असकर खाँ, लंगा, लोकगीत

क्रश का फिर से मुझ पर टूट पड़ना

हाय !! ये क्या हाल हुआ? मैं फिर से उसकी सूरत के सम्मोहन में खो गया। इसी साल मार्च में उस पर पहली बार ध्यान गया था। उसके गले में एक चोकोर ताबीज़ बंधा था। चाँदी का चमकता हुआ वह ताबीज़ हल्के सलेटी कुर्ते के रंग को बेहतरीन कंट्रास दे रहा था। उसकी भोंहें धनुष जैसी, दाँत सफ़ेद और रंग गोरा। उसे देखते हुये कल अचानक से याद आया कि हाँ ये वही है। साल भर पहले भी मैं इसी सूरत में खोया हुआ था कि वही लंबा, दुबला और आकर्षक बदन।
मैंने कई कहानियाँ सोची कि कच्छ के पास पसरी हुई नमक से भरी चमकीली धरती पर इसका साया कैसा दिखाई देता होगा। इसके कंधे पर रखा हुआ लाल और काले चेक का बड़ा सा स्कार्फ अगर किसी के गालों को छू जाए तो कैसा लगेगा। काश कि मैं इसके पास बैठूँ और कहूँ कि तुम सबसे सुंदर हो। मुझे प्रिय हो और वह डर कर भाग जाए और मैं प्रणय निवेदन गाते हुये पीछा कर सकूँ। मैं खो ही जाऊँ इसे खोजते हुये।
पिछले साल के इस क्रश का फिर से मुझ पर टूट पड़ना सच एक बड़ा सितम ही है। मैंने रिकॉर्ड करते समय सोचा कि मैं इसका नाम न पूछूंगा कि मेरा क्रश जाता रहेगा। इस तरह जान पहचान बढ्ने से आकर्षण की मृत्यु हो जाएगी। नजदीकी से चाहना का सुख चला जाएगा। लेकिन आखिर उन सबको शीशे के पार इस तरफ मेरे पास आना ही था। मैंने अगले कुछ और महीने तक खुद को इसी हाल में फंसाए हुये नहीं रखना चाहा। पूछ लिया- “आपका नाम क्या है?” उसने कहा- “हबीब ख़ान…” आप बहुत सुंदर गाते हैं। मैं उसे देख रहा था। उसके सिर के बाल बीच से सँवारे हुये थे और वे किसी सुंदर काले पक्षी के पंखों की तरह पीछे जा रहे थे।

उसकी आवाज़ सुनोगे? पहली आवाज़ असकर ख़ान साहब की है ऊंची आवाज़ उनकी पार्टी के दूसरे मेम्बर की है जबकि बीच वाली मीठी आवाज़ हबीब की है।

पागड़ियों रा पेच रे भंवर म्हाने ढीला ढीला लागे रे
किण जी रे आगे शीशड़लो निवायो, ओ हठीला रैण कठे गुमाई रे

आंखड़ियों रो सुरमों भंवर सा फीको फीको लागे रे
किण जी रे आगल नैनड़ला झुकाया रे, ओ हठीला रैण कठे गुमाई रे

मैं तो म्हारी गोरा दे रे, सासु रा जंवाई रे
सासू आगल नैनड़ला झुकाया रे बादीला रैण कठे गंवाई रे

दांतों री बतरिसी भंवर सा फीकी फीकी लागे रे
किण जी रे आगल, हंसने बतायो रे, बादीला रैण कठे गंवाई रे

आपकी पगड़ी के पेच ढीले लग रहे हैं, ओ प्रिय किसके आगे सिर नवा कर आए हो, रात कहाँ खोकर आए हो। आँखों का सुरमा भी फीका फीका लग रहा है, ये आँखें किस के आगे झुका कर आए हो। मैं तो मेरी गोरी का और मेरी सासू का जंवाई हूँ, सासू के आगे ही शीश नवाया है फिर ये आपके दांतों की बत्तीसी का भी रंग फीका फीका क्यों है कह दो किस को अपनी हंसी दिखा कर आए हो ये रात कहाँ बिता कर आए हो।

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