डायरी

सोच के उनको याद आता है…

अक्सर एक निर्वात में खो जाता हूँ. वहाँ असंख्य कथाओं का निरपेक्ष संचरण होता है. उसमें से एक सर्वव्याप्त कथा है कि जिनका मुश्किल दिनों में साथ दिया हों वे अक्सर ज़िन्दगी आसान होने पर एक काली सरल रेखा खींच, मुंह मोड़ कर चल देते हैं. इस सरल रेखा के बाद, उससे जुड़ी जीवन की जटिलतायें समाप्त हो जानी चाहिए किन्तु मनुष्य अजब प्राणी है कि दुर्भिक्ष में पेड़ से चिपके हुए कंकाल की तरह स्मृतियों को सीने से लगाये रखता हैं.

जोर्ज़ बालिन्त की एक खूबसूरत रूपक कथा है. ‘वह आदमी रो क्यों रहा था.” रंगमंच या किसी उपन्यास में रुलाई उबाऊ और भावुकता भरा प्रदर्शन लगती है परन्तु सचमुच की ज़िन्दगी में रोना एक अलग ही चीज़ है. क्योंकि ज़िन्दगी में रोना वातावरण पैदा करने वाला भौंडा प्रदर्शन नहीं होता. जैसे सचमुच के जीवन में डूबते हुए सूरज की ललाई किसी पोस्टकार्ड की याद नहीं दिलाती बल्कि बेहद आकर्षक और रहस्यमयी लगती है. ठीक इसी तरह सचमुच के जीवन में शिशु का रिरियाना मोहक नहीं लगता बल्कि ऐसा लगता है मानो वह बहुत पुरातन कोई अदम्य आदिम व्याकुलता व्यक्त कर रहा हो.

इस कथा के नायक का नाम लीफे था. वह राजमार्ग पर बैठा, अपने घुटनों में सर डाले हुए रो रहा था. किन्तु वहाँ से गुज़रते हुए किसी व्यक्ति ने उस पर ध्यान नहीं दिया. कथाकार उसके रोने के कारणों के बारे में कई कयास लगाता हुआ हमारे सुखों को छल लिए जाने को अनावृत करता है. मनुष्य ने अपने जीवन पर छलावों के झूठ का सुनहला का पानी क्यों चढ़ाया है. क्या हमारे दुःख आदिम है? और क्यों हम मनुष्य के रोने से परे हुए जा रहे हैं? एक जगह मन को छू जाने वाला कयास है कि शायद किसी ने लीफे को पूछा हो कि “आप कैसे हैं?” और वह रो पड़ा हो. हम अक्सर जिनसे अपना हाल दिल से पूछे जाने की अपेक्षा करते हैं, वे हमारे पास नहीं होते.

जीवन की अटूट विश्रृंखलता का अपना विधि विधान है. जीवन के कारोबार में रोने का मोल समसामयिक नहीं होता है. दुःख का कारवां, हमारे जीवन को उथले पानी में फंसी मछली जैसा कर देता है. रोने के भंवर से बाहर आने के लिए जिस स्पर्श की जरुरत होती है. वह समय की धूप में सख्त हो चुका होता है. वस्तुतः रोते समय हम अपनी शक्ल खो देते हैं इसलिए जोर्ज़ की कथा के नायक का चेहरा नहीं दिखाई देता. उसके वस्त्रों से वह साधारण जान पड़ता है. साधारण मनुष्यों के रोने के लिए खास जगहें नहीं होती. वे सड़कों के किनारे ऐसी जगहों पर बैठे होते हैं जहाँ ऊपर की ओर हाईमास्ट कलर्ड लाइट्स लगी रहती हैं.

ये रौशनी का समाज अँधा है. इसकी दीवारें बहरी है. यह अपने मृत दिवसों की खाल को ओढ़े हुए उत्सवों में मग्न रहना चाहता है. इसलिए भी इस कथा में अगर लीफे शाम होने तक उसी जगह बैठा रोता रहा तो वह किसी को दिखाई भी नहीं देगा. उसके सर के बीसियों फीट ऊपर रंगीन रौशनी की जगमगाहट होगी. वह रंगीनी के तले अंधेर में खो जायेगा… घिर घिर कर प्रश्न सताएगा कि फिर वह आदमी रो क्यों रहा था? ऐसे ही मैंने भी कई बार पाया कि लीफे की तरह बेशक्ल, घुटनों में सर डाले हुए हम सब कितनी ही बार उनके लिए रोते रहे हैं, जिनको हमारी परवाह नहीं थी. आज सोचता हूँ कि उस रोने का मोल क्या था? और क्या सचमुच ऐसे कारण थे कि रोना आ जाये…

* * *

जोर्ज़ बालिन्त की मात्र सैंतीस साल की उम्र में नाज़ी श्रम शिविर में मृत्यु हो गयी थी. हम भी भौतिकता के नाज़ीवाद में घिरे हैं. इस दौर में हम दबाव वाली जीवन शैली के नाज़ी शिविर में कैद हैं फिर भी मैं एक दुआ करता हूँ कि हम सीख सकें प्रेम से बाहर आना ताकि प्रेम हमारे भीतर आ सके.

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