डायरी

पत्थर के दरीचों से

काले बुर्के वाली ख़वातीन ने पीछे से आवाज़ दी – “एक मिनट” उनको मेरा एक मिनट नहीं चाहिए था। वे हम दो भाइयों के बीच जगह बनाना चाहती थी। मैंने सोचा कि वे ऐसा भी कहा सकती थी कि थोड़ी सी जगह दीजिये। भाषा का ये कैसा सुंदर उपयोग है कि हम समय की इकाई का उपयोग नाप की इकाई की जगह बखूबी कर लेते हैं। विधान सभा भवन के ठीक सामने सौ मीटर के फासले पर मेला लगा हुआ है। यह मेला मध्यम वर्ग की कम कीमत में अधिक चीज़ें पा लेने की लालसा का बेजोड़ प्रतीक है। मेले में प्रदर्शित चीजों की नुमाईश के लिए टिकट है। हर कोई बड़ी शालीनता से पूरे दाम चुका कर मेले में सलीके से प्रवेश कर रहा था। ये वही लोग थे, जो अक्सर नियम कायदों में चलाने जीने पर नाक भौं सिकोड़ते रहते होंगे। 
मेले में हर स्टाल पर सेल्स गर्ल थीं। उनके चेहरे खास तरह के पाउडर से पुते हुये थे। उनके होठों पर एक समान लाल रंग की गहरी लिपस्टिक थी। पलकों पर गहरे सलेटी रंग का मसकारा था। उनके दांत साफ थे और होठों की लंबाई कई किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी, जिनको वे सप्रयत्न इकट्ठा करने के काम में लगी हुई थीं। वे शक्ल, रंग रूप और पहनावे से एक खास तरह का साम्य बुन रही थी। उनको देखते हुये मुझे ऐसा लग रहा था कि ये किसी अन्य दुनिया से आयातित औरतें हैं। यूं उनको देखो तो साफ लगता है कि वे भी किसी प्रदर्शन की चीज़ के तौर पर इस नुमाइश का हिस्सा हैं, औरत के प्रति असीम सम्मान के कारण मैंने उनको आयातित औरतें कहना पसंद किया है। मुझे जाने क्यों उन सूरतों पर प्यार आने की जगह एक विशेष सहानुभूति आने लगी। मैं उनको देखते हुये उन घरों के बारे में सोचने लगा, जो घर इनके चेहरे के नूर से रोशन रहते हैं। उन घरों में नन्हें मासूम बच्चे इंतज़ार में हैं, जैसे मेरे बच्चे। 
राज्य सरकार ने पोलिथीन को प्रतिबंधित कर रखा है। इसके लिए व्यापक अभियान चलाये गए हैं किन्तु विधान सभा भवन के सौ मीटर के दायरे में लगे इस मेले में रंगीन पेबल्स से लेकर गज़क – रेवड़ी तक सब कुछ पोलिथीन में पैक कर के दिया जा रहा था। यह भी भाषा के उपयोग का बेहतरीन उदाहरण है। जैसे बुर्के वाली ख़वातीन चाहती थी कि मैं थोड़ी जगह दूँ लेकिन वे कह रही थी कि एक मिनट। 
*** 
विध्याधर नगर की एक सोसायटी में दशहरा की पूर्वसंध्या पर नाच-गान और खान-पान का आयोजन रखा गया है। विवाह समारोह जैसा प्रबंध है। लेकिन मुफ्त में कुछ नहीं है। सोसायटी ने विज्ञापन से लेकर स्टाल लगाने वालों तक से रुपये वसूले हैं। जिंहोने रुपये दिये हैं, वे ढाई सौ घरों के स्त्री पुरुष, बच्चों और बड़ों से दोगुनी वसूली की उम्मीद में सक्रिय हैं। शहर का अपना सिस्टम है कि वह सब कुछ तुरंत वसूल लेना चाहता है। गाँव की तरह फसल पकने पर किसी का हिसाब चुकाने का खराब किन्तु आत्मीय तंत्र यहाँ काम नहीं कर सकता। 
बच्चों के मनोरंजन के लिए इस आयोजन में वाल्ट डिज़्नी के पात्रों की वेषभूषा में एक हाथी और एक भालू उपस्थित थे। ये अब कोई अजूबा नहीं रहा है। बच्चे भी इनके इतने आदि हो चुके हैं कि आम तौर पर डरने और बिदकने की जगह इनकी पूंछ खींचने और हाथ मिलने में आगे रहते हैं। अचानक से भालू गश खाकर गिर पड़ा। उस वेश में से एक नन्हा बच्चा बाहर निकला। पसीने से भीगा हुआ। थरथर काँपता। अर्धचेतन हाल में उस नन्हे बच्चे की शक्ल अगर किसी पत्थर दिल पिता ने भी देखी होती तो रोकर उसे सीने से लगा लिया होता। बाज़ार क्रूर है, किसी के लिए भावनाओं से काम नहीं कर सकता है। इसलिए लाल बालों वाले कॉस्ट्यूम के मालिक ने दूसरे लड़के का प्रबंध किया और मेला इस सारे घटनाक्रम से आंखे फेरे हुये बाखुशी चलता रहा। 
हवा भरा हुआ भालू का गुब्बारा फिर से खड़ा हो गया। जैसे आम आदमी मरते हुये भी जीने के सौ प्रबंध करने में उम्मीद से लगा रहता है। उस भालू की भाषा मुंह से नहीं पेट से बोलती है। पेट कहता है इस पसीने में थोड़ा और नाचो कि नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा। 
*** 
जयपुर की शाम में बादलों ने एक फेरा लगाया जैसे मेलों में लगे हुये पंखे हवा के साथ पानी की हल्की फुहारें बरसाते हैं। शोरगुल और रोशनी से घबराया हुआ एक कबूतर खिड़की पर आ बैठा, बेचैन और हतप्रभ। ये उसके लिए शहर में रहने की कीमत है। दीवाली इन कबूतरों से और कीमत वसूलेगी। आतिशबाज़ी के शोर में वे उड़ते-उड़ते और डरते-डरते थक कर गिर जाएंगे। पत्थरों के इस जंगल में मासूम परिंदों को देखते हुये क़तील शिफाई साहब की याद आती है। 
कुछ और भी सांसें लेने पर, मजबूर सा मैं हो जाता हूँ 
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की खुशबू आती है। 
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