डायरी

कि मैंने क्या नहीं किया

वह सब कुछ जो आपने कमाया या भुगता है। वह जो सुकून था या हताशा थी। वह जो था या वह जो नहीं था। इस हिसाब बेहिसाब में आप बीती हुई उम्र के कटे फटे, रंग-बदरंग खोल को उतार कर एक तरफ रख देते हैं। जो सीखा उसे भूल जाने की दुआ करते हैं। सब कुछ छोड़ कर चुन लेते हैं किसी एक को। अपने आपको कर देते हैं उसके हवाले। 
अचानक से नील गाय से टकरा कर दो मोटरसायकिल सवार सड़क पर गिर पड़ते हैं। मैं सफ़ेद तलवों वाले काले जूतों को मिट्टी से बचाना भूल कर उन्हें सहारा देकर उठाना चाहता हूँ। लेकिन नील गाय के अचंभित होकर भाग जाने साथ ही वे दोनों सवार भी उठ जाते हैं। उनके कंधे, कोहनियाँ और घुटने छिले हुये। एक का होठ कट गया था। वह अपनी हथेली से बहते खून को रोकने की कोशिश कर रहा था। मोटरसायकिल की हेडलाइट टूट कर बिखर चुकी थी। एक सेलफोन सड़क के किनारे कई हिस्सों में बंटकर गिरा पड़ा था। मैं उन्हें कहता हूँ- भाई देखो, तुम दोनों ज़िंदा हो। इतनी ज़ोर की टक्कर को बरदाश्त करने की ताकत तुम्हारी इस नाज़ुक खोपड़ी में नहीं है। वे दोनों अपने दर्द को भूल कर एक दूजे की चोटों का मुआयना करते हैं। मैं महल गाँव से निकला था और मुझे गौरव टॉवर जाना था। मुझे बीतती हुई शाम के रास्ते को जल्दी तय कर लेना था। इसलिए वहाँ और रुकना मुमकिन न था। उन दोनों को सांत्वना देने के लिए कुछ और लोग आ चुके थे। 
झाड़ियों के बीच से नील गाय ने एक बार मुड़ कर देखा। उसे इस तरह देखते हुये मुझे खयाल आया कि हर किसी के साथ ऐसे हादसे क्यों पेश आते हैं। हम ज़िंदगी को कितना भी संभाल कर रखे एक दिन वह अप्रत्याशित रूप से ठोकर खा बैठती है। मैं भी ऐसे ही टकरा कर गिर पड़ा था। कि मैंने क्या न किया था। मैंने चाहा, मैंने साथ दिया, मैंने प्यार किया मगर ज़िंदगी ने बेरहमी से ठुकराया। वो ज़िंदगी, जिसको ऐक्विटेन्स टाइप के रिलेशन्स को संभालने की गरज रहती है। पैदल चलते हुये एक खयाल का सिरा मेरी पीठ पर थपकी देता जाता है। तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे और तुम्हारे चाहने वाले सब कोई तो रो पड़ता अगर तुमने ये मूर्ख किस्सा बयान किया होता। इसलिए झूठी कहानियों का सच्चा संसार एक अच्छी जगह है। मैं मुड़ कर देखता हूँ, अक्षय पात्र का गुंबद बहुत पीछे छूट गया है। ज़िंदगी के सफ़र में बहुत कुछ छूटता ही है इसलिए दिल से कहता हूँ कि छूटते जाने को आदत में शुमार कर लो। 
आपने कभी किसी से प्रेम किया है? अगर इस बारे में सही सही चीज़ें याद कर सकें तो पाएंगे कि इससे बड़ी मूरख और इससे अधिक प्रिय बात ज़िंदगी में कोई न थी। अच्छा खासा जीते हुये, सुकून से शामें बिताते हुये, मौल्स और केफे के लकड़ी के पट्टों वाली रेलवे बेंचेज़ पर बैठे कितना समय बेखयाली में बिता दिया था। बिना किसी इंतज़ार और बिना किसी प्लान के दोस्तों से मिलते हुये। बर्गर, पिज्जा, सिगरेट और चाय के साथ लम्हों की छोटी छोटी कतरनें करते हुये जीना, क्या खूब जीना था। बेखयाली थी मगर अफसोस और दुख न था। इंतज़ार था मगर इतना गहरा न कि किसी को याद करें और रो पड़ें। प्यास में तीन ग्लास पानी एक साथ पिया तो लगा जैसे बीयर का पींपा पी लिया है। ज़िंदगी का नशा आंखो तक उतर आया है। लेकिन कभी आप पाते हैं कि शराब पानी हो गयी और बेखयाल और बेलौस ज़िंदगी एक भारी टोकरा बन कर सर पर सवार है। 
मेरे पास एक पिट्ठू बस्ता है। इसमें अच्छी विस्की और वोदका की दो बोतल रखने के बाद जगतपुरा से एक ओटो लेता हूँ। ऑटो वाले से कहता हूँ गौरव टॉवर छोड़ दो। मैं पाँच दिन से इसी शहर में हूँ। मौसम बेहद गरम है। एक एसी और एक फ्रीज़ की ज़रूरत है। वेलेट में पैसे हैं मगर न एसी आता है न फ्रीज़। यही ज़िंदगी है कि कई बार हालत आपको इस कदर मजबूर कर देती है कि हाथ के ग्लास का पानी पीना मुमकिन नहीं होता। सॉफ्ट ड्रिंक की प्लास्टिक की बोतल पर कपड़ा बांध कर उनको पानी से भिगो कर रखता हूँ। ऐसा करने से पीने लायक ठंडा पानी मिल जाता है। मैं शिकायत नहीं करता, ये बड़ी मामूली बात है कि आपको गरम पानी पीना पड़े या झुलसाती हुई लू में जलना पड़े। इस बदन से ज्यादा हादसे इस रूह ने सहे हैं। उसकी जलन और चोटों के निशान आप किसी को दिखा नहीं सकते। रूह की चोट का कोई मरहम भी नहीं होता। उन्हें कोई देख नहीं पाता इसलिए हमदर्दी भी नहीं जता सकता।
एक पूरी ज़िंदगी में इतना काफी होता है कि कोई एक आपका इंतज़ार करता हो। कोई एक आपको आवाज़ देने या सुनने के लिए वक़्त के हिस्से चुरा लेता हो। मैं चमक और चौंध की दुनिया में दाखिल हो जाता हूँ। कारों की लंबी कतारों के बीच से एमएनसीज के ब्राण्ड्स पर नज़र डालता हूँ। वे उकसाते हैं। उनमें भव्यता का गुरूर है। उनमें विलासिता की बू है। वे मुझे धूप और लू की दुनिया से बाहर खींच कर अपने पास बैठा लेना चाहते हैं। मेरे पास मगर बुझे हुये वक़्त का बहता दरिया है और यादों की टूटी फूटी नाव है। इसलिए मैं एक दोस्त का हाथ थाम कर बाहर ही बैठ जाता हूँ। ये एक लेंपपोस्ट के नीचे लकड़ी से बनी हुई गोल सीट है। मैं कहता हूँ- देख कहाँ चला आया हूँ। वे नौजवानी के दिन, वे रेत के टीलों के बीच आंधियों के साथ उड़ती आती धूल के दिन जाने कहाँ छूट गए हैं। वे दिन जो असीम प्रेम और अकूत लज्जा के दिन थे। उन दिनों ऐसे मौल और सेलफोन क्यों न ईजाद हुए। हम किसलिए बूढ़े हो गए हैं। इससे भी बड़ी बात कि इस उम्र में भी अक्ल की कमी है और प्रेम ज्यादा। मैं लेंपपोस्ट से पीठ टिका कर भूल जाना चाहता हूँ, अभी थोड़ी देर पहले बाइक से गिरे दो नौजवान लोगों की चोटों को, नीलगाय के अचंभे को, अपने अतीत को और अपनी रूह के इस कारनामे को कि चोट खाना और चलते जाना। 
अगर ज़िंदगी फिर से किसी अंधेरी सड़क के किनारे कुछ देर के लिए रोक ले अपना सफर तो मैं उसे चूमते जाना चाहता हूँ। कि मैंने क्या नहीं किया तुम्हारे लिए?
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