बातें बेवजह

ऑक्सफोर्ड टो वाले शू

बीते साल की कुछ और बेवजह की बातें…

याद की खिड़कियाँ

और ऐसे ही किसी दिन न भूल पाने की बेबसी में
एक से दूसरे कमरे में टहलता रहता हूँ
याद की खिड़कियों पर सुस्ताती गिलहरियों को देखता
बेसबब वार्डरोब को खोले चुप खड़ा सोचता हूँ,
दीवार… दराजें… स्याही… कुहासा…शहर और वीराना
एक विलंबित लय में लौट आता हूँ बिस्तर पर…

फिर
समय की धूल से भरे तकिये पर सर रखे सोचता हूँ
कि रिसाले और किताबें नहीं दे पाते हैं सीख, तुम्हें भूल पाने की
* * *

शुभकामनाएं

वह हद दर्जे का जाहिल था
जींस के नीचे ‘ऑक्सफोर्ड टो’ वाले शू पहना करता
डिनर से पहले प्रे नहीं करता
सोता था चिपक कर और ओढ़ लिया करता बेड कवर
और उसके आने का भी कोई सलीका न था…

काश ! उसको वेलेंटाइन और फ्रेंडशिप डे की तरह
सिलसिले से साल दर साल आने का हुनर पता होता
ये सोच कर उसने मोबाइल वापस रख दिया है.

ऐसा सोचते हुए मैं भी नहीं कर रहा हूँ फोन
कि बाते बेवजह हैं और बहुत सी हैं..
* * *

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