डायरी

न आओगे मगर सुना है

जिनके हिस्से में ज़िंदगी बची रहती है, उनके हिस्से में रात भी आ जाया करती है। और रात के ग्यारह भी बजा करते होंगे अगर वे गुज़र न रहे हों किसी के ख़याल से।

मैंने कल की रात
सर्द रातों की आमद की खुशी में ओढ़ ली थी
एक नए गिलाफ़ वाली रज़ाई
जैसे किसी त्योहार पर घर में आते हैं नए कपड़े
और दर्जियों की अंगुलियों की खुशबू के साथ चली आती है, खोये हुये घरवालों की भीनी याद।

कल की रात दायें पाँव के नीचे दबा हुआ
रज़ाई का एक सिरा चुभता रहा कुछ देर ऐसे
जैसे कि शाम हुये घर आया हूँ
और कोई याद का टुकड़ा आ बैठा है किसी असमतल भूगोल की तरह।

सिर्फ दुखों की काली परछाई से नहीं बनी होती कोई रात 
और हर सुबह नहीं खिलती किसी अविश्वसनीय उम्मीद की तरह 
फिर भी हर तरह की शिकायतों और बेसलीका उदासियों के बीच 
मैंने किसी मौसमी चिड़िया की तरह पाया है, तेरी याद को।   
जिस तरह कई साल बीत गए हैं यूं ही
उसी तरह मैंने कर दिया एकतरफ रज़ाई का किनारा, मगर सो न सका
कि दीवार पर हथेलियाँ रखता हुआ कोई आता रहा करीब अंधेरे में
और मैं बेढब रास्ते में चलते हुये हर बार गिरता रहा, चौंक कर खुलती रही नींद। 
और तुम न आओगे मगर सुना है सर्दियाँ आएंगी हर साल गर हम न भी बचे रहे। 
* * *
[Image courtsey : Ary Snyder]
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