डायरी

प्यासे तारे कूद पड़े दो प्यालों में

अभी कुछ देर पहले कुदरत ने आसमान के बीच खींची बादल से एक रेखा। मैंने कहा मेरा महबूब उस पार, मैं इस पार। कुदरत ने उसे मिटा कर बना दिये असंख्य पहाड़। मैंने कहा मैं इस चोटी पर वो उस चोटी पर। उसने पहाड़ों पर घुमाया हाथ और बना दी असमतल ज़मीन। मैंने कहा मेरे भी पाँवों में छाले, महबूब के पाँवों में भी छाले। मैं भी थक गया उसकी ओर चलते, वह भी थक गया मेरे पास आते। कुदरत ने सब कुछ मिटा कर बना दिये असंख्य तारे। मैंने दो प्यालों में भर ली महबूब की याद भरी शाम। उस पर डूबते सूरज से चुराई नींबू की तरह गोल एक फांक को रख दिया। सब प्यासे तारे कूद पड़े इन दो प्यालों में। आखिर कुदरत कब तक करती किसी महबूब का मुक़ाबला।
मेरा महबूब तो बालकनी में मेरे पाँवों पर खड़ा हो कर चूम भी सकता है मुझे। और मेरी खूबी ये है कि मैं सिर्फ उसी से प्रेम करता हूँ।
25 अप्रैल 2013 
पूरे चाँद की रात 
मैं छत पर बिछाता हूँ एक सूती दरी। किनारे पर रख देता हूँ खाली प्याला और चाँदनी में गुम हुई स्याही के बीच जगमगाता है, मेरा अतीत। फिर आहिस्ता से दिन की लू में झड़े हुये कुंभट के हिलारिये, केर के सुर्ख ढालू और रोहिड़े के फूल हवा के साथ उड़ते चले आते हैं। मेरी छत भर जाती है अनगिनत रंगों और स्वाद से। रेगिस्तान की हर शे को फिक्र है मेरी कि मैंने सीखा है प्रेम करना इसी की गोदी में। वही प्रेम जो सौंप दिया है, तुमको… 
बालू की भंवर से टकरा कर सरगोशियाँ रचता हुआ हवा का अनदेखा जादूगर मुझे हमेशा भर लेता है अपने सम्मोहन के बाहुपाश में। तब वह पूछता है महबूब के बारे में और मैं कुछ बेवजह की बातें कहता हूँ। दुनिया के सबसे प्यारे इंसान, मेरे महबूब के बारे में बातें… 
* * *
20 अप्रैल 2013 
क्ले से मेम बना देती है खरगोश के कान, 
जिराफ़ की गरदन, बंदर की पूंछ और एक काओला की मुस्कान। 
मैं क्ले और तुम मेम। 
उसने कहा कि इस मंत्र के बाद बोलो अपने महबूब का नाम। वो चोर पंडित चाहता था कितनी बड़ी दक्षिणा।
मैं एक परिंदे का दिल ले जाऊंगा रफ़ूगर के पास। इसके बदले वह मुझे अपनी चोंच उधार देगा, प्रेम करने के लिए। तुम क्या कहते हो, कर लूँ ये सौदा? 
मैं शाम के कान में कहता हूँ वही बात जो तुमने मुझसे कही थी। कि हम फिर मिलेंगे। शाम भीगी आँखों से मुसकुराती है। 
बादल की तिरछी रेखा के नीचे, शाम की आखिरी टहनी से, कूद जाता है तेरी याद का लम्हा, मेरे गले लगने को। तुम सचमुच बहुत प्यारे हो। 
प्रेम के मुकुट में जो तुम्हारी हंसी का मोरपंख लगा है, उसे देखने के लिए आंखे नहीं चाहिए। मन काफी है। 
ज़ख्म सीले थे और कुदरत मुझ पर नाराज थी। इसलिए बादल ने किया धूप की चादर में छांव का सुराख, धरती के जिगर की उमस ने पी लिया बादल को। रात की झोली ने सोख लिया पानी और आंधियों के पास नहीं थी कोई दवा इसलिए उन्होने ढ़क दिया ज़ख़्मों को रेत से। 
मैंने कहा शुक्रिया! 
पूरब की ओर से सुबह फिर आई है, तुम अपनी बेरुखी पर नाज़ कायम रखो कि ज़ख्म अब भी वहीं है, रेत की चादर के नीचे, तुम्हारी खुशी के लिए। 
* * *
19 अप्रैल 2013 

हर सुबह चिड़िया देती है अर्ज़ी तुम्हारी छुट्टी की, चाय के प्याले में आँख की परछाई लिख देती है, मंजूर। कायदे से चल रहा है कारोबार इंतज़ार का। 
दिन सूना खाली चेहरा था और मौसम में कोई खुशबू ही न थी। और फिर किसको पुकारें, जाएँ कहाँ कि आवाज़ देने को कोई खिड़की ही न थी। बस शाम हुये बारिश ने जी को एक थपकी दी है। बूंदों की आवाज़ें अब भी पर्दे से छन कर आती है, तुम न बोलो तो न ही सही… 
* * *
18 अप्रैल 2013 

गरम सांस सी लू की लहर ने चूमा बदन, इंतज़ार में खिले आक के फूल बिछ गए ज़मीं पर। ओ महबूब ! रेगिस्तान प्यारा है कि तुम इसकी हर शै में हो। 
तपती रेत पर रख दिये हैं रात ने अपने होठ, मैंने पौंछ ली है, गर्द सेल फोन के स्क्रीन से। बिजलियाँ तेरी याद की, बादल मेरी चाह के। 
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