डायरी

सपने में एक उदास चिड़िया

यह कोई अच्छी बात भले ही न हो मगर हर सुबह चंद ख़्वाबों के टुकड़े सिरहाने रखे होते हैं. मैं जागते ही एक जिज्ञासु और उम्मीद भरे बच्चे की तरह पहेली को जोड़ कर एक मुकम्मल तस्वीर बनाने में जुट जाता हूँ. वे छोटे टुकड़े आपस में इस तरह गुम्फित होते हैं कि कोई सिरा सही से पकड़ में नहीं आता है. उनका फलक व्यापक और तत्व विस्मयकारी होते हैं. उन सपनों को खोल पाने के लिए मैं सबसे पहले अपनी जेब टटोलता हूँ. जिसमें कुछ कामनाएं रखी रहती हों. मैंने ऐसा सुन रखा है कि सपने अक्सर हमारी अपूर्ण इच्छाओं और उनके दायरे में रखी हुई अवचेतन सोच के प्रतिनिधि होते हैं.

मैं अपने असंख्य सपनों को दर्ज़ कर सकता था मगर उन दिनों ऐसी डायरी लिखने की सुविधा नहीं थी. मेरे पास हर समय एक रजिस्टर हुआ करता था. उसमें कुछ बेहद निजी बातें लिख लिए जाने के कारण वह रजिस्टर गोपनीय दस्तावेज हो जाता था. उसका अंज़ाम तय था कि वह जीवन का हिस्सा बन कर साथ नहीं रह सकता था. मेरी बहुत सी बेवजह की बातें उसके साथ ही नष्ट हो गयी. मुझे प्रकाशन उद्योग और लेखकों से नफ़रत नहीं है मगर उनके बारे में बात करके भी ख़ुशी नहीं होती कि वे सब आत्ममुग्ध और हुक्मरान होने जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं.

रजिस्टर के साथ बेवजह की बातें और कहानियों के ड्राफ्ट खो गए. मैं अपने सपने याद नहीं रख पाया इसके सिवा मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ. मैं अब भी उस दुनिया का हिस्सा नहीं हूँ और मुझे ख़ुशी है कि नए किस्म के औजार आ गए हैं. अब आप ब्लॉग और पर्सनल डोमेन के जरिये अपने दिल की बात कह सकते हैं. हमारी बातें किसी के लिए उपयोगी होगी तो पब्लिकेशन वाले उसका बेहतर उपयोग भी कर लेंगे. मेरे दो तीन चाहने वालों ने ऐसा किया भी है कि ख़ुद तकलीफ़ उठा कर मुझसे लिखवा कर पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय पन्ने के पहले लेख और कवर स्टोरी की तरह छाप दिया है. खैर मैं सपनों के बारे में बात कर रहा था. मैं हर सपना जया या बच्चों को सुनाया करता हूँ ताकि उसको लिखे जाने तक सलीके से याद रखा जा सके.

तीन रोज़ पहले का एक सपना जिसे नए साल का पहला ख़्वाब भी कहा जा सकता है. छत पर छोटे सरकार के साथ पतंग उड़ा रहा हूँ. मुझे पापा ने कभी ऐसा नहीं करने दिया. इसलिए संभव है कि यह मेरी कामना रही होगी कि कभी ऐसा कर सकूँ. मैंने कहा, हम इस पतंग की डोर पर चिड़ियाओं को बैठने देते हैं. फिर उनको गोल गोल घुमाएंगे. हमने ऐसा ही किया. दो चिड़िया डोर पर बैठी. वे कुछ देर गोल घूमने के बाद बारी बारी से उड़ गयी. उनके बाद एक सफ़ेद फ़र वाली बहुत ही कोमल चिड़िया आकर डोर पर बैठ गयी. 

वह एक सोफ्ट टॉय जैसी थी. जिसमें प्राण फूंक दिए गए हों. उसके एक ही पैर था. जो नीचे से गोल था. मैंने उसे हाथ में लिया और छत से नीचे चला आया. रसोई के आगे खड़े हुए बेटे के एक दोस्त ने कहा अंकल ये तो खिलौना है. तभी मैंने उसके मुंह की तरफ देखा. वह एक सजीव छोटी बच्ची का मुंह था. उसकी आँखें बहुत प्राणमय थी. उसके चेहरे पर कुछ छोटे छोटे गड्ढे थे. जैसे अक्सर पिम्पल्स से हो जाया करते हैं. एक तीखी नाक थी. ऐसी नाक जो कार्टून चरित्रों में होती है. इम्प्रेशन कुछ ऐसा था कि वह बहुत उदास थी. उसे नींद आ रही थी या फिर शायद वह आधे होश में थी. मैंने उसके चहरे को अपने कंधे पर रख लिया ताकि वह आराम से सो सके.

उस वक़्त सुबह के छः बज रहे थे. बच्चे उठ कर मेरे बिस्तर पर चले आये. मैं रजाई को ओढ़े हुए बैठा था. मैंने गोद में बेटे को बिठाया और सबको अपना सपना सुनाया. इसके बाद बच्चे और जया स्कूल चले गए, अबूझ सपना मेरे कंधे पर बैठा रहा. मेरी समझ के औजार जिन जेबों में रखे होते हैं. वहाँ से कोई उत्तर नहीं मिला.

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