बातें बेवजह

गुज़रे हुए कदमो के निशान…

मुहब्बत भी जाने कैसी चीज़ है कि एक अरसे से ख़ुद के अहसासों को दर्ज़ करता जा रहा हूँ. अब एक किताब जितने शब्द हो गए हैं. दोस्तों, इस आत्ममुग्धता का कोई चाहने वाला हो, तो बताना. “बातें बेवजह” एक ऐसा विचार था कि मैं जो लिख रहा हूँ, वह सिर्फ़ मेरे मन की बात है. यह दूसरो के लिए बेवजह ही होगा. लेकिन मैं लिखता रहा महबूब को चिट्ठियां कि चीज़ें और दुनिया कैसी दिखती है. जो सीख रहा हूँ, वो क्या है?

दोस्तों, एक प्रकाशक की खोज में हूँ. जो रेगिस्तान के एक आम आदमी की डायरी में दर्ज़ कुछ बेहद छोटी कविताएं किताब की शक्ल में छाप सके. खैर, संजीदा न होईये. कुछ बेवजह की बातें पढ़िए

कोई जगह नहीं बनी है
कहीं जाने के लिए
सब सिर्फ़ मुसाफ़िरों के अचम्भे के खातिर है.
* * *

गुज़रे हुए कदमो के
निशान देख कर सोचता है, आवारा पत्ता.

जो आये थे, वे क्या हुए ?
* * *

थके हुए मुसाफिरों ने की थी सीढियां ईजाद
जब वे थक कर हार गए
तब आखिरी सीढ़ी बनायीं, सिर्फ़ कुछ हाथ नीचे
जिसमें रखा जा सके एक आदमकद बक्सा.
* * *

[Painting Image Courtesy : Arthur Rackham ]
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