भुट्टा खाँ, लोकगीत

आबूझ राजा राज करे…

ख़ुशगवार मौसम। धूप ज़रा सख्त लेकिन छांव सर्द अहसास लिए हुये।

भुट्टा खाँ के कानों में सोने के गोखरू चमकते हैं। मुझे देख कर मुसकुराते हुये अपने कानों को छूते हैं फिर अपने गले पर ऐसे हाथ फेरते हैं जैसे ख़ुद के गले को प्यार कर रहे हों। इशारा ये था कि आज आवाज़ ने धोखा दे रखा है। मैं इशारे से कहता हूँ कि आप फ़नकार हैं आवाज़ को पकड़ लाएँगे, जहां भी होगी। वे फिर मुसकुराते हैं। कल सुबह मैं एक अनचाहा ख्वाब देख कर जागा था। आज के इस वक़्त भी मैं कुछ भूल जाने जैसी कोशिश में था। लेकिन जो अनिश्चय था वह मुझे बरगला रहा था। मुझे नहीं मालूम कि मैं क्या चाहता था और क्या नहीं?

दोपहर के तीन बजे थे। दफ़्तर का काम अपनी लय में डूबा था और मैं अपने ख़यालों की दुनिया में खोया हुआ था। एक डे-ड्रीमर के पास दो दुनिया होती है। उसका निष्क्रमण जारी रहता है। मुझे कुछ चाहिए था। एक सर्द से स्टूडियो में शीशे के उस पार से कोई गरम गुनगुना स्वर आया। मुझे पहला अंतरा सुनते ही लगा कि दवा मिल गयी है। ये इस बेवजह की उदासी को छांट देगी। रेकॉर्ड होते ही मैंने टॉक बैक पर अपनी तर्जनी अंगुली रखी- “आप बहुत खूब गाते हैं। आपने मुझमें गहन सुख भर दिया है” इतना ही कह सका और एक दूसरे को देखते हुये हम देर तक मुसकुराते रहे। लोक गायिकी में शुद्धता के लिए जगह नहीं है, यहाँ सिर्फ आनंद प्रिय है। निर्मल आनंद।

ये निर्गुण भजन का निकटतम सुख है। इसे इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ कि शैतान को मालूम है कि इस दुनिया में हर कोई मिस फिट है। जिसे जहां होना चाहिए वह वहाँ नहीं होता है।

बंसी बजावत धेन चरावत रास रचावत न्यारों
राधा जी रो सांवरों सब सखियन रो प्यारो॥

आछी रे पांख बुगले ने दीनी, कोयल कर दीनी काली
करमन की गत न्यारी ऊदा भाई, करमन की गत न्यारी॥

छोटा रे नैण गजअस्ति ने दीना, ओ भूप करे असवारी
मोटा रे नैण मृग नो रे दीना भटकत फिरे दुखियारी॥

नागर बेल निर्फल भई, ओ तुम्बा पसारे पोह भारी
चुतुर नार पुतुर ने झुरके, ओ फूहड़ चिण चिण हारी॥

आबूझ राजा ओ राज करे, रैय्यत फिरे दुखियारी
के आशा भारती सुण रे वशिन्धर दूर कर ए गिरधारी॥

बंशी बजाता है, गायें चराता है और सबसे न्यारा रास रचाता है, ये राधा जी का सांवरा सब सखियों का प्यारा है। सफ़ेद पंख बगुले को दिये और कोयल कर दिया काला, ओ ऊधो करम का हिसाब बहुत अलग है। जिस गजराज की सवारी बड़े महाराज करते हैं उसे छोटी आँखें दी है जबकि बड़ी आँखों वाला हिरण दुखी होकर भटकता फिरता है। सुंदर शोभन बेल पर कोई फल ही नहीं लगता और कड़वे फल तूम्बे वाली बेल फैलती पसरती ही जाती है। बुद्धिमान स्त्री पुत्र की हसरत में जीती रहती है जबकि फूहड़ स्त्री जनम दे दे कर थक जाती है। अयोग्य राजा राज करते हैं और रियाया माने जनता दुखी होकर घूमती रहती है। आशा भारती कहते हैं सुन ओ बंसीवाले ये सब दूर कर दो गिरधारी।

मैं इसे कल से सुन रहा हूँ और आराम है। मेरे बारे में ज्यादा सोचना मत कि मैं ऐसा ही हूँ।

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