डायरी

बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई

शाम फैली हुई है। गहरी, इतनी गहरी की रात का धोखा होता है। कोई सागर था सूख गया। कुछ चट्टानें और रेत बची रह गयी। जैसे किसी के जाने के बाद बची रह जाती है स्मृतियाँ। ऐसे ही बचे हुये एक पहाड़ पर रोशनी है। एक हरे रंग की झाईं उतरती हुई इस छत तक दिखाई देती है। मुझे ख़याल आता है कि उस चोटी पर बने मंदिर में माँ जोगमाया… बाढ़ाणे शहर को अपनी गोद में बसाये हुये मुस्कुरा रही होगी। 
रेगिस्तान में सदियों से आंधियों का सामना करते हुये और पानी की दुआ मांगते हुये इन्सानों ने एक औरत से ही पाया होगा जीवन जीने का हौसला। जब भी आदमी की नज़र थक कर बिछ गयी होगी धरती की देह पर, उस औरत ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर फिर से खड़ा कर दिया होगा। तुम आदमी हो, जाओ लड़ो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। 
अहसान फ़रामोश आदमी ने इतनी बेटियाँ मारी कि पचास सालों तक गाँव में कोई बारात न आई। 
*** 
एक लड़के ने कहा कि देखो मैं तुम्हारे सफ़ेद फूलों के बीच एक लाल गुलाब खिलाना चाहता हूँ। इसलिए कि तुम्हारे सब फूलों का रंग वक़्त के साथ सफ़ेद हो गया है। उसने कहा। हाँ खिलाओ, लाल गुलाब। लड़के ने एक कांटे से उसकी पीठ पर बनाना शुरू किया किन्हीं दो होठों का आकार और वह कहती रही, इसे और बना दो। 
आवाज़ के आखिरी टुकड़े ने बना दिया एक लाल गुलाब। अब उसके बागीचे में एक लाल गुलाब खिल गया था। लड़की घबरा गयी। उसने कहा कि इसे लौटा ले जाओ। मैं अपने मालिक की हूँ। मुझे सफ़ेद फूलों के बीच ये लाल गुलाब एक ‘गिल्ट” की तरह दिख रहा है। 
लड़के के पास आवाज़ के कांटे से बने हुये लाल गुलाब को मिटाने का हुनर न था। उसने “गिल्ट” की उदासी में बुझा दी अपनी आवाज़। 
*** 
मेरे पास एक केसी नाम का शराबी आया बैठा है और उसके किस्से सुन कर अहमद फराज़ साहब का शेर याद आता है। 
खल्क की बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई 
लोग मुझको ही सुनाते हैं फ़साने मेरे। 
***
[Image : A still from Titanic]
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