बातें बेवजह

कविता, दिल की नुमाइश है

कोई याद है, नृत्य में मग्न। रिद्म में चुन लेती है कोई भी शब्द और सम्मोहन के आँगन पर उतर आती है।मैं देखता हूँ पारदर्शी वर्तुल के भीतर से दुनिया को, खोजता हूँ अपना महबूब। जो खो गया है मेरे ही भीतर की पेचीदा गलियों में। एक तमाचा वक़्त नाम का। एक उपेक्षा भरी नज़र है जैसे कोई बेहद नुकीला भाला। एक मेरा प्रेम है, ढाल बन कर इस सबके बीच, इस सबसे लड़ता हुआ। ये मैं हूँ या शायद ये तुम हो।

और उसने तय किया चुप बैठूँ
इसलिए कि
ज़िंदगी को बरदाश्त नहीं होती चुप्पी
अगर वो ज़िंदगी है तो।

महबूब भी करेगा बरदाश्त कब तक
अगर वो महबूब है तो
* * *

ज्यादा उम्मीदें न रखो
ज़िंदगी की खस्ता हाल झोली से

एक महबूब की तस्वीर का बोझ तो उठाया नहीं जाता
अक्सर रो पड़ते हो उसे देख कर।
* * *

खोज लाओ साहस का वो टुकड़ा
जिसने पहली बार देखा था,
कंधों को चूम रहे बालों वाली लड़की को।

वरना प्रेम में सिर्फ डरते हुये ही जीते हैं लोग।
* * *

उस महबूब की उदासी के बारे में न लिखना कुछ
जिसने भर ली थी हामी कि अब और न करूंगा मुहब्बत

लिखना मुहब्बत से बेदिली की वजह क्या थी।
* * *

मेरी कोहनी पर गिर रही है धूप
मेरे पाँवों के पंजों पर है छांव
कि उन पर अपने पंजे रख कर खड़ा हुआ है महबूब।
* * *

मैंने दोपहर तय किया कि धूप में तप कर मर जाऊँ
शाम को चाहा कि अचानक घिर आए अंधेरा और गिर पड़ूँ
रात हो चुकी है और सोचता हूँ कि
किसी बंदूक कि गोली रास्ता भूल कर आ लगे मुझे।

मगर आज का दिन ही खराब है।
* * *

तुम उसकी हंसी के बारे में कुछ नहीं जानते
तुम नहीं जानते कि वह बोलते समय कैसी दिखती है
तुम नहीं जानते कि उससे प्रेम करने का अंजाम क्या है

मैं जो जानता हूँ वह कोई और न जाने तो अच्छा है।
* * *

प्रेम का नहीं किया जा सकता आयात
प्रेम का निर्यात भी संभव नहीं है

दिलों की बरबादी के लिए रहना होता है भाग्य के भरोसे।
* * *

कोमल सिद्धान्त रखना चाहिए ज़िंदगी के बारे में
कि किसी रिश्ते को बनाने के लिए
क्या क्या चीज़ें लगाई जा सकती है दांव पर।

किसी को चूमना और उसके साथ रहना
वक़्त और ज़रूरत की बात है, दिल से लगाने की नहीं।
* * *

आप बुन रहे होते हैं प्रेम से दिन का कोई हिस्सा
किसी नयी बुनावट की तलाश में झाँकते रहते हैं उसकी आँखों में
और उसे लगता है कि मुश्किलें कहीं आस पास ही हैं

कि खुशी असल में अपनी पीठ के पीछे छिपा कर लाती है डर को।
* * *

और एक दिन गहरा उदात्त नशीला चेहरा मार गिरता है मुझे
मैं भूल जाता हूँ कि फीनिक्स की तरह हर बार उठा हूँ ऐसी ही राख़ से

रोने के लिए आदमी अपने पास रखता है, हज़ार बहाने।
* * *

असल आनंद है प्रेम का अनुपस्थित होना
असल क़ैद है रिश्तों को बचाने के जाल में उलझ जाना

और कोई दुख नहीं है सिवा इसके
कि असल चीजों को उद्घाटित करने से डरता है दिल।
* * *

प्रेम, कुल्हाड़ी की तरह है
पत्थर से टकरा कर होता है आग बबूला

दिल की क्यारी में खिली
टहनियों को काटते हुये रहता है गीला गीला।
* * *

उसने मुझे लिटा दिया सम्मोहन के आसान पर
दिल की गहरी जड़ों पर डाली पैनी निगाह
औजारों से टटोल कर देखा दायें बाएँ
चिंता की लकीरों को माथे पर करीने से रखते हुये कहा।

बदनसीब आदमी, तुम कोई दाँत का दर्द ही मांग लाते ख़ुदा से।
* * *

लगभग हर बात शुरू और खत्म होती है
सिवा इसके कि मैंने तुम्हें देखा था, मुसकुराते हुये।
* * *

जिस तरह तुमने वक़्त निकाल कर किए थे फोन मुझको
उसी तरह अब वक़्त निकाल रहा है बदला मुझसे।
* * *

महबूब, बिना कान वाला खरगोश होता है
उसे संभाला नहीं जा सकता आसानी से।
* * *

और सोचो उसके बारे में
जिसके बारे में, मैं इतनी बेवजह की बातें करता हूँ

और सोचो कहाँ से आती है
इतनी हिम्मत, खुद का दिल दुखाने की।
* * *

Advertisements

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s