डायरी

जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।

ये परसों रात की बात है। शाम ठीक से बीती थी और दफ़अतन ऐसा लगा कि कोई ठहरा हुआ स्याह साया था और गुज़र गया। मेरे आस पास कोई खालीपन खुला जिसमें से ताज़ा सांस आई। काम वे ही अधूरे, बेढब और बेसलीका मगर दोपहर बाद का वक़्त पुरसुकून। 
कहीं कोई उदास था शायद, वहीं कोई शाद बात बिखरी हो शायद।
* * *
ऊंट की पीठ पर रखी उम्र की पखाल से, गिरता रहा पानी 
और रेगिस्तान के रास्तों चलता रहा मुसाफ़िर ज़िंदगी का। 
बस इसी तरह बसर हुई। 
कम फूलों और ज्यादा काँटों वाले दरख्तों, धूप से तपते रेत के धोरों और अकूत प्यास से भरी धरती वाले ओ प्यारे रेगिस्तान, तैयालीस साल असीम प्रेम देने का बहुत शुक्रिया। 
तुम्हारे प्रेम में आज फिर एक नए बरस की शुरुआत होती है।
जन्मदिन शुभ हो, प्यारे केसी।
* * *
शाम ढले घर में पाव के सिकने की खुशबू थी। 
पेशावर से मैं कभी जुड़ नहीं पाता। मुझे मीरपुर खास ही हमेशा करीब लगता है। देश जब बंटा तो सिंध से आए रिफ़्यूजियों के हर झोले में गोल ब्रेड थी। जिसे वे पाव कहते थे। कोई तीस हज़ार साल पहले किसी कवक के गेंहू के आटे में पड़ जाने के बाद जो फूली हुई रोटी बनी, ये उसी का सबसे अच्छा रूप है। जिस तरह तंदूर के बारे में हमें थोड़ी सी मालूमात है कि ये पहाड़ों से सरकता हुआ रेगिस्तान के देशों तक आया, उसके उलट किसी को ये मालूम नहीं है कि पाव ने किस रास्ते को तय किया है। योरोप के लोग जिंहोने हमारे जैसी पतली कागज़ी रोटी खाना अब तक नहीं सीखा, वे इस पाव पर बड़ा हक़ जमा सकते हैं अगर इटली वाले कोई आपत्ति न करें तो। असल में फ्रांस की क्रांति के बारे में बात करते हुये लोग रोटी की गंध से भर जाते हैं। 
पिछले दफ़े जब जयपुर में था तब आधी रात हो चुकी थी और खाने का वक़्त जा चुका था। बच्चे सो रहे थे और मैं रोटी सेक रहा था तभी मनोज ने कहा- दुनिया की सबसे अच्छी खुशबू सिकती हुई रोटी की होती है। फ्रांस के, वे केफ़ेटेरिया में बहसें करने वाले लोग जब भूख से बेहाल हुये तो ब्रेड के लिए राज महल को लूटने चल पड़े थे। अफ्रीका वाले लंबे और काले लोग ब्रेड के बाद ही हर धरम का उदय मानते हैं। वे अपनी इस अनमोल चीज़ से वेदिक लोगों की तरह ही भोग लगाते हैं। मैंने देखा है कि देवताओं के लिए ब्रेड एक ज़रूरी चीज़ है। रिफ़्यूजियों के आने से पहले ही हमारे यहाँ खूब ब्रेड बना करती थी। भारत आए गोरों ने ब्रेड बनाने की भट्टियाँ सबसे पहले लगवाई थी। उन भट्टियों ने हमें बताया कि भूख मिटाने के लिए पेट भरने की जगह विलासिता के कई तरीके ईजाद किए जा सकते हैं। औध्योगिक क्रांति के समय तपेदिक से मर जाने वाले अनगिनत नौजवानों की असल मौत ब्रेड के खत्म होने के बाद हुई थी। 
हम केक नहीं काटते। हम जन्मदिन पर मुंह मीठा करते हैं। गुड़ हो या रस-मलाई। फिलहाल आभा ब्रेड सेक रही है। जिसे हम पाव कहते हैं। इसकी खुशबू बेहद प्यारी लग रही है। ब्रेड हमेशा बची रहे कि बेहिसाब दुआएं दोस्तों ने दी है। दोस्तों का भला हो कि आज प्याला सिर्फ दुआओं से भरा है।

चलो आज का दिन कुछ यूं मनाए, कि जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।
वैसे तो कुछ न भूला जाएगा हमसे, इसलिए भूल जाने की अफवाह उड़ाएँ।
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