डायरी

प्रेम, हथेली के बीच का फफोला

नरम गुदगुदे बिस्तरों में किसी गरमाहट को बुनते जाने का मौसम रेगिस्तान से विदा हो चुका था। आधी रात को नींद ने सुख के बिस्तर पर आने से मना कर दिया। कभी मैंने रेलगाड़ी के निम्नतम दर्ज़े के डिब्बे में दरवाज़े पर नींद को पाया। रेल के सफ़र में नींद के झौंके आते रहे और मैं अखबार बिछाए हुये न बैठ सकने जितनी जगह पर सो गया था। ज़िंदगी ऐसी ही है। ऐसा ही बर्ताव करती है। मैं उठ कर बैठ गया। आभा ने पूछा क्या हुआ? मैंने कहा कोई बात नहीं है। मैं घर के नीचे वाले तल पर जाकर दवा खाकर आता हूँ। मैं ज़रा सी देर लगा कर आया। रात के इस गरम मौसम में उसे भी नींद कहाँ आनी थी। पहले माले तक आने में शायद वक़्त ज्यादा लगाया इसलिए उसने पूछा बड़ी देर लगाई। मैंने कहा कि अलमारी के सामने खड़ा हुआ, सोचने लगा था। कि मैं खुद को धोखे क्यों देता हूँ। जो मुझे साफ दिखता है, उसके अपनी मर्ज़ी के माने क्यों निकालता हूँ। मैं खुद के लिए बड़ा लापरवाह आदमी हूँ इसलिए परेशान हूँ। उसने कहा- न सोचिए। सो जाईए। 
मेरी नींद के बीच एक लहर थी। वह बार बार मुझे रोक रही थी। मैं इस जगत में कुछ ऐसा था जैसे समंदर में उछलती हुई छोटी खाली प्लास्टिक बोतल हो। जिसका अपना कोई वुजूद नहीं होता। लहर आती और अपने हिसाब उठा गिरा देती है। मैं भरी हुई बोतल होता तो ज़रा सा प्रतिरोध भी करता मगर मेरे भीतर का द्रव्य सूख चुका है। मैं खाली होकर भी खाली नहीं हूँ। बस बेढब के विचारों से भरा हुआ हूँ। मैंने कहा सुनो। मैं ज़रा देर लेपटोप पर काम कर लूँ। उसने कहा कि ऐसा करने से नींद न आएगी। मैंने कहा कि इस बेचैनी को बाहर का रास्ता दिखाने का एक ही तरीका है। शब्द। 
अपने दिल का हाल लिखने लगता हूँ। चार पंक्तियों के बाद लगता है कि ज़िंदगी के पानी में उठ रही बेचैनी की लहरों पर सूखे हुये बेबस पत्ते जैसा एक लम्हा स्थिर होने को है। मैंने लिखा कि ज़िंदगी के जींस में बदलाव नहीं किया जा सकता है। जिसकी फितरत दुख उठाना है वह हर हाल में उसे खोज लाएगा। इसलिए मैं उसका नाम दिल में छुपा लूँ पूरा का पूरा ताकि बाहर की खोज का काम खत्म हो जाए। उसके आचरण से मुझे होने वाली तकलीफ के बीच एक पलकों का पर्दा आ सके। कविता को पूरा करते ही पाता हूँ कि एक दोस्त का मेसेज रखा हुआ है। मैं ऐसे ही उसे कहता हूँ कि जाग रही हो तो कविता पढ़ लो। वह बिना देखे कहती है। आपकी कविता में मेरे लिए कुछ नहीं होता। मैं कहता हूँ कि अच्छा है न, ऐसी कविताओं में क्योकर हो तुम्हारा नाम। 
केसी कभी बताओगे वह कौन है?
मैं कहता हूँ- नहीं। 
* * *
रात एक बजे कहीं से भूला भटका हुआ नींद का झौंका, एक सपना साथ लेकर आया। मैं किसी कॉफी शॉप में कुछ ऑर्डर कर रहा हूँ। सुबह का वक़्त है। मैं कुछ वकीलों के बीच घिरा हुआ हूँ। सब तरफ मेरी पहचान के चहरे हैं। वे पश्चिम के भोजन का ऑर्डर दे रहे हैं। वे कहीं बैठ पाने की जगह को दबा लेने को आतुर हैं। उनके मन में दया नहीं है। उनमें भावना जैसा कोई जींस नहीं दिखता है। मैं अचानक से उसी कॉफी शॉप में एक सलून पाता हूँ। कहता हूँ मुझे हेयर कट चाहिए। वह मोटा सा आदमी मेरे बालों पर एक फव्वारे से पानी छिड़कने लगता है। मैं देखता हूँ कि बाल पूरे भीग गए हैं। भीगे हुये बाल अच्छे दिख रहे हैं। उससे पूछ लेना चाहता हूँ कि क्या कोई ऐसी क्रीम है जिससे मेरे बाल हरदम ऐसे ही भीगे हुये दिखते रहें। वह इसका कोई जवाब नहीं देता। मैं अपने बालों को बड़ी हसरत से देखता हूँ। मैं इनको कटवाना नहीं चाहता हूँ। सपना फिर किसी और रेस्तरां तक ले जाता है। फिर वे ही लोग। अचानक से सपना मुझे एक पुराने घर में ले आता है। वह घर मेरे सपनों की यात्रा का एक ज़रूरी और अस्थायी पड़ाव है। उस घर से बाहर देखते हुये पाता हूँ कि मेरे पास एक कड़ी दोपहर है। मैं चाहता हूँ किसी सड़क के किनारे किसी पेड़ की छांव में तनहा बैठ सकूँ। 
* * *
सुबह का अखबार एक स्मृति संदेश लेकर आता है। पापा की पाँचवीं पुण्य तिथि। वही नेक आदमी जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपने दिल का हाल इस तरह किसी पोस्ट में लिख कर सुकून पा सकूँ। वही आदमी जिसकी तस्वीर के सामने खड़े होकर पंद्रह दिन पहले मैंने कहा था- पापा मैं अच्छा आदमी हूँ। मैं किसी का दिल नहीं दुखाता हूँ। मुझे इस एनजायटी से बाहर निकालो। कहता हूँ कि मैंने आपसे जीवन भर जाने क्या क्या मांगा होगा। आज एक बार आपसे ये और मांगता हूँ। उस वक़्त, मैं बेहिसाब दर्द और बेहिसाब खुशी से भरा हुआ उनकी तस्वीर देख रहा था। मुझे इस तरह के हाल में देख सकने के लिए घर में कोई नहीं था। मुझे लगा कि पापा को कह दिया, अब सब आसान हो जाएगा। उन पर यकीन है। वे मेरी बात सुनते हैं। 
ये उन दिनों के ठीक बीच वाले दिन की बात है, जब मैं दर्द के झूले पर सवार था। झूले की हर पींग के साथ आँसू निकल आते थे।
* * *
सुबह के इन ख़यालों को किसी के रुदन ने तोड़ा। 
सामने वाले घर का इकतालीस साल का आदमी चल बसा है। उसका नाम रामेश्वर लुहार था। मेरी स्मृतियों में वह मुझे दस साल का याद आता है। उसके पिता घर में बनी एक भट्टी में लोहा कूटते थे। वह एक दिन मेरे पास आया। उसके हाथ में एक लोहे की छड़ थी। उसने कहा कि तुम इसको खींच सकते हो। मैंने कहा- हाँ। मैंने उसकी छड़ खींच ली। वह उदास हो गया। उसने कहा- मैं अभी आता हूँ। वह अपने घर के अंदर जाकर आया। उसने फिर से मुझे कहा- एक बार और खींचोगे। मैंने कहा- हाँ। उसने लोहे की छड़ मेरे सामने की। मैंने उसे खींचने के लिए पकड़ा तो दोनों हथेलियाँ जल गयी। इस बार वह घर के अंदर बुझी हुई भट्टी के बचे हुये अंगारों में छड़ को गरम करके लाया था। मेरे हाथों में फफोले निकल आए। वह भागता हुआ गली में दूर गायब हो गया। उसकी माँ ने मेरे हाथ देखे तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। 
कई दिनों तक अपनी हथेली के छालों को लिए हुये मैं एक बारह साल का लड़का स्कूल और घर के बीच सब कुछ भूल जाना चाहता था। वक़्त ने हथेली में बनी हुई भाग्य की रेखाओं पर उग आए फफोलों को मिटा दिया। वे पुराने पत्तों की तरह झड़ कर गायब हो गए। मेरे आँसू सूख गए। मैं अपना दर्द भूल गया। मगर ज़िंदगी मुझे बहला कर फिर कहती है, उम्मीद की छड़ी थामोगे? मैं कहता हूँ- हाँ। वह फिर से मेरे नसीब की हथेलियों पर कुछ फफोले रख देती है। रामेश्वर, मुझे कहता था। आप रेडियो में कितना अच्छा बोलते हो। आज की शाम को एक गाना ज़रूर बजाना। बींटी म्हारे सोने री हवती, बींटी म्हारे रूपे री हवती। राजस्थान का एक लोकगीत है। खोयी हुई मुन्दरी की याद का गीत। यह गीत उस खोयी चीज़ की तारीफ करता है। कहता है कि वह सोने की थी, वह अनमोल थी, वह मेरी इस अंगुली में रहती थी, उसके होने से मेरी अंगुली का रंग गोरा था। एक दिन ऐसे ही ज़िंदगी की अंगुली में पहनी हुई सांस जैसी मुन्दरी खो जाती है और पीछे रह जाती विष की खली। 
खिड़की के नीचे कुछ लोग सर पर शोक को बांधे हुये हुये बैठे हैं। मैं भी रामेश्वर को एक कंधा देने जा रहा हूँ। वह चला गया है मगर मेरे हाथ में न दिखने वाले बचपन के प्रेम के अमिट फफोले हैं। प्रेम ऐसा ही होता है, हथेली के बीच के फफोले जैसा।

जैसी तुम्हारी याद है। 

* * *
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