डायरी

कैसे लिखूँ कि याद क्यों आती है?

जयपुर के पास एक गाँव में छठे माले पर मेरा घर है। कुदरत ने क्लोन नहीं बनाए इसलिए मैं उस घर में रहता हूँ, मेरे से ज़ुदा एक लड़की के साथ। उस घर में एक लड़की रहती है, अपने ज़ुदा एक लड़के के साथ। दो बच्चे हैं, एक दूजे से मिलते जुलते। कभी एक मेरी शक्ल का लड़का भी आता है। कभी कभी आती है एक मेरी दोस्त। उसके बाल बेढब कटे हुये हैं। थोड़े सुनहरे थोड़े सलेटी रंग के। कभी कभी मुझे आती है याद अपने काले घने लंबे बालों की। इसलिए इन दिनों मैं कर रहा हूँ अपने बालों से प्रेम। उस घर में खूब रोशनी है। उस घर में अब भी रखी है अच्छी विस्की और अच्छी वोदका। उस गाँव के रास्ते में आता है बिड़ला मंदिर। सफ़ेद संगमरमर के आँगन वाला, पहाड़ी की गोद में बैठा हुआ। चौड़े रास्ते पर गुज़रते हुये मुसाफ़िरों के सलाम का जवाब दिये बिना चुप खड़ा हुआ, मंदिर। मैं वक़्त के अंधे कुएं में गोता लगा कर ढूंढ लाना चाहता हूँ कुछ चीज़ें। कुछ ऐसी चीज़ें जिनका इन सब से कोई वास्ता नहीं है। 

उसके बालों में हाथ फेरते हुए
लड़की ने कहा
आओ, यहाँ धड़कनों के पास
तुम यहीं रहते हो, सदियों से।

बरसों पुरानी एक गठरी की
गिरहों की सलवट से उठती खुशबू को छूकर
अनजानी राहों की जानिब
कुछ एक ताज़ा फूल खिले थे। 

लड़के ने ज़रा और झुक कर चूम लिए, अपने महबूब के पांव। बारिश गिरती ही गयी वहाँ से जहाँ आसमान बीच से ठीक दो अलग टुकड़ों में बंट जाता है। सफ़ेद संगमरमर के लम्बे चौड़े फर्श पर बिखर गए, प्रार्थनाओं के बचे हुए शब्द। 

होले से रखा था, सर उसने कंधे पर
धीरे से कहा था ,मुहब्बत है तुमसे
ज़रा सी भी न बची थी, कहने को बात कोई बाकी । 

मौसम भूल गया गुज़रना
रंग जो ठहरा है उसी की नज़र का 

कुछ भी लौट न पाएगा अंधेरे मुहाने से वापस। 

मैं ये कैसे लिखूँ कि ये हाल कैसा है
मैं ये कैसे लिखूँ कि याद क्यों आती है?
* *

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