डायरी

हसरतों के बूमरेंग

आधे खुले दरवाज़े से आती हुई रौशनी पीछे नहीं पहुँच पा रही थी. वह मुझसे दो हाथ जितनी दूरी पर खड़ी थी. गाढे रंग के कसे हुए ब्लाउज की चमकीली बाँहों और चौड़े कंधों पर अँधेरा पसरा हुआ था. दरवाज़े की झिरी से आती हुई रौशनी कम थी. उसकी आँखें मुझसे मुखातिब थी और हम शायद बहुत देर से बात कर रहे थे. हल्के अँधेरे और उजालों की छुटपुट आहटों के बीच लगा कि कोई आया है. दो कमरों के पहले तल वाले उस घर की बालकनी दक्षिण दिशा में खुलती थी.

पतली सीढ़ियों से उस स्त्री के पति की पदचाप सुनाई देने लगी. हम दोनों जड़ हो गए. एक अमूर्त अपराध की शाखाएं हमें कसने लगी. वह दरवाज़े के पीछे रसोई के आगे वाली जगह पर खड़ी रही. आते हुए क़दमों की आवाज़ों से मुझे लगने लगा कि मैं कोई गलत काम करते हुए पकड़ा गया हूँ. तूफ़ान आने से पहले उड़ते हुए दिखाई देने वाले पत्तों की तरह आशंकाएं मेरे आस पास तेजी से मंडराने लगी. जबकि हम दोनों ही नितांत सभ्य तरीके के एकांत में थे. मैं दरवाज़े के पीछे से निकल कर बालकनी की ओर चल पड़ा. लोहे की हल्की रेलिंग से नीचे देखते हुए पाया कि यहाँ से उतरना बहुत कठिन है.

स्वप्न में एक विभाजन हुआ. वह अचानक से टूटा और फिर से शुरू हो गया. उसी घर के आगे सौ फीट चौड़ी सड़क पर मैं अपनी शोर्ट चेसिस जीप को किसी धातु के टुकड़े से स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ. मेरी चाबी उसके पति ने लेकर कहीं छुपा दी है. उसके चेहरे पर इस तरह के भाव थे कि तुम्हारी इस गुस्ताखी पर ऐसा ही किया जाना चाहिए. मैंने फिर से धातु के टुकड़े को इग्निशन में डाल कर घुमाने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सका. उसका पति एक शोर्ट और टी शर्ट में मुझसे पचास फीट के फासले पर अपनी एनफील्ड जैसी किसी पावर बाइक पर बैठा था. उसकी बाइक भी स्टार्ट नहीं हो रही थी.

मैंने उसे देखा और पाया कि हम दोनों की गाड़ियाँ एक सा ही बिहेव कर रही है. जबकि वह खुश है और मैं निराश परेशान सा…. वह स्त्री बालकनी में आकर नहीं झांकती. मैं एक बार फिर उसके बारे में सोचता हूँ और वह मुझे उसी दरवाज़े के पीछे खड़ी हुई ख़याल में आती है.

ये पिछले सप्ताह के आरम्भ की एक सुबह का सपना था.

* * *

आज सुबह
सपना एक कार के इंतज़ार से शुरू होता है. मैं अपनी माँ के साथ बैठा हूँ. उसी अजनबी शहर में जिसके सपने अक्सर सिलसिले से आते हैं. सामने दक्षिण दिशा में जाने वाली सड़क पर एक मॉल है. वह कभी कभी दिखता है. उसका मुख उत्तर दिशा में है. रास्ते की बीच आने वाली कॉलोनी किसी पहाड़ी बसावट की तरह है. इसी सड़क पर चलते हुए जहां समतल भूमि का आगाज़ होता है वहीं से कुछ सौ मीटर दूर मेरा फ्लेट है. मैं माँ को अपना फ्लेट दिखाना चाहता हूँ. घर में दायीं तरफ वाले वाशरूम का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों हर बार यही एक काम अधूरा सा दिखता है.

स्वप्न की कुछ रील गायब हो जाती है. अब हम सड़क पर चल रहे हैं. मॉल के आगे मेरी एक बहुत पुरानी दोस्त अपनी बहन के साथ दिखती है. स्वप्न के एलिमेंट हेंस प्रूव्ड का एलान करते हैं कि इसी दोस्त की गाड़ी में कहीं जाना है. लेकिन मैं इस बात पर सोचने लगता हूँ कि कौन कहां बैठेगा. क्या मेरी दोस्त कार को चलाएगी और उसकी बहन उसके पास आगे की सीट पर बैठेगी या मै गाड़ी चला रहा होऊंगा और वह पीछे मेरी माँ के साथ बैठेगी.

लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं. हम तीनों पैदल जा रहे हैं. दोस्त की बहन हम दोनों के बीच है. बीस एक कदम चलने के बाद मैं उसके बाएं हाथ को अपने हाथ में लेता हूँ. जैसा अक्सर मनुष्य चलते समय अपने प्रियजनों के साथ करता है. उसकी अँगुलियों में फंसी मेरी अंगुलियाँ मुझे आवेशित करती हैं. जाने क्यों मैं उसका हाथ छोड़ देता हूँ और पीछे चल रही अपनी माँ को देखता हूँ. थोड़ी दूर जाने के बाद फिर से उसके हाथ को थाम लेता हूँ. इस पकड़ से बन रही अनुभूति के नवीन आत्मीय रेशों की बुनावट से हम दोनों असहज से हैं. अथवा एक अजनबीपन को हराने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए दो बार एक दूसरे की आँखों में अपने प्रश्न रख कर फिर से सामने देखने लगते हैं.

स्वप्न में भारीपन छाने लगता है. एक ठहराव घेरने लगता है. मेरी दोस्त रो रही है. इसलिए कि मैंने उसकी बहन का हाथ पकड़ रखा है. वह कुछ कह भी न पाई. उसने हमारे बीच जगह बनाने के प्रयास भी नहीं किये थे. वह चलते चलते शायद अपनी उपेक्षा से रोने लगी. वह थक कर बैठ गयी है. उसकी आँखों में आंसू है. वह किशोरवय की कार्टून प्रेम कहानियों के एक उदास चरित्र सी किसी शक्ल में ढल गयी है. मैं और उसकी बहन उसे सहारा देकर उठा लेना चाहते हैं. अचानक पीछे छूट गए मॉल के आगे की सड़क अधिक सूनी हो गयी. माँ हमारे साथ नहीं है. मैं खड़ा हूँ, उसकी बहन पश्चिम की ओर देख रही है, मेरी दोस्त ने अभी अपना सर उठाया नहीं है…

* * * 
ये दो स्वप्न ताज़ा रील के टुकड़े हैं. इस यात्रा में कथानक और दृश्य अक्सर जम्प करते हुए नए स्थानों पर पहुच जाते हैं. इन्हें अपने इस रोज़नामचे में इसलिए दर्ज़ कर रहा हूँ कि कुछ भी बिना वजह नहीं होता है. मौसम में कल रात का सुरूर बाकी है. ज़िन्दगी, जंगल में भटक रहा एक शिकारी है, जिसकी बन्दूक में समय नाम का बारूद भरा है. मेरी मैगज़ीन में हसरतों के बूमरेंग रखे हैं. बेआवाज़ लौट लौट कर आते हैं, मेरे पास…
[Painting image courtesy : Laurie Justus Pace]
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