बातें बेवजह

रंग सारे नुमाया हैं, बेरंग

खालीपन एक भरा पूरा शब्द है. खालीपन है तो वहाँ कुछ नहीं होना चाहिए फिर मैं जाने क्यों घबराने लगता हूँ. घबराहट में अक्सर कोई शक्ल बुनने लगता हूँ. चुप्पी तोड़ने के लिए उस शक्ल से बातें करता हूँ. उन बातों को ज़हन में छुपा कर रखता हूँ. एक दिन मैं भीड़ में खो जाता हूँ. भीड़ से उकता कर उसी जगह लौट आता हूँ. खालीपन की ओर दौड़ने लगता हूँ. वहां कई शक्लें बैठी होती हैं, खुश और बेपरवाह… वे वैसी ही होती है जैसी मैं उन्हें छोड़ गया था. उनको देखते ही छुपने की जगह खोजने लगता हूँ. शायद उनसे डर जाता हूँ. अगर मुझे लगता है कि उन्होंने मुझे देख ही लिया है तो इस तरह का अभिनय करता हूँ कि मैं यहाँ ऐसे ही आया था. कुछ खोज नहीं रहा था. आखिर भले ही मैंने उन्हें बुना है मगर वे शक्लें पूछ तो सकती है ना मैं इस तरह तनहा क्यों हो जाता हूँ?

दोस्त. आ कुछ खालीपन के बारे में बेवजह की बातें करते हैं, वे बातें जो तेरे कहने से आप ही दुरस्त हो जाती है.

मुझसे पूछता है बार बार
उसने कितने दिनों से पूछा ही नहीं है
तुम्हारा हाल ?

खालीपन एक चुगलखोर है.
* * *

ज़िन्दगी अपरिभाषित दुःख नहीं
दर्द भरी जिज्ञासा थी

कोई खो जाता है, तो मिलता क्यों है ?
* * *

ज़िन्दगी के ड्रामे में
मेरे खो जाने को बुनने के लिए
उन्होंने रचे रुदन और आंसू.

काश, उन्होंने बुना होता
मौन के तंतुओं से गहन खालीपन.
* * *

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