मेहदी हसन

तेरे भीगे बदन की खुशबू से

साहेब खम्मा घणी, मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया. जाने कितनी ही दावतों में मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और नुसरत फ़तेह अली खान जैसे साहेबान की ग़ज़लों को बखूबी गाने वाला फ़नकार दरवाज़े पर खड़ा था. सियासत के लोगों के यहाँ महफ़िलें हों या फिर अफसर साहेबान की रंगीन शामें, मुझे इसकी आवाज़ जरुर सुनाई देती थी. लोक गायिकी के रणदे पर घिसा हुआ सुर, ग़ज़ल को भी बड़ी नफ़ासत से गाता.
सौ रुपये चाहिए, बच्चा अस्पताल में भर्ती है.
मैं जब भी अस्पताल जाता हूँ, उसका लड़का नर्सिंग स्टाफ के लिए चाय लाता हुआ मिल जाता है. मुझे देख कर रुक जाता है. कहता है नमस्ते. फिर देर तक मुस्कुराता रहता है. मेरे मन में पहला विचार आता है कि आज इसका लाचार फ़नकार बाप जाने किस आदमी से बच्चे के नाम पर सौ रूपये मांग रहा होगा ताकि एक और दम-ताज़ा दिन को कच्ची शराब में डुबोया जा सके. मैं कभी कभी सोचता हूँ कि पूछूं, मनोहर साहब, फिर जाने कब मिलेगी ज़िन्दगी.
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एक और फ़नकार है. शीशम की लकड़ी से बने खड़ताल को अपनी अँगुलियों में इस तरह घुमाता है जैसे बिजली कड़कने का बिम्ब रच रहा हो. पिछली बार जब रिकार्डिंग पर आया तो हाथ से खड़ताल छूट गई. वह पार्टी लीडर है मगर उसका बेटा सब कुछ अरेंज करता है. बाहर ड्यूटी रूम में कांट्रेक्ट पर साइन हो जाने के बाद कहता है, सर मैं आकर ले जाऊंगा चैक. पिता का हाथ थामता है और आहिस्ता आहिस्ता कच्ची शराब की गंध ड्यूटी रूम से विदा हो जाती है. इस तरह इस फ़नकार के सफ़र का रास्ता थोड़ा और कट जाता है. मैं सोचता हूँ कि नियाज़ साहब, पैंतालीस की उम्र मैं आपकी ज़िन्दगी कैसी हो गई है?
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एक दोपहर धोधे खां मिल गए. उनको कुछ कहना नहीं होता. वे सब कुछ ख़ुद कहते हैं. “किशोर साहब, कलाकार के पास कला होती है, गेंहू की बोरी नहीं होती. इसलिए कलेक्टर साहब से एक पर्ची लिखवा कर लाया हूँ और गेंहू की बोरी लेने जा रहा हूँ. आप भी बुलाया कीजिये, अल्लाह आप पर करम करेगा.” दुबला पतला पैंसठ साल का आदमी मेरी आँखों से ओझल होने लगता है. एक कंधे पर अलगोजा की जोड़ी का केस टांगे हुए, दूसरे पर नीले रंग का झोला, जिसमें एशियाड के उद्घाटन समारोह के निमंत्रण पत्र से लेकर असंख्य कला    संस्थाओं और सरकार द्वारा दिए गए सम्मान पत्र. आखिर स्टेशन रोड की ओर जाता हुआ अक्स खो जाता है.
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ऐसे अनेक किस्से हैं. जीते जागते, रूहानी अहसास कराने वाले गायक, भारू राम की दुकान के सामने बैठे चाय पीते हुए मिल जाते हैं. लम्बा कुरता और उस पर हल्की सदरी डाले हुए. रंगीन साफ़ा बांधे, ज़िन्दगी से, सुरों की कुश्ती लड़ते हुए इन जिप्सी गायकों की रूहें एक दिन हार जाती है. ले आओ कुछ जो भुला दे कि अभी ज़िन्दा हैं. एक ख़बर पढ़ी थी कि आखिरी समय में उपेक्षा के साथ जीते हुए चले गए शहनाई के उस्ताद, बिस्मिल्लाह खां साहब. मेहदी साहब के परिवार ने भी बहुत गुहार लगायी कि इमदाद दीजिये. यूं सदा के लिए इस दुनिया में रहने को कौन आता है मगर कलाकारों की रुखसती का ये ढब मुझे रुला देता है.
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अर्जुन सिंह रतनू, रेडियो में प्रजेंटर है. एक रात उन्होंने मेसेज किया. आपके मेल बॉक्स में एक गीत छोड़ा है, सुनियेगा जरुर. लीजिये आप भी सुनिए.
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