बातें बेवजह

तुमको ही बना लेता हूँ शराब

कल की रात से पहले की रात मुझे ये बताने आई थी कि तनहाई के उतरने से पहले मन के आँगन में उतरती है स्मृतियों की अनगिनत पंखुड़ियाँ…

[1]
वो जो ज़रा मुड़ा हुआ सा डंठल है
हिस्सा है, मेरे ताज का।

हाँ मैं बेंगन हूँ उसके प्यार में डोलता, हर दिशा में।
* * *

[2]
नायक को सुनाई दिये कई सारे शब्द समूह
उसने क्रिया, प्रतिक्रिया और परिणाम तक बनाए रखी
अपनी मुख मुद्राएं यथोचित।

मैं पड़ गया तुम्हारे प्यार में और भूल गया सब कुछ।
* * *

[3]
हमने खुद को तैयार किया
सबसे बुरे हालत के लिए
और प्यार को रख लिया किसी ढाल की तरह।

जब तक गिरती रही बारिश की बूंदें ढाल पर
मुसलसल आती रही प्रेम गीत की आवाज़।
* * *

[4]
अगर सिर्फ अच्छे ही होते लोग
दुआओं के सहारे ही चल रहा होता निज़ाम

तो हमको तनहाई के सलीब पर कोई लटकाता किसलिए।
* * *

[5]

क्या फर्क पड़ता है इस बात से
कि उस देश का नाम क्या है?

हम जहां कहीं होते, कर ही रहे होते प्रेम।
* * *

[6]
खूब सारे प्रेम के लिए
चाहिए एक अदृश्य तार जिस पर लटका रहे यकीन।

नफरत का बुत तो
ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता, सच की ज़मीन पर भी।
* * *

[7]
कोई बात नहीं , अंधेरा बना रहने दो
प्रेम को चाहिए, ज़रा सी नमी होठों की।
* * *

[8]
कुछ चीज़ें पेट्रोल की तरह होती है दुनिया में
जैसे जलती हुई नफरत धकेलती रहती है प्रेम को और आगे।
* * *

[9]
और जब भी मैं यकीन करता हूँ उस पर
वो हो जाता है बेवफा।

जबकि भौतिकी में
ऐसा पढ़ाया नहीं गया मुझे किसी भी क्लास में।
* * *

[10]
यह कोई अलौकिक चमत्कार ही था
कि बिना जाने ही उस पर हो गया था यकीन।
* * *

[11]
हताशा एक तरह से
पर्यायवाची है, न चूम पाने का
अपने ख्वाब को।
* * *

[12]
वो जो सुनाता रहता है
किस्से बीते ज़माने के अनदेखे महबूबों के
अक्सर पड़ा होता है, उदासी के प्याले में।

मैं तुमको ही बना लेता हूँ शराब।
* * *

[13]
और दुनिया के लगभग सभी ज़रूरी काम
हो चुके हैं पूरे
बस एक बार मेरा तुमको चूम लेना रह गया है बाकी।
* * *

[14]
मुझे इस कल्पना पर भी है यकीन
कि हुआ करते थे आदम और हव्वा।

तुमसे मिलकर लगता है कितना नया नया।
* * *

[15]
मेरा दिल एक उम्मीद है
नक्षत्रों के पार, किसी आकाशगंगा के बीच।

तुम्हारे होने के पवित्र विचार सा।
* * *

[16]
शायद हर कोई पढ़ना चाहता है
अच्छे दिन के माथे पर लिखी हुई तदबीर

मैंने सोचा है किसी एक बुझती हुई शाम के बारे में
तुम्हारे चहरे से उतरती हुई आएगी एक लकीर नूर की।
* * *

[17]
यह तय नहीं है कि महबूब चूम लेगा झुक कर
हाँ मगर तय है कि ऐसा न किया तो वह रो रहा होगा कहीं।
* * *

[18]
मैं ईश्वर से लड़ना चाहता हूँ इस वक़्त
कि उसने क्यों नहीं रखा तुम्हारे दिल में मेरा नाम इकलौता।
* * *

[19]
इस साल की सोलह फरवरी की
खुशबू के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम था
कलेंडर में लिखी थी कुछ बासी और गैर ज़रूरी बातें।

बस ज़रा कल के लिए कोई उम्मीद छोड़ कर जाना तुम।
* * *

[20]
कविता
आकाश से गिरा, कोई उल्कापिंड नहीं
ये तेरे मेरे बीच की एक ज़रूरी बात है।

तुम हो, तो कविता भी है।
* * *

[पेंटिंग की तस्वीर : विंसलों होमर] 
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