बातें बेवजह

आमद के इंतज़ार में

भाई ने खाना खाते वक़्त अनजाने या जानबूझ कर रोटी का एक टुकड़ा कच्चे आँगन पर गिरा दिया. चींटियों की कतार ने उसे घेर लिया चारों तरफ से और मैं बहुत देर तक ख़ुशी से देखता रहा कि आदमी अभी तक भूला नहीं है, प्रेम करना. खेत के बीच चलते हुए मेरे पैर की अँगुलियों को छू जाती हरी घास की कोंपलें. वे गुदगुदी करती जैसे कह रही हों कि किसके ख़याल में खोये रहते हो. 
नीले कैनवास पर छितराए हुए सफ़ेद बादलों के नीचे चलते हुए, मेरे चहरे पर छाने लगी हरे रंग की रंगत. मुझे याद आया फसल काटती हुई गाँव की औरत का कोई लोकगीत. एक कच्ची हरी बाली शरमा कर झुक गयी मुझसे ज़रा दूर जब भी उस गीत में आया शैतान की प्रेमिका का ज़िक्र… मैंने कहा शरमाओ नहीं, सुनों बेवजह की बातें. 

पितामह ने खेतों में अन्न उगाया
पिताजी ने बोई अक्षरों की फसलें.
शैतान पड़ा रहा प्रेमिका के प्यार में.
* * *
आदमी ने बनाये ऐसे तालाब
जिनमें टर्राते रहें याद के मेंढक
शैतान सुनता रहा उनका गीत.
प्रेमिका की याद के दरख़्त की सबसे ऊँची शाख पर बैठा हुआ.
* * *
अगर उसे मालूम होता
या उसे मालूम हो जाये
या कभी न हो सके उसे मालूम
उसको कोई फर्क नहीं पड़ता.
बस शैतान खोया रहता है, उसकी याद में
* * *
हवा में लहराती हरे रंग की एक बड़ी पत्ती से
प्रेम करने में मशगूल था, हरे रंग का टिड्डा
पीले सिट्टे की आमद के इंतज़ार में थी पीले रंग की चिड़िया
शैतान ने सोचा आज उसने पहना होगा, कौनसा रंग.
* * *

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