ग़ालिब

है कुछ ऐसी ही बात…

कुछ दस्तकें ख़यालों की दुनिया से लौट आने के लिए होती हैं. हालाँकि उदास होने की कोई बात नहीं कि कितना भी सूखा हो बियाबाँ मगर आँखों को धोने के लिए दो चार दिन बाद कहीं पानी मिल ही जाता है फिर ये आँखें खुद को किसलिए आंसुओं से धोने लगती है. बस ये समझ नहीं आता है.

एक उसकी याद के सिवा सब अँधेरा है. इस स्याही से बाहर आने के लिए उसकी आवाज़ का सहारा चाहिए लेकिन आवाज़ नहीं मिलती. ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे फ़ौरी तौर पर किया जाना जरुरी हो सिर्फ़ दर्द को सहना जरुरी है कि इससे बड़ा सम्मान कुछ नहीं होता. ये जानते हुए भी उसे हड़बड़ी में भुला देने की कोशिश में लग जाता हूँ.

ज़िंदगी का कोई सलीका तो होता नहीं इसलिए अचानक कोई चला आता है. वह अनमनी नींद को थपकी देता है. नींद के सरल और मृत्यु सरीखे रास्ते से बुला लेना कोई ख़राब बात नहीं है मगर वह जगा कर अक्सर खुद कहीं चला जाता है. इसके बाद एक फासला रह जाता है. इस फासले के दरम्यान बची रहती है, तन्हाई…

अच्छे या बुरे हालात हर हाल में बदल ही जाएंगे मगर कई बार आप जीने की वजह के बारे में सोचने लगते हैं.
और जीने की वजह आपसे बहुत दूर होती है.

वे दस्तकें, हमारे आशुफ्ता हाल से बेपरवाह होती हैं.

* * *

दाग़ ए दिल गर नज़र नहीं आता,
बू भी ऐ चारागर नहीं आती.

Though the wound of my heart cannot be seen
but my healer, even a trace of its smoldering is missing. 

आह ग़ालिब…

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