डायरी

आखिर थक कर सो जाओगे

अँधेरे में दीवार का रंग साफ़ नहीं दिख रहा था.
पच्चीस कदम दूर, उस दीवार की ईंटें बायीं तरफ से गिरी हुई थी. फ्रिल वाली स्कर्ट पहनी हुई नवयौवना उस लड़के तक जाना चाहती थी. लड़के का मुंह पूरब दिशा में था और वह उसके पीछे की तरफ थी. भौतिक चीज़ों से जुडी अनुभूतियों के साथ मेरा दिशा बोध जटिलता से गुंथा हुआ है. चीज़ें एक खास शक्ल में सामने आती है. जब भी मैं किसी दीवार पर बैठे हुए लड़के के बारे में सोचता हूँ तो तय है कि लड़का जिस तरफ देख रहा है, उधर पश्चिम है. लड़के के पैरों के नीचे की ओर ज़मीन बहुत दूर है. वह लड़का एक उदासी का चित्र है. इसलिए डूबते हुए सूरज की ओर उसका मुंह हुआ करता है. जिस तरफ वह देख रहा है उधर कोई रास्ता नहीं होता. घात लगाये बैठा समंदर या फ़िर पहाड़ की गहरी खाई लड़के के इंतजार में होती है. लड़के के थक कर गिर जाने के इंतजार में…

मैं उसे नवयौवना ही समझ रहा हूँ किन्तु लिखने में लड़की एक आसान शब्द है. दरवाज़े के साथ एक जालीदार पतला पल्ला है. इसके आगे कुर्सी रखी है और फ़िर खुली जगह में रेत है. इस पर कुछ पौधे उगे हुए हैं. इन सबके बीच वह डिनर टेबल कहां से आई, मैं समझ नहीं पाता हूँ. अचानक चली आई दीवार और उस पर बैठा लड़का भी अविश्वसनीय है. मुझे तुरंत लगा कि मैं इस विचार को यहीं त्याग दूँ. मैं इस लड़की के लिए, उस लड़के के बारे में और नहीं सोचना चाहता हूँ. हालाँकि डिनर टेबल पर कोहनियाँ टिकाये बैठी लड़की चुप थी और सिर्फ़ मैं ही उसके लिए सोच रहा था.

इस बार लड़का पूरब की और देख रहा था. इसलिए वह अधिक देर तक मेरे साथ नहीं रहा. मेरे ख़यालों में आने वाले सब झूलों की पींग पूरब की ओर उठती है. झूला दोलन का सुंदर प्रतीक है. दोलन, विचलन का और विचलन, यात्रा का अंश है. और मुझे यात्रायें कम पसंद है इसलिए मैंने लड़के को गायब कर दिया. हवा की रंगत बदली हुई थी. इसके स्पर्श में मादकता थी फिर भी जाने क्यों मैं सो नहीं पा रहा था.

बैडरूम से बाहर अँधेरे में जाने का सोचते ही लगता कि मैं चीज़ों से टकराने लगूंगा. मैंने सिर्फ़ आवरण को पढना सीखा है. अर्थात जब उजाला चीज़ों के औरा को समाप्त कर उनकी ज्यामितीय शक्ल को दिखाता है, तब मैं उन्हें समझ पाता हूँ. उनसे बराबर की दूरी बना कर रख सकता हूँ. अँधेरा पढना आता नहीं इसलिए अपने ही स्थान पर चीज़ों के बीच रास्ता खो गया है. मैंने अपने आवरण को सीखा, जाना है. बाहर के अँधेरे की तरह मेरे भीतर घना अंधकार है. जब अपने भीतर झांकता हूँ तो घबरा कर लौट आता हूँ.

इस घबराहट में सब शक्लें बुझा देना चाहता हूँ. लड़के के बहाने फ़िर से दिशा और उससे जुड़ी चीज़ों का बोध मेरे सिरहाने चला आता है. सोचता हूँ कि मैंने जब भी किन्हीं सीढियाँ के बारे में सोचा, वे उत्तर की ओर मुंह किये हुए क्यों दिखाई दी? जाने क्यों, हमेशा ऐसा लगता रहा कि सीढियाँ चढ़ते हुए मैं दक्खिन में ऊपर की ओर बढ़ रहा हूँ. मेरे ख़यालों में टूटी हुई इमारतें, मेहराब, कंगूरे, घर, चुंगियों के दफ्तर और खत्म हुए रास्ते से दिखाई देते हैं लेकिन सीढियाँ साबुत ही रहती हैं. जैसे उनकी गिनती पूरी हो रही है. वे मुकम्मल होने का अहसास दे रही है.

रात के बारह पचास…
अब मेरे पास ख़यालों की खुशबू के गोदने थे. उनमें बस इतना बचा रह गया है कि दीवार पर बैठा रहने वाला लड़का हसरतों का वजूद था. जिसके कंधों पर लड़की की आँखों के ख़्वाब टिके रह सकें. मगर वो लड़की कौन थी? हवा का झोंका फिर दस्तक दे गया है. मैं जानता हूँ कि बाहर दरवाजे के पार काली रात है फ़िर भी उस लड़की का गोरा बदन देख लेना चाहता हूँ, अगर वह वहां बैठी है तो… उनींदा दीवार से गिरने से पहले के सम्मोहन में घिरा हुआ, तकिये के नीचे अपनी कोहनी को डाल कर उसे थोड़ा और ऊपर कर लेता हूँ.

फ्रिल वाली स्कर्ट पहने लड़की के ख़्वाब जाने क्या हुए. दरवाज़े के पार अँधेरा प्यासा ही खड़ा रहा और मैं अपनी प्यास के चार जानिब एक दीवार चुनता गया.

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