बातें बेवजह

तपते दिन में गीली जगह

लाचार आदमी की भाषा के पास प्रेम की आग को बयाँ करने के लिए शब्द नहीं थे. उसने जाड़ों में जलावन से उठती आंच के जरिये कहनी चाही बात मगर प्रेमिका को लगा कि ये बहुत नीरस है. उसने चूम ली हथेलियाँ और फिर पगथली के बीच रख दिए अपने होंठ मगर इस छुअन के बाद प्रेमिका ने पूछा कि मैं प्रेम के करीब आ रही हूँ या तुम्हारे और लाचार आदमी की भाषा के पास फिर से नहीं थे शब्द… एक और बेवजह की बात.

मैं भी अपने तजुर्बे से होने लगता हूँ चुप, पीते हुए
कि चुप्पी की भी कतरने हुआ करती है
उनको बचाए रखना चाहिए मुहब्बत होने के दिनों में
कि उस वक़्त बड़ी काम आती है
जब तुम पूछोगे ‘क्या’ और मैं कहूँगा ‘कुछ नहीं’
फिर वे कतरने तन जाएगी हमारी मुहब्बत के ऊपर छतरी की तरह.

मेरे कुछ दोस्तों को इस तरह पीने की आदत है
जैसे मैं आवाज़ देता हूँ तेरे नाम को
वे अक्सर लुढ़क जाते हैं गलीचों पर
और रात भर ज़हीन लोगों के कदमों के निशानों को देते रहते हैं बोसे
सुबह फिर नहा धोकर पहुँच जाते हैं ऑफ़िस, कल की तरह
जैसे ठुकराया हुआ महबूब फिर से चुन रहा हो, नए गुलाब.
* * *

[Image : Road to Guda Malani.]
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