डायरी

कुछ ये याद किया…

एक बड़ा दरवाज़ा है. मजबूत सलाखों के पार दुनिया की रफ़्तार है. सांझ घिर आई तो बाहर सड़क पर चलती फिरती शक्लें लेम्पोस्ट से गिरती रौशनी में कुछ देर दिखती और फिर बुझ जाती. दफ्तर के अंदर गरमी है, बासी लम्हों के शोक से भरी गरमी. खुले में हवा की ठंडी झुरझुरी याद का तिलिस्म खोलती है. गुड़हल के पास हेजिंग के लिए मेहँदी और रेलिया की लम्बी कतार और कैन से बुनी कुर्सी पर स्मृतियों का कारोबार. बचपन के दिनों की अकूत खुशबू और रात के अद्भुत सिनेमा के रिपीट होने का ख़्वाब. वह सिनेमा कुछ ऐसा था कि उन दिनों माँ अक्सर आँगन के बीच दो चारपाई डाल कर हम तीनों भाइयों को सुला देती थी. उस अँधेरे में चारपाई पर लेटे हुए ऐसा लगता था कि काँटों की बाड़ के पार कुछ आवाज़ें हैं. दिन के समय उस तरफ वाले लम्बे खाली मैदान में बेतरतीब उगी हुई कंटीली झाड़ियाँ फैली दिखती थी. उन झाड़ियों के बीच पैदल चलने से बने हुए रास्ते थे, जिनकी दिशाएं खो चुकी थी.
रात के समय दिन भर का निरा शोर एक विचित्र काले सन्नाटे में समा जाता. किसी मायावी घटना के होने की बेशक्ल उम्मीद मुझे छू कर अँधेरे में गुम जाती. मैं हर रात तय करता कि सुबह होते ही बाड़ के आगे के पूरे इलाके की छानबीन करूँगा, मगर हर सुबह भूल जाता. रात के इकहरे रंग वाले इफेक्ट अद्भुत तरह का सम्मोहन रचते थे. मैं एक असम्भव दुनिया को अपने आस पास महसूस करने लगता. दिन भर कूड़े के ढेर पर माचिस की खाली डिबियों को चुनते फिरते लड़के कहते थे कि प्यासी जनाना रूहें गलियों के मोड़ों पर भटकती रहती हैं. वे खास तौर से पानी के हौद, बिजली के खम्भे और स्टेडियम वाले मोड़ के आस पास हुआ करती थी. मुझे कभी नहीं लगता था कि रात एक ज़ोरदार कहकहा लगा पायेगी. वह सिर्फ़ अजगर की तरह कुंडली कसती रहेगी. ऐसा ख़याल आते ही कभी हाथ के रोयें खड़े हो जाते. मैं अपनी हथेली से उन रोयों को छूकर देखता. वे ओस भीगे बाजरा के सिट्टों को छूने जैसा अहसास देते थे. उस अँधेरे से मेरे बहुत से आग्रह थे. उनमें सबसे गोपनीय था, एक कमसिन गंध… मेरे मस्तिष्क में वह कमसिन गंध उसी तरह आई होगी जैसे मिट्टी से बने घोंसले में बैठे हुए ततैये के बच्चे उड़ने का हुनर साथ लेकर आते हैं.
रात बदस्तूर हर शाम के बाद आती और माँ उसी तरीके से चारपाइयाँ बिछा देती. मैं अपने उसी सम्मोहन में खो जाता. गरमी के पूरे मौसम में अनजान अदृश्य दुनिया नींद आने से पहले आबाद रहती. वन बिलाव पेड़ की शाख़ पर दो तरफ टाँगे लटकाए हुए सोया रहता हो, उसी तरह मैं भी चारपाई की ईस पर सोता था. उस मोटी लम्बी ईस पर लेटे हुए सामने बाड़ और नीचे गोबर से लिपा हुआ आँगन दिखता था. रात गहराती रहती थी. आवाज़ों पर सन्नाटे का पहरा बैठ जाता. दबे पांव नींद फिर घेर लेती. सुबह आँख खुलती तो देखता कि झाऊ चूहे कि तरह गोल होकर चारपाई के बीच में सिमटा हुआ हूँ. रात के काले से सम्मोहन भरे कांटे गायब हो चुके होते. स्नानघर के ठन्डे फर्श पर पगथलियों में गुदगुदी हो रही होती फिर इसके बाद दिन खाली गलियों में दौड़ते भागते हुए बीत जाया करता था. कभी दोपहर को खुली खिड़कियों से कमसिन गंध की टोह लेता रहता था.
रात से मुहब्बत के सफ़र में अल्पविराम की तरह कुछ रातें आती रही. तब खुले आँगन में सोने नहीं दिया गया. ये प्यासी रूहों की गिरफ्त में आने से भी बड़ा खतरा था. उस रात दम भर के लिए चाँद को अँधेरा डस लेता. माँ तीलियों से बने एक सूप में गेंहूं भर कर छत पर रख आती. रात के भोजन को साँझ होते ही करना पड़ता. सवेरे झाड़ू लगाने वाली एक बूढी औरत घर के सामने आती और जोर से आवाज़ लगती “बाई जी, गरण दिराईजो…” माँ वे गेहूं उसकी झोली में डाल देती. मुझे वह रात कभी अच्छी नहीं लगती थी. उस रात अँधेरे की आवाज़ों का वाध्यवृन्द बंद हो जाया करता था. मुझे थपकियाँ देने वाली रूहें बंद कमरे में नहीं आ पाती थी. भटकने की आदत पर दीवारों की लगाम कस जाती. उनके पार सोचने को कुछ नहीं बचता था.
एक अरसे तक रात का अपना ओपरा कंसर्ट चलता रहा. अद्वितीय आवाज़ें जादू की दुनिया रचती रही. शहतीर के नीचे लटके हुए झीने परदे के पार से प्रीमा डोना यानि ओपरा कंसर्ट में गाने वाली मुख्य गायिका मेरी ओर बढ़ी आती. वाह वाही की प्रतीक्षा करते हुए निरंतर अपने सुर को बचाती हुई मुझसे अँधेरे कोने तक आने का मादक संकेत करती थी. उस वक़्त मैं नीम नींद से भरा रात की लहर पर सवार होता था जबकि ज़िन्दगी से जिरह कर के हार चुकी दुनिया के लोग अपने बिस्तरों में मरे पड़े रहते. मैं नींद में जाने से पहले इसी अद्भुत दुनिया में खोया रहता. मुझे अपनी पलकें आहिस्ता से झुकाते हुए एक साथ बंद करने का काम बहुत पसंद था. ऐसे नींद आया करती थी और ऐसे ही उतर आता था जादू रात की आँख से…
याद के आने के वक़्त का ये किस्सा कल शाम का है. जब हवा कुछ ठंडी थी और हरे रंग के बिना बाजू वाले स्वेटर के अंदर धड़क रहे दिल को कुछ खास काम नहीं था. चाँद को ग्रहण था तो सूरज के ढलते ही वोदका की गंध देसी बबूल की खुशबू से मिल कर अधिक नशीली हो गई. आवाज़ों का भूला बिसरा रोमांस दफ्तर के गलियारों में टहलता रहा. मैं सीढ़ियों के पास बनी पटरी पर दीवार का सहारा लिए बैठा रहा. यादों के साये, बचपन के भूले बिसरे आँगन से उड़ कर इस देह पर बिखरते रहे. रात कुछ बेवजह की बातें की और कुछ ये याद किया कि रात ने वो कमसिन गंध किस जगह छुपा रखी है? 
* * * 
[Painting : Counterweight; Image courtesy : Andrea Beech]
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