डायरी

जी ढूँढता है घर कोई दोनों जहां से दूर

मैंने फेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल पिक्चर बदल ली है मगर ये शोक और विरोध का प्रतीक काला डॉट नहीं है। इस शर्मसार कर देने वाले अमानुषिक कार्य की भर्त्सना करता हूँ लेकिन मैं काला डॉट नहीं लगाना चाहता हूँ। ऐसा न करने के पीछे कुछ कारण हैं। सबसे पहला कारण है कि मैं बाहरी लक्षणों की जगह मूल व्याधि के उपचार का पक्षधर हूँ। मैं चाहता हूँ कि ज्वर पीड़ित समाज के तापमान को कम किया जाना चाहिए लेकिन उससे भी आवश्यक कार्य है कि ज्वर के कारणों की पहचान कर उनका उचित उपचार किया जाए। समाज की संरचना और उसके चरित्र को बुनने वाले कारकों पर गहन दृष्टिपात किया जाए। चिंताजनक स्थिति में ठहरा हुआ हमारा ये समाज शारीरिक और मानसिक रूप से रुग्ण हो चुका है। इस स्थिति से घबराकर, भयभीत होकर और अनिष्ट की आशंकों से घिर कर हम चिल्ला रहे हैं। इस सामाजिक स्थिति के जो कारण हम गिना रहे हैं, वे इसके वास्तविक कारण नहीं है। इस स्थिति के संभावित उपचार भी वे नहीं है जिनकी हम मांग कर रहे हैं। 
आपकी स्मृति में अब तक यह ठीक से होगा कि जब तक सरकारी विध्यालय नहीं थे, हम पोशालों में पढ़ा करते थे। ये पोशालें क़स्बों, गांवों और गलियों में किसी एक अध्यापक द्वारा संचालित हुआ करती थी, संस्कार,चरित्र और विध्या के सम्मान से भरी हुई। उन दिनों ये भी कहा जाता था कि किस पोशाल का पढ़ा हुआ है यानी इसकी शिक्षा और चरित्र का स्तर क्या है। शिक्षा एक कारगर उपस्करण है। ऐसा माना जाता है कि शिक्षा के अभाव में मनुष्य निरा पशु समान है। वह अज्ञानी, समाज के लिए केवल अनुपयोगी ही नहीं वरन एक खतरा भी है। इसका एक अभिप्राय यह भी है कि शिक्षित करके मनुष्य को संवारा जा सकता है। उसका अपने लिए उपयोग भी किया जा सकता है। जैसे किसी पाने से गाड़ी का पहिया कस कर यात्रा को सरल किया जा सकता है वैसे ही उसी पाने से खोल कर पहिया चुराया भी जा सकता है। अर्थात उपस्करणों का उपयोग दिशा बदल सकता है। संभव है कि इसीलिए अंग्रेजों में भारत में मिशनरीज़ स्कूलों की स्थापना करके उनका एक तंत्र विकसित किया। इस बात को हम सरलता से समझ सकते हैं कि ऐसा करने के पीछे कोई उद्धेश्य अवश्य रहा होगा। अकारण तो हम कोई काज नहीं करते हैं। हिन्दू, मुस्लिम और बौद्ध विश्वविध्यालयों की अवधारणा के पीछे अगर कोई पवित्र दृष्टिकोण रहा भी हो तो भी यह एक धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक समरसता वाले राष्ट्र की नीव में सीलन ही है। मैं अपनी बात को इस मार्ग पर नहीं ले जाना चाहता हूँ। मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि आखिर आज क्यों गली गली में निजी शिक्षण संस्थानों का बोल बाला है। अंग्रेज़, मिशनरिज के माध्यम से अपने लिए कुछ चाहते थे तो आज के दौर में हम इन संस्थानों से क्या चाहते हैं? इस तथ्य को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। 
सरकारी शिक्षण संस्थाओं को बलहीन करने का काम अस्सी के दशक से शुरू हुआ। नब्बे के दशक में यह अपने चरम पर पहुँच गया। उच्च शिक्षा के लिए विध्यालय में की गई पढ़ाई और उससे प्राप्त अंकों को कचरा पात्र में डाल दिया गया। जिस शिक्षक को वर्षपर्यंत किसी बालक बालिका को संवारते जाना और इसके पश्चात अपने परिणाम को देखना, एक सुखद और आत्मा को प्रसन्न कर देने वाला कार्य हुआ करता था। हमने किसी षड्यंत्र के तहत उस शिक्षक से ये सुख छीन लिया है। उसके हाथ में एक क्ंठित बलहीन चाक थमा दी। हमने शिक्षक के पढ़ाये हुये को किसी भी रूप में उच्च शिक्षा अथवा रोज़गार के अवसर प्रदान करने वाला मानने से मनाही कर दी। हमने एक नई प्रतियोगिता का आविष्कार किया है, जिसने हमें बताया कि स्कूल में प्राप्त अंकों का आपके भविष्य के किसी आयाम से कोई संबंध नहीं है। अर्थात स्कूल में पढ़ना समय और धन का अपव्यय है। एक अच्छा इंजीनियर और चिकित्सक बनने के लिए या किसी भी सामाजिक विधा में कुशल होने की डिग्री लेने के लिए विध्यालयों की कोई भूमिका नहीं है। शिक्षा के इन संस्थानों को भेड़चाल सीखने की पोशालें बना दिया गया है। इसके बाद शिक्षकों से इतनी ही आशा रखी जाने लगी है कि ये प्रतियोगिता में बैठ पाने का प्रमाणपत्र जारी कर सकें। जिससे आत्म गौरव छीन लिया गया हो, आप उस शिक्षक की मनोदशा को समझ सकते हैं? क्या आपको अनुमान है कि उस शिक्षक-शिक्षिका का क्या हाल होगा जिसे परिणामहीन शिक्षा देने का दायित्व देकर आशा की जाती है कि वह अपना श्रेष्ठ आपके द्वारा संचालित इस समाज को सौपता जाए।
राज्य अपने दायित्व से मुक्त होने के लिए निजीकरण का सहारा लेता है। क्या शिक्षा इतना बड़ा बोझ है कि राज्य इस दायित्व को वहन करने में असमर्थ है। सुदूर गांवों से लेकर शहरों के विध्यालयों में कार्यरत  प्रशिक्षित, कुशल और श्रेष्ठ शिक्षकों से विध्यार्थी छीन लिए गए हैं। गेहूं को निजी संस्थानों में जाने को प्रेरित कर दिया गया और घुन को सरकारी विध्यालयों के हवाले। अच्छे प्रतिभावन बालक बालिकाओं के सामने एक डर रख दिया गया कि जो सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ेगा वही सबसे अच्छा पद पाएगा। इसके लिए विध्यालयों में वर्गभेद का आधार तैयार कर लिया गया है। माता पिताओं ने भी इसी डर को स्वीकार कर लिया और अपने सामर्थ्य से आगे बढ़ कर इसी दौड़ का हिस्सा होना अच्छा जाना। अब शिक्षा इस तरह दो फाड़ हो गयी कि एक तरफ लूट और माल बनाने का व्यवसाय करने वाली दुनिया के लिए आवश्यक प्रतिभाएं गढ़ी जाने लगी हैं और दूसरी तरफ भुखमरी और रोज़गार से वंचित निम्न स्तर का मजदूर वर्ग। यह अनायास नहीं हुआ है। सत्ता में बैठे हुये लोग अदूरदर्शी और विवेकहीन नहीं हो सकते हैं फिर क्या बात है? क्या ऐसे कारण है कि ज्ञान और चरित्र देने वाली संस्थाओं को निजी हाथों में सौप दिया गया है। क्या कारण है कि पढे लिखे और श्रेष्ठता से आधार पर विध्यालयों में चयनित शिक्षकों को खाली कमरे और सूने खेल मैदान दिये गए हैं। आखिर ये कैसी बिसात है? 
मैं शोकाकुल हूँ और काला डॉट लगाना चाहता हूँ मगर मैं ऐसा शिक्षा के निजीकरण के विरोध में करना चाहता हूँ। जो हमारे समाज के भविष्य को एक गहरी खाई में धकेलता जा रहा है। मैं उस शिक्षा के अभाव के लिए लगाना चाहता हूँ जिसने ऐसे कुंठित, बलात्कारी और हत्यारे मस्तिष्क तैयार किये हैं। जब तक आर्थिक और सामाजिक असमानता की पोषक इस शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाकर समरूपता को नहीं बुना जाएगा तब तक चरित्र निर्माण, कानून का सम्मान और राष्ट्रीयता की भावना के बीज अंकुरित नहीं होंगे। समाज के इस हाल और दुख व अफसोस से भरे हुये नौजवानों के प्रदर्शन को देखते सुनते हुये फ़ानी बदायुनी साहब का एक शेर ज़ुबान पर आकार ठहर गया है। “जी ढूँढता है घर कोई दोनों जहां से दूर, इस आपकी ज़मीं से अलग, आसमां से दूर” 
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[Image courtesy : Thehindu]
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