बातें बेवजह

फिलहाल गायब हैं मेरे पंख।

जहां खत्म होती है सीढ़ियाँ वहीं एक दरवाज़ा बना हुआ था। उसके पीछे छिप कर हमने लिए तवील बोसे। पंजों पर खड़े हुए, कमर को थामे। हमने पी ली बेहिसाब नमी। मगर अब मैं सख्त चट्टान पर बैठा हुआ डरता रहता हूँ जबकि परिंदों ने बना रखे हैं घर झूलती हुई शाख पर। 
इस बार की बरसात में धुल जाएंगे पहाड़, छत होगी बहते हुए दरिया जैसी साफ और बादलों की छतरी तनी होगी आसमान में। तब हम दीवार का सहारा लेकर चूमते जाने की जगह चुरा लेंगे परिंदों के पंख और उड़ जाएंगे। डाल पर झूलती चिड़िया भर जाएगी अचरज से। 

फिलहाल गायब हैं मेरे पंख।
* * *

हर चीज़ 
जो हमारे दिल पर रखी होती है 
उसका भार इस बात पर निर्भर करता है 
कि इसे किसने रखा है।
* * *
रूठ जाओ ओ मेहरबान मगर देखो
देखने दुनिया को लाये थे जो ज़िंदगी हम
गुज़र रही है, उनींदी बिस्तरों पर।

आँखें खोलूँ तो लगता है
रात किसी ने रख दिया है चेहरा पत्थर का
सर उठाऊँ तो कोई कहता है, सो जाओ।

तुमसे उधार ली थी खुशी वे दिन बीत गए
ग़म के इस मौसम कब तक फिरूँ तनहा
खिड़की पर बैठा पंछी गाता है, सो जाओ।

प्याले उदास रखे हैं, कासे खाली खाली
न छलकने की आवाज़ आती है
न टूट कर बिखरती है ज़िंदगी बार बार गिर कर।

रूठ जाओ ओ मेहरबान मगर देखो
किस तरह जी रहा है कोई बिना तुम्हारे
बिना तुम्हारे नीम नींद में दिखती है कैसी ये दुनिया।
* * *

जहां पर मैं गिर पड़ा था
उन दो दीवारों के बीच सूखी हुई ज़मीन थी
और किसी बहुत पुराने वक़्त की गंध
मेरे नथुनों के पास कोई हरकत नहीं होने से
शायद वक़्त के उस लम्हे ने मुझे समझ लिया था मरा हुआ
जबकि ये उसके प्यार में जीने का चरम बिन्दु था।

मैंने चाहा की उलट दूँ शराब के सारे पींपे
जो मैंने पी लिए हैं इस बीती हुई सदी में
कि सूखी ज़मीन पर हो सके कोई फसल
और मिट जाए तनहाई
कि हवा में लहराते हुये पत्ते बहुत अच्छे लगते हैं मुझको।

उसने जादुई हाथ से
मेरे बालों में
अपनी अंगुलियों से प्रेम का ककहरा लिखते हुये कहा
कि तुम इस वक़्त किस जगह से आ रहे हो लौट कर
और फिर उसने मेरे माथे पर
अपने होठों को रखा किसी स्टेथोस्कोप की तरह और उदास हो गयी।

मेरे माथे में कौरवों ने कर ली थी सुलह पांडवों से
राधा की गोद में लेटे हुये थे कृष्ण
राम का वनवास हो गया था स्थगित
और हिरण भूल चुके थे अपनी प्यास।
मैं अपनी ही खोपड़ी में पड़ा हुआ था
किसी अजगर की तरह कुंडली में दबाये हुये उसका नाम।

उसने एक हकीम से कहा
कि आदमी मरने के लिए ही आया है दुनिया में
मगर जाने क्यों मेरा दिल चाहता है
कि ये जी सके कुछ और सदियों तक।

यूं तो ये बसा रहेगा मेरे दिल के आईने में
मगर मैं जब भी थक जाती हूँ तस्वीरें देख कर
तब उठा लेती हूँ याद की सुराही
और पी जाती हूँ इस आदमी को पूरा का पूरा
बस इसीलिए एक बार देखो इसकी खोपड़ी में।

हकीम ने कहा
कि खुदा अपने नेक बंदों को कभी नहीं चाहता इस हाल में
इसलिए उसने दुनिया के शोरगुल से भरे कमरे में
चार लोगों के साथ मिल, औजारों से खोल कर मेरी खोपड़ी को
उसमें रख दी कुछ गुलाबी गोलियां।

सुबह का सूरज उगा
तो दुर्योधन ने फिर से इशारा किया अपनी जंघा की तरफ
और युद्ध की तैयारियां शुरू हो गयी,
कृष्ण मुस्कुराने लगे और राधा छिप गयी
वन लताओं के पीछे ज़िंदगी भर का विरह लिए हुये
राम ने खड़ाऊ को कस लिया
अपने पाँवों के अंगूठे और अंगुलियों के बीच
धूप ने बढ़ा दी हिरणों की प्यास
और वे भटकने लगे तपते रेगिस्तान में।

दिन के दो बजे पाया कि मैं हूँ
भटकता फिरा बचपन के शहर की अजनबी गलियों में
सड़क के किनारे बैठ गया थक कर
सांस जब उखड़ने लगी
तब मैंने फिर से रख दिये अपने होठ उसके होठों पर
और हकीम की दी हुयी गुलाबी गोलियों को कर दिया बेअसर
बिना खोपड़ी को खोले हुये।

कि जो लोग मोहब्बत नहीं करते
वे ही छेनी हथोड़े से संवारते हैं आदमी का नसीब।

मेरा महबूब तो पी जाता है मुझे
प्यासे ऊंट की तरह पूरा का पूरा
और फिर मैं पाता हूँ खुद को
किन्हीं दो दीवारों के बीच सूखी ज़मीन पर पड़े हुये
फूलों की खेती करने का खयाल लिए हुये।

अनादिकाल से
मैं बुदबुदा रहा हूँ एक प्रार्थना अविराम
तुम, तुम, तुम हाँ बस एक सिर्फ तुम।
* * *

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