डायरी

बीते गुरुवार की शाम

दोपहर कायदे से हुई नहीं थी। मुझे भी जब तक धूप पूरी खिली हुई नहीं दिखती तब तक मेरी कार्बन क्लॉक दोपहर होना मानने से इंकार कर देती है। बारिश की हल्की बूंदे गिर रही थी। वह भी बालकनी में आ गई। मैंने कहा ज़रा मेरे पास दीवार का इधर से सहारा ले लो। वह कहती है देखो तेज़ रफ्तार कारें भागी जा रही है। मैं कहता हूँ- और क्या दिख रहा है। कहती है कुछ पौधे कुछ फूल और कुछ बच्चे। हँसती है क्या कहानी लिखोगे? मैं कहता हूँ- सुनोगी? बेटी भी आ जाती है। उसको कहानी की बेवफाई पर शायद कोई एतराज है। मैं कहता हूँ कि ये गए दिनों की बात है जब एक आदमी में छिपे होते थे दस बीस आदमी। आज कल एक आदमी में छिपी होती हैं हज़ार दुनियाएं। 
बेटी की आँखों में कहानी के कथ्य से नाउम्मीदी है। वह लड़की अगर बेखौफ इतना प्यार करती थी तो बिना कोई मुलाक़ात का वादा लिए चली क्यों गयी? और वह सात साल का फासला उसने क्यों आने दिया? मैं कहता हूँ- देखो तुम्हें क्या दिख रहा है? मुझे मौल्स, बादल और बेहिसाब भीड़। मैंने कहा चलो वहीं चलते हैं। सारे दिन खयाली पुलाव पकाना और झूठी कहानियाँ कहना कोई अच्छा काम नहीं है। 
जवाहर सर्कल, डब्लूटीपी, जीटी, जेपी फ्लायओवर, अक्षय पात्र होते हुये वापस उसी बालकनी में। एक याद का पनियल पर्दा है कभी सूखने लगता है तो कई सारी चीज़ें उसे भिगोने के लिए आ जाती हैं। यही ज़िंदगी है। तुम अपना वादा न भूलना….

कहानी सुनो-

दायें हाथ की तरफ बैठे ड्राइव करते हुये कहा- कितना तो अच्छा है न?

लो फ्लोर की बस को फॉलो करते हुये कार चलती रहती है। मुझे लेखक या कवि होने की ख़्वाहिश नहीं थी। मुझे खूब तनहाई की दरकार थी। वक़्त के सितम से चूर अतीत का आईना और रास्ते पर बेतहाशा भागती हुई ज़िंदगियाँ। तुम्हारी कमीज का ये गोटा किस रंग का है? सवाल ज़ुबान तक नहीं आया।

कुछ बात करो न?

ये फूल देखो। मेरे होठों पर प्यास थी ही नहीं। मोबाइल एक तस्वीर तामीर करता है। स्केट करते बच्चे गुज़र जाते हैं। पंछी खुले मुंह से ताकता है। बागीचे में घूमते हुये लोगों को कहता है- मर गयी सरगोशियाँ।

डिवाइडर को पार करने बाद एक खोयी हुई लड़की और बीच का सात साल का फासला कुछ कदमों में बाकी रह गया। बेसाख्ता दूर से ही अपना हाथ उठाया तो उसने अपने दोनों हाथ मुंह पर रख लिए। कुछ दिन यहाँ हो? उसने कहा- हाँ।

ताज़ा दर्द से भरे हुये दामन में कोई अक्स करवट लेता है इसलिए ये पूछना मुल्तवी कि जिस तरह आज अचानक हम मिले हैं क्या कभी कोई तय मुलाक़ात भी होगी?

व्हाट्स एप पर लिखा स्टेटस मिटाने लगता हूँ। आओ रूमानी हो जाएँ।

इतिहास कुछ नहीं होता, हम जिस रास्ते पर कदम लिख रहे होते हैं उन रस्तों की धूल जब तक जिस शक्ल में याद रहे वही है। तवारीख में लिखा था। तुम एक तीस साल के आदमी से प्यार करती हो। हाँ करती हूँ कोई मेरा क्या बिगाड़ लेगा।

कुछ नहीं बिगड़ा। सड़क दोनों तरफ जाती थी। वे भी अलग अलग दिशाओं में चले गए।
* * *

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