बातें बेवजह

अकेलेपन का राजमिस्त्री

फुरसत आती रहे लौट कर कि हम देख सकें, फूलों को चलते हुये। सुनते रहें पत्थरों के दिल का गाना। लेटे रहें आसमान से आँखें लड़ाये हुये। बातें बेवजह…

उसके नाम के पीछे छिपा लेता हूँ
मैं अपना अकेलापन
कि इस दुनिया में कोई समझ नहीं सकता
भरे पूरे घर में भी हो सकता है कोई अकेला।

उस वक़्त तक के लिए
जब लिखा है, तुम्हारा आना ज़िन्दगी में।
***

रात के अंधेरे में अकेलेपन का राजमिस्त्री
धैर्य से चुनता जाता है फूटी हुई तकदीर की ईंटों से दीवार
मगर छन कर आती रहती है किसी बिछोड़े की आवाज़।

जिंदगी कांपती रहती है, किसी प्याले में भरी शराब सी।
***

लिख लूँ, अपने रोज़नामचे में
रेगिस्तान में आज दिन का हाल
कि ये दिन फिर न आएगा लौट कर।

रुई के फाहों से उड़ते रहे बादल
तुम्हारी शिकायतों जैसे
हवा सताती ही रही, तुम्हारी तरह आँखें फेर कर।

कि मैं लिख ही देता इसे एक बरबाद दिन
अचानक किसी के आने की आहट ने
मेरे गालों को खुशी से भर कर, लुढ़का दिया है कंधों तक।

मैं खड़ा हुआ हूँ छत पर
तुम्हारी आमद के इंतज़ार में, ज़िंदगी को सजदा किए हुये।
* * *

कभी कभी मौसम आता है इत्रफ़रोश की तरह
तुम्हारी खुशबू गलियों में बिखेरता, कोई भीगा नगमा गाता हुआ
लगे कि फिर से तुमने खींच कर रख लिया है, मेरा हाथ अपनी कमर पर
सड़क के किनारे की रेत ने शरमा कर खा लिए हैं कई भंवर
बीती सांझ जैसा ही उगा है, पूरा गोल सूरज सिंदूरी सिंदूरी।

कहाँ हो तुम, ये ठंडी हवा कैसी है, मौसम के इस सितम पर शिकायतें किससे करूँ?
***

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