह का कानून सोशल साइट्स पर भी लागू होता है. अगर किसी के पास फेसबुक, ब्लॉग या ट्विटर जैसा औजार नहीं है तो वे कमतर हैं. लेकिन कुछ चीज़ें कभी भी अपना रस और आनंद नहीं छोड़ती. वे सुस्त या खोयी हुई सी जान पड़ती है मगर उनका रस कायम रहता है. चौबीस अक्टूबर का दिन और दिनों के जैसा ही होता होगा मगर कुछ तारीखें कुछ लोगों की याद ज़रूर दिलाती है. जैसे उर्दू की फेमस अफसानानिगार इस्मत चुग़ताई का इसी दिन गुज़र जाना. ये पिछली सदी के साल इकानवे की बात है जब उर्दू कहानी का ये बड़ा नाम हमसे विदा हो गया था. वह अपने पीछे ऐसे अफसाने छोड़ गया जो हमें गुदगुदाते हुए रुलायेंगे. हम जब भी उनकी व्यंग्य भरी चुटीली भाषा को पढेंगे तो पाएंगे कि रसीले आमों कि टोकरी सदा भरी भरी है. उन्हीं आमों के बीच कडवे करेले भी रखे हैं. जिस समाज को आप और हम इस्मत चुग़ताई के अफसानों में पढ़ते आये हैं वह भी अपने हाल से अभी तक टस से मस नहीं हुआ है. हमारी आदतें और लालची प्रवृतियाँ, हमारी छुपी हुई हसरतें और ओछी हरकतें और हम सब का अपनों के लिए है नहीं वरन परायों के दुःख से भी दुखी हो जाना. हम ऐसे ही हैं. हम कभी बदलने वाले नहीं है. हम सन्यास से लेकर भोग के बीच के हर हिस्से में समाये हुए हैं.

मैंने परसों जोधपुर की यात्रा की थी. सुबह रेलगाड़ी से जाना था और वापस शाम को उसी कालका से लौट आना था. बड़ी भव्य रेल है. मैं इसके सम्मोहन में हमेशा घिरा रहता हूँ. अक्सर घर की छत पर होता हूँ तब गर्मी के दिनों में धुंधलका होने और रात के घिर आने के बीच ये शानदार गाड़ी मेरे सामने से गुज़रती है. सर्द दिनों में इसकी रौशनी मेरे दिल से होकर गुज़रती है. इसका पहला सिरा जब रेल स्टेशन को छू रहा होता है तब इसकी पूँछ कोई आधा किलोमीटर पीछे कुछ बिल्डिंग्स के पिछवाड़े में दबी होती है. इसी ट्रेन से लौटते हुए आप सचमुच बेहिसाब आनंद ले सकते हैं. खाली डिब्बों में एक रहस्यमयी वातावरण पसरा रहता है. रेल के चलने की आवाज़ इस जादू को और गहरा करती है. मैंने यात्रा के लिए अपने साथ इस्मत चुग़ताई का कथा संग्रह ले लिया. ये कहानियां ऐसी हैं कि आप इन्हें बार बार पढ़ सकते हैं. लिहाफ कहानी के बारे में ज्यादा लोग जानते हैं. इसी कहानी की वजह से इस्मत पर मुक़दमा चलाया गया था और इसके सिवा पांच पांच मुकदमे वाले सिर्फ मंटो थे. इस्मत चु’ग़ताई का जन्म बदायूं में हुआ लेकिन वे पली बढ़ी जोधपुर में. इसलिए जोधपुर जब भी जाओ कहीं किसी कोने से इस्मत के अफ़साने का एक किरदार बच्छू  फूफी हर कहीं दिख जाता है. मीठी मीठी गालियाँ देता हुआ. मैंने उनके अनेक किरदारों को रेलगाड़ी और जोधपुर की गलियों में पाया है. बम्बा मोहेल्ले में चले जाओ तो हर अक्स कुछ वैसा ही दिखाई देता है. बम्बा रुई को कहते हैं और ये रुई धुनने वाले गद्दे भरने वाले लोग अपनी शक्ल सूरत से इस्मत आपा की रची हुई दुनिया जैसे हैं.

सुबह मालूम हुआ कि प्रबोध चन्द्र डे नहीं रहे और वही चौबीस अक्टूबर का दिन. वैसे हम सब उनको मन्ना डे के नाम से ही जानते हैं. पहला ख्याल आता है कि कोई गा रहा है- ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन… बस और दिल भर आता है. उनकी पहचान उनकी आवाज़ है. हमेशा कायम रहने वाली दिलकशी गायकी उनकी पहचान है. मैंने साल तिरानवे में चूरू एफएम पर काम शुरू किया था. वहां जिस दुकान से किराणा का सामान आता था उसके मालिक सलीम साहब थे. वे एक दिन बड़ी हसरत से बोले कि एक काम कर देंगे आप? मैंने कहा कहिये. वे बोले मन्ना डे साहब के जितने भी गीत आपकी इस आकाशवाणी में हैं सब रिकार्ड कर के दे दीजिये. वे पहले इन्सान थे जिनसे मेरा इस दीवानगी से सामना हुआ. बाद के सालों में मुझे मालूम हुआ कि मन्ना डे के चाहने वालों के बारे में जानने के लिए मेरी उम्र बहुत कम है. बस, लागा चुनरी में दाग में छुपाऊं कैसे की तरह इस आवाज़ की गिरहें हर किसी को अपने पास बाँध कर रख लेती थी. मुझे शास्त्रीय संगीत की समझ नहीं थी और शास्त्रीय संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों का एक विशेष कार्यक्रम हर सप्ताह हुआ करता था. मैं अपनी नासमझी से बचने के लिए हर बार मन्ना डे की शरण में चला जाया करता. उनका गाया हुआ हर गाना मेरे लिए शास्त्रीय संगीत आधारित था. यूं सभी गायक गायिकाएं रागों पर ही आधारित कम्पोजीशन में गाया करते हैं. मगर जो बात मुझे इस आवाज़ में लगती रही वह और कहीं न थी. चौबीस अक्टूबर के ही दिन इस्मत आपा की तरह हमारे प्यारे मन्ना दादा भी गुज़र गए. उनके संगीत को दिए योगदान के बारे में बात करते हुए कई ज़माने और गुज़र जायेंगे. हिंदी और बंगाली भाषा के पास आज उनकी आवाज़ अतुल्य पूँजी है. आपने भी शायद कभी साहित्य और संगीत के रस की एक अनूठी मिसाल देखी हो. मुझे लगता है कि वह आपके ख़ुद के पास होगी ही. हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला, मन्ना डे की आवाज़ में. हमारे बस में अगर कुछ होता तो हम सब कुछ बचा कर अपने पास रख लेते लेकिन सच है कि जिंदा चीज़ें यकीनन गुज़र ही जाती हैं. लेकिन कुछ फनकार ऐसे होते हैं जो हमारे लिए ऐसी विरासत छोड़ जाते हैं कि वे हमेशा हमारे बीच जिंदा रहते हैं. उनके शब्द, उनकी आवाज़ हमेशा कानों में शहद घोलती रहेगी. कोरी चुनरिया आत्मा मोरी, मैल है मायाजाल, वो दुनिया मोरे बाबुल का घर, ये दुनिया ससुराल.

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